ज़िंदगी में ख़ुश रहने का असल फॉर्मूला क्या है

बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया...

हिंदी फ़िल्म का ये गीत एक लंबे अर्से से ख़ुशी का फ़लसफ़ा माना जाता रहा है.

खाओ-पियो, ऐश करो, मस्त रहो. कुछ लोगों की ज़िंदगी का यही उसूल होता है. यही सब करके उन्हें ज़िंदगी की तमाम ख़ुशियां मिल जाती हैं. लेकिन बहुत से लोग ख़ुश रहने के लिए तरह-तरह के जतन करते हैं.

अमरीकी लेखिका एलिज़ाबेथ गिलबर्ट ने अपनी बेस्ट सेलिंग किताब ईट, प्रे, लव में लिखा है कि खुशियां इंसान की अपनी कोशिशों का नतीजा हैं. ख़ुश रहने के लिए मेहनत करनी पड़ती है.

बहुत बार ख़ुशी तलाशने के लिए दुनिया भर में घूमना पड़ता है. और जब ख़ुशी नसीब होती है तो उसे आगे तक बचाए रखने के लिए मेहनत करनी पड़ती है. जो ऐसा नहीं कर पाते वो बेचैन रहते हैं.

नई रिसर्च बताती हैं कि ख़ुशियों के लिए मेहनत का फंडा कुछ हद तक ही काम करता है, और ये सब के लिए है भी नहीं. मिसाल के लिए अगर मेहनत के बाद भी ख़ुशी ना मिले तो इंसान अकेलेपन और तनाव का शिकार हो सकता है.

नाकामी का एहसास इंसान को ख़ुशी और उदासी में फ़र्क़ की तमीज़ करना भुला सकता है. दरअसल ख़ुशियां एक आज़ाद पंछी की तरह हैं. उन्हें जितना पकड़ो वो उतनी ऊंची उड़ जाती हैं. इसलिए ख़ुशियों के पीछे भागना नहीं चाहिए. बल्कि ख़ुश रहने की कोशिश करनी चाहिए.

ख़ुश रहने को एक काम समझ लेना कितना सही?

मनोवैज्ञानिक आईरिस मॉस का कहना है कि पिछले एक दशक में अमरीका में ऐसी बहुत सी किताबें लिखी गई हैं जिनमें ख़ुशियों को बेहद अहम बताते हुए ख़ुश रहने के तरीक़े बताए गए हैं.

इन किताबों में ख़ुद को ख़ुश रखना, कर्तव्य के तौर पर बताया गया है लेकिन ये नहीं बताया गया कि अगर कोशिश के बाद भी ख़ुशी ना मिले तो क्या किया जाए.

दरअसल जब हम ख़ुश रहने को एक काम समझ लेते हैं तो हमारी उम्मीदें बहुत बढ़ जाती हैं. हमारा ही बनाया हुआ ख़ुशी का पैमाना जब उम्मीद पर खरा नहीं उतरता तो हम हारा हुआ महसूस करने लगते हैं.

प्रोफ़ेसर मॉस ने माया तामिर और निकोल सविनो के साथ मिलकर एक रिसर्च की. इसमें उन्होंने प्रतिभागियों से बहुत से सवाल पूछे और उनसे कुछ प्रैक्टिकल भी करवाए.

लेकिन नतीजे बहुत घालमेल वाले सामने आए. मिसाल के लिए अगर कोई दुख की घड़ी का सामना करके रिसर्च में शामिल हुआ, तो, उसका तजुर्बा कुछ और था. यानी मुश्किल हालात में ख़ुशी की ज़रूरत महसूस नहीं होती और आप ख़ुश रहने का प्रयास भी नहीं करते. ख़ुशियों की ज़रूरत भी तभी होती है जब दिल और दिमाग़ सुकून से होते हैं.

ख़ुशी की उम्मीद और उस पर खरा उतरने का दबाव

इसी रिसर्च के तहत एक तजुर्बा और किया गया. और ये पता करने की कोशिश की गई कि क्या वाक़ई लागों के ख़ुश रहने के नज़रिए को घटाया या बढ़ाया भी जा सकता है.

लिहाज़ा कुछ प्रतिभागियों को एक ऐसा लेख पढ़ने को दिया गया जिसमें ख़ुशियों की अहमियत बयान की गई थी. जबकि एक अन्य ग्रुप को ओलंपिक में जीत के बाद खुशियों वाली फ़िल्म देखने को कहा.

पाया गया कि फ़िल्म देखने के मुक़ाबले ख़ुशियों की अहमियत पर लेख पढ़ने वाले लोगों में ख़ुशी का अहसास ज़्यादा था. दरअसल जिन लोगों ने लेख पढ़ा था उन्होंने अपनी ख़ुशी का पैमाना तय नहीं किया था.

जबकि ओलंपिक की जीत पर जिन लोगों ने फ़िल्म देखी थी, उन्हें ये पहले से पता था कि फ़िल्म में ख़ुशी के लम्हें मौजूद होंगे, लिहाज़ा उन्होंने अपनी ख़ुशी का पैमाना ऊंचा कर लिया जोकि उम्मीद पर खरा नहीं उतरा.

इसी तरह जब प्लान करके कहीं घूमने जाते हैं तो वहां जाकर उस खुशी का अहसास नहीं होता जिसकी उम्मीद होती है. वहीं अगर आप अचानक कहीं घूमने का प्लान बनाते हैं तो ख़ुशी ज़्यादा होती है.

ख़ुशियों की उम्र

मॉस के मुताबिक़ बहुत ज़्यादा ख़ुश रहने की ख़्वाहिश कई बार अकेलापन बढ़ा देती है. दरअसल जब हम ख़ुश रहने का प्रयास करते हैं तो हमारा ध्यान सिर्फ़ अपने आप पर होता है.

हम आस-पास के लोगों को भूल ही जाते हैं. यही नहीं हम उन लोगों को नकारात्मक भाव से देखने लगते हैं. उनकी कमियां तलाशने लगते हैं. जबकि कई बार उन लोगों की मौजूदगी और साथ में ही हमारी ख़ुशियां छिपी होती हैं.

कनाडा की टोरंटो यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर सेम मेग्लियो का कहना है कि ख़ुशियों के लिए जान-बूझ कर की गई कोशिशें कई बार हम पर जवाबी हमले करती हैं.

वो हमें एहसास कराती हैं कि वक़्त गुज़र रहा है और हमारे पास ख़ुशियां नहीं हैं. एक प्रैक्टिकल के तहत उन्होंने रिसर्च में शामिल लोगों से ऐसी दस चीज़ों की फ़ेहरिस्त बनाने को कहा जिनसे उन्हें ख़ुशियां मिलती हैं.

हैरत की बात थी कि लिस्ट बनाने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि उनके पास वक़्त की कितनी किल्लत है.

किसी भी शख़्स के लिए ये कह पाना मुश्किल है कि उसने ख़ुशियों की बुलंदियां छू ली हैं. हरेक ख़ुशी के बाद इंसान की चाहत और बढ़ जाती है और वो उस ख़ुशी को हमेशा के लिए अपने पास रखना चाहता है. जबकि हरेक ख़ुशी की एक उम्र होती है जिसके बाद नई ख़ुशी उसकी जगह लेती है. और इंसान में ख़ुशी पाने की ललक बनी रहती है.

... तो फिर ख़ुश रहने का फॉर्मूला क्या है

मेग्लियो का कहना है कि सोशल मीडिया हमें दूसरों की खुशहाल ज़िंदगी के बारे में बताकर हमारे अंदर ज़्यादा से ज़्यादा ख़ुश रहने की तरंग पैदा करता है.

लेकिन बेहतर होगा कि हम दूसरी की ज़िंदगी और ख़ुशियों को अपना पैमाना ना बनाएं. बल्कि ख़ुद अपने आप से पूछें कि हमें क्या पसंद है. और अपनी ज़िंदगी को ज़्यादा से ज़्यादा मानीख़ेज़ कैसे बनाएं.

वहीं नई रिसर्च की बुनियाद पर प्रोफ़ेसर मॉस का ख़याल है कि जो लोग नकारात्मक माहौल और चीज़ों को अपनी ख़ुशियों का दुश्मन ना मानकर उन्हें चुनौती की तरह स्वीकार करते हैं वो ज़्यादा मुतमईन और संतोषजनक जीवन जीते हैं.

नकारात्मकता ही ख़ुशियों की अहमियत का एहसास कराती है. ख़ुशियों को पाने का कोई विज्ञान या गणित नहीं है और ना ही कोई शॉर्टकट. जिसने जीवन के उतार-चढ़ाव को चुनौती जानकर स्वीकार कर लिया उसे ख़ुश रहने के लिए किसी अन्य कोशिश की ज़रूरत नहीं रहेगी.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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