ईरान ने सुलह की कोशिशों के बीच क्या अमेरिका के ख़िलाफ़ जंग की रणनीति बदल दी

एक अति-रूढ़िवादी यहूदी व्यक्ति जॉर्डन घाटी में एक खुले मैदान में ईरानी बैलिस्टिक मिसाइल के अवशेषों से दूर चला जाता है.
इमेज कैप्शन, जॉर्डन घाटी के एक मैदान में ईरानी बैलिस्टिक मिसाइल के अवशेष पाए गए
    • Author, अमीर अज़ीमी
    • पदनाम, बीबीसी फ़ारसी
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

हाल में ईरान ने रातों-रात इसराइल पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए. यह हमला इसराइल के हिज़्बुल्लाह पर किए गए हमलों के जवाब में था.

सैन्य स्तर पर भले ही इस हमले का असर सीमित दिखा हो लेकिन इसके राजनीतिक मायने कहीं ज़्यादा बड़े हो सकते हैं.

दरअसल, कई सालों से ईरान खुद पर हुए सीधे हमले को बदले की कार्रवाई बताता रहा है. आमतौर पर वह तब पलटवार करता है जब उसके क्षेत्र, कमांडरों या राष्ट्रीय हितों पर चोट पड़ती है. लेकिन इस बार मामला अलग था.

इस बार ईरान ने अपने एक सहयोगी पर हमले के बाद कार्रवाई की. इसराइल ने दक्षिणी बेरूत में एक इमारत पर हमला किया. उसका कहना था कि यह इमारत हिज़्बुल्लाह से जुड़ी है.

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हालांकि हमले के बाद बीते सोमवार को ईरानी सेना ने कहा कि वह हमले रोक देगी. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि हमला किया ही क्यों गया था.

जबकि ईरान को पता था कि इससे इसराइल फिर से सैन्य कार्रवाई कर सकता है. और अमेरिका के साथ चल रही नाज़ुक शांति वार्ता भी ख़तरे में पड़ सकती है.

ईरान ने आख़िर क्यों हमला किया?

तेहरान में पूर्व सुप्रीम लीडर और वर्तमान सुप्रीम लीडर के पोस्टर के पास से गुजरते लोग.
इमेज कैप्शन, तेहरान में पूर्व सुप्रीम लीडर और वर्तमान सुप्रीम लीडर के पोस्टर के पास से गुजरते लोग

इसके जवाब का एक हिस्सा ईरान की सोच में छिपा हो सकता है कि महीनों से जारी इस संघर्ष के बाद ईरानी नेता अपनी स्थिति का आकलन कैसे कर रहे हैं.

इस युद्ध के बाद इस्लामिक गणराज्य कुछ मामलों में कमज़ोर हुआ है लेकिन मुश्किल हालात से उबरने की उसकी ताक़त को सबने देखा.

ईरान पर इसराइल और अमेरिका का काफ़ी सैन्य दबाव था. आर्थिक प्रतिबंध भी लगे हुए थे. अमेरिका ने समुद्री नाकाबंदी भी की. इसके बावजूद ईरान बना रहा. सरकार अब भी सत्ता में है. उसकी सुरक्षा व्यवस्था भी कायम है. विरोधियों की कई भविष्यवाणियों के बावजूद वहां कोई बड़ा जन आंदोलन खड़ा नहीं हुआ.

संभव है कि इस अनुभव ने तेहरान की नई सोच को रूप दिया हो. अब ईरान खुद को केवल कमज़ोर खिलाड़ी नहीं मानता होगा. पहले वह टकराव से हर हाल में बचना चाहता था. अब वह खुद को मज़बूत ताक़त के रूप में देख सकता है. उसे लगता है कि वह मुश्किल दौर झेल चुका है और अब वह नई लक्ष्मण रेखा खींचने की स्थिति में है.

अप्रत्यक्ष हमले पर भी ईरान हमलावर क्यों

ईरान की ओर से दागी गई मिसाइल को इसराइल के वेस्टबैंक के हेब्रोन शहर के आसमान में सात जून को देखा गया. (फाइल फोटो)
इमेज कैप्शन, ईरान की ओर से दाग़ी गई मिसाइल को इसराइल के वेस्टबैंक के हेब्रोन शहर के आसमान में सात जून को देखा गया (फाइल फोटो)

हो सकता है कि यह हमला डर पैदा करने के लिए किया गया हो. विरोधी को सिर्फ जवाब देने के लिए नहीं, बल्कि चेतावनी देने के लिए भी.

ईरान यह संदेश देना चाहता होगा कि उसके क्षेत्रीय सहयोगियों पर हमला अब अलग नहीं माना जाएगा. बल्कि इसे ईरान पर हमले की तरह देखा जाएगा. यह बात हिज़्बुल्लाह और इराकी मिलिशिया के लिए ख़ास मायने रखती है.

साथ ही ईरान के दूसरे सहयोगियों के लिए भी. इन सभी को ही "एक्सिस ऑफ रेज़िस्टेंस" कहा जाता है, यानी प्रतिरोध का गठजोड़.

ईरान की ताक़त का असर इसी भरोसे पर टिका रहा है कि वह अपने साथियों का साथ देगा.

अगर वह चेतावनी देने के बाद भी जवाब नहीं देता तो उसकी साख को नुकसान हो सकता था. इस नज़रिए से देखें तो हमला सिर्फ़ इसराइल के लिए नहीं था, यह एक संदेश भी था.

यह संदेश अमेरिका और इसराइल के सहयोगियों को भी दिया गया जो पूरे इलाके में इस पर नज़र बनाए हुए थे.

वे देखना चाहते थे कि तेहरान अपनी बात का पक्का है या नहीं.

वार्ता के बीच हमले के क्या हैं मायने

तेहरान में अख़बारों की सुर्खियाँ और पोस्टर (सांकेतिक फोटो)
इमेज कैप्शन, तेहरान में अख़बारों की सुर्खियाँ और पोस्टर (सांकेतिक फोटो)

इस हमले का समय भी कम दिलचस्प नहीं है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि समझौता अब जल्द हो सकता है.

सामान्य तौर पर यह माना जाता है कि ऐसे समय ईरान को ऐसे कदम नहीं उठाने चाहिए जो बातचीत को ख़तरे में डाल सकते हों.

लेकिन ईरान की सोच इससे अलग हो सकती है. हो सकता है कि ईरान के नेताओं ने यह निष्कर्ष निकाला हो कि सीमित और सोच-समझकर की गई सैन्य कार्रवाई से ताक़त दिखती है.

और इससे बातचीत की मेज़ पर उसकी स्थिति मज़बूत हो सकती है, कमज़ोर नहीं. ईरान के नज़रिए से देखें तो ताक़त दिखाना एक संदेश देना भी है.

यह संदेश अमेरिका और इसराइल दोनों के लिए हो सकता है कि ईरान के पास अब भी कई विकल्प मौजूद हैं.

इसका मतलब यह नहीं है कि ईरान बातचीत को खत्म करना चाहता है. ऐसा लगता है कि तेहरान ने एक संदेश देने की कोशिश की और एक नई मिसाल कायम करने की भी.

लेकिन हमला इतना बड़ा नहीं था कि हालात बेकाबू हो जाएं. अभी यह देखना बाकी है कि यह रणनीति सही साबित होती है या नहीं.

अपने देश की नई रणनीति पर क्या सोचते हैं ईरानी

बीबीसी फ़ारसी के दर्शकों ने बताया कि जब युद्ध फिर से शुरू हुआ तो वे फिर से डर के साये में आ गए हैं. (सांकेतिक तस्वीर)
इमेज कैप्शन, ईरान के कई लोगों का कहना है कि युद्ध फिर शुरू होने से वे फिर से डर के साये में आ गए हैं. (सांकेतिक तस्वीर)
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ईरानियों की प्रतिक्रिया इस पूरे माहौल को दिखाती है. कुछ लोग ईरान के कदम को सही मानते हैं. वे इसे जायज़ जवाब बताते हैं.

बीबीसी फ़ारसी के एक दर्शक ने कहा, "लेबनान की रक्षा के लिए ईरान का शामिल होना वफ़ादारी है और यह सही भी. न्यूक्लियर समझौते के बाद से ईरान ने अंतरराष्ट्रीय क़ानून नहीं तोड़े. यह हमला भी दूसरी तरफ़ से संघर्षविराम तोड़ने के जवाब में था."

कुछ लोग तेहरान की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हैं.

एक अन्य दर्शक ने कहा, "करीब दो महीने से दक्षिणी ईरान में लड़ाई और बमबारी हो रही है. लेकिन कोई ठोस जवाब नहीं दिया गया. ऐसा लगता है कि दक्षिणी लेबनान ज़्यादा अहम है. दक्षिणी ईरान से भी ज़्यादा."

हालांकि अधिकांश लोग एक डर के साये में हैं कि यह टकराव आगे कहाँ तक जा सकता है. एक दर्शक ने बीबीसी फ़ारसी से कहा, "सच कहूँ तो जब युद्ध फिर से शुरू हुआ तो मेरा दिल बैठ गया."

हालांकि कुछ लोग मानते हैं कि यह टकराव बड़े युद्ध में नहीं बदलेगा.

एक दर्शक ने कहा, "यह झड़प बहुत गंभीर नहीं है और यह पहले की तरह बड़े युद्ध में नहीं बदलेगी. ईरान जानता है कि अमेरिका अब सीधा युद्ध नहीं चाहता इसलिए वह आगे बढ़कर कदम उठा रहा है. यह कुछ हद तक दिखावे और प्रचार के लिए भी है ताकि उसके समर्थकों को लगे कि वे जीत रहे हैं."

एक और संभावना यह भी है कि यह हमला बातचीत की दिशा से नाराज़गी दिखाता है.

अगर ईरान को लगता है कि उससे रियायतें मांगी जा रही हैं. लेकिन बदले में उसे ठोस फायदा नहीं मिल रहा है. तो यह कदम दबाव बढ़ाने का तरीका हो सकता है. ताकि अगली बातचीत में उसकी स्थिति मज़बूत हो सके.

कुल मिलाकर यह हमला दिखाता है कि नेतृत्व पहले से ज़्यादा आत्मविश्वास में है. कुछ महीने पहले बाहरी लोग जितना अंदाज़ा लगा रहे थे, उसके कहीं ज़्यादा.

मुख्य सवाल यह नहीं है कि ईरान इसराइल के और हमले झेल सकता है या नहीं.

असल सवाल यह है कि क्या तेहरान को अब लगता है कि वह ऐसा करते हुए भी बातचीत जारी रख सकता है?

अगर ऐसा है, तो ईरान एक नई स्थिति बनाना चाहता हो सकता है, जहाँ वह ताक़त की स्थिति से बातचीत करे. और साथ ही अपनी तय की गई रेड लाइन को लागू भी करे.

यह तरीका जोखिम भरा है लेकिन यह एक बड़ा बदलाव होगा. इससे साफ़ होगा कि इस्लामिक गणराज्य अब अपनी सुरक्षा को कैसे देखता है? और मध्य-पूर्व में अपनी भूमिका को किस रूप में समझता है?

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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