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हड्डियों के टूटने से जुड़े पांच भ्रम
कोई चोट लगने के बाद अक्सर हम अपनी हड्डियों के टूटने को लेकर आशंकित हो जाते हैं. इसे लेकर कई ग़लतफ़हमियां हैं.
1. अगर आप अपनी हड्डी हिला नहीं सकते, तो इसका मतलब वो टूट गई है.
किसी भी चोट के बाद जो पहला ख़याल आता है, वो यही आता है कि आप की हड्डी टूट गई है. दर्द से कराहते हुए आप लगातार यही सोचते रहते हैं कि अगर आप हाथ या पैर नहीं हिला पा रहे हैं, तो कहीं आप की हड्डी टूट तो नहीं गई है.
सच्चाई ये है कि कई बार आप टूटी हुई हड्डी को भी हिला सकते हैं. यानी अगर आप चोटिल हाथ या पैर नहीं हिला पा रहे हैं, तो इसका ये मतलब नहीं कि हड्डी टूट गई है.
हड्डी टूटने के तीन बड़े संकेत होते हैं-दर्द, चोट की जगह का फूलना और शरीर का कोई अंग टेढ़ा-मेढ़ा होना. अगर कोई हड्डी चमड़ी से उभरी हुई मालूम होती है, तो ये शुभ संकेत नहीं. हादसे के वक़्त चटखने की आवाज़ आप ने अगर सुनी है, तो उसका मतलब भी होता है कि आप की हड्डी टूट गई है.
2. हड्डी टूटी तो यक़ीनन आप को दर्द होगा
ये भी बड़ी ग़लतफ़हमी है. ऐसा हर बार मुमकिन नहीं कि हड्डी टूट गई है, तो आप को दर्द होगा ही. ऐसा नहीं है. बहुत से लोगों को तो बिल्कुल एहसास भी नहीं होता कि उनकी कोई हड्डी टूट गई है. टूटी हुई हड्डियां तकलीफ़ देती हैं. लेकिन, छोटी-मोटी टूट-फूट का पता भी नहीं चलता.
जब आप को पता चले कि कोई हड्डी टूट गई है, तो तुरंत किसी जानकार की मदद लेनी चाहिए. ताकि, वो आप की हड्डियों को सही मौक़े पर लाकर उन्हें जोड़ सके. वरना, उनमें इन्फेक्शन हो सकता है. हो सकता है कि हड्डी जुड़े ही नहीं.
2015 में ब्रिटेन के बायोबैंक में दर्ज डेटा की बुनियाद पर हुई रिसर्च से दिलचस्प बात सामने आई थी. वो ये कि कई लोगों को बीसियों बरस पहले कोई चोट लगी थी. उनकी हड्डी टूट गई थी. इसका दर्द उन्हें दुर्घटना के कई दशक बाद हुआ. हालांकि ऐसी मिसालें आम नहीं हैं.
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3. बुजुर्ग गोरी महिलाओं को हड्डी टूटने की ज़्यादा फ़िक्र करनी चाहिए
इसमें कोई दो राय नहीं कि बुज़ुर्गों की हड्डी टूटने-चटख़ने का जोखिम ज़्यादा रहता है. मीनोपॉज़ की वजह से आए बदलाव के चलते महिलाओं की हड्डी टूटने का ख़तरा और बढ़ जाता है. इससे हड्डियों का क्षरण होता है. ओस्टियोपोरोसिस की बीमारी महिलाओं को ज़्यादा होती है.
अगर हम किसी ख़ास नस्ल या समुदाय की बात करें, तो अमरीका में गोरी महिलाएं, अश्वेत महिलाओं के मुक़ाबले ज़्यादा हिप फ्रैक्चर की शिकार होती हैं. अश्वेत महिलाओं की बोन डेन्सिटी बचपन से ही ज़्यादा होती है.
फिर भी अश्वेत महिलाएं ओस्टियोपोरोसिस की शिकार हो सकती हैं. हां, गोरी महिलाओं के मुक़ाबले उन पर ये ख़तरा कम होता है.
पचास से ज़्यादा उम्र की केवल 5 प्रतिशत अश्वेत महिलाओं को ओस्टियोपोरोसिस का ख़तरा होता है.
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4. अंगूठा टूटने पर डॉक्टर को दिखाना बेकार है
भले ही टूटे अंगूठे का डॉक्टर कुछ न कर सकें. भले ही अंगूठे पर प्लास्टर चढ़ाना मुश्किल है. फिर भी, अगर, अंगूठा चोट का शिकार होता है, तो फ़ौरन डॉक्टर को दिखाना चाहिए. इससे आगे चल कर होने वाली मुश्किलें दूर होती हैं. कई बार तो आलम ये होता है कि जूते पहनना मुश्किल हो जाता है. बेहतर है कि अंगूठे में लगी हर चोट को गंभीरता से लें. ज़्यादा तकलीफ़ होने पर डॉक्टर को दिखाएं. ताकि, सही इलाज से चोट ठीक की जा सके.
ज़्यादातर चोटिल अंगूठों को पट्टी बांध कर सीधा रखा जा सकता है. इस दौरान चोट के ठीक होने के लिए ख़ास जूते भी बाज़ार में आते हैं. अंगूठे की चोट कई लोगों के लिए बड़ी मुश्किल हो सकती है. हो सकता है कि उन्हें घुटनों तक प्लास्टर चढ़ाना पड़े. अच्छी बात ये है कि अंगूठों में चोट कम लगती है.
अंगूठे के बगल वाली हड्डी यानी मेटाटार्सल के टूटने पर हालात और भी जल्दी बेहतर हो जाते हैं. कई बार तो उसे ठीक करने या जोड़ने के लिए प्लास्टर की भी ज़रूरत नहीं होती. सिर्फ़ पैरों को लंबा आराम देना पड़ता है. असल में पैरों की हड्डियां जुड़ी हुई होती हैं. तो, टूटने के बाद भी वो सीधी रहती हैं. इसलिए उन्हें प्लास्टर चढ़ाकर जोड़ने की ज़रूरत नहीं होती.
लेकिन, प्लास्टर भले न चढ़ाना हो, आप को उसका सही इलाज ज़रूर कराना चाहिए. अगर गंभीर फ्रैक्चर नहीं है, तो भी उन पर कसी हुई ड्रेसिंग करानी होती है. एक-दो हफ़्ते का आराम हड्डियों का हाल दुरुस्त कर देता है.
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5. टूट कर जुड़ी हुई हड्डी ज़्यादा मज़बूत हो जाती है
इस मुग़ालते में तो बिल्कुल भी न रहें. असल में घाव भरने के दौरान एक नई हड्डी बन जाती है, ताकि जो हड्डी चोटिल है, उसकी हिफ़ाज़त हो सके. लेकिन, ये हड्डी, चोट ठीक होने के बाद धीरे-धीरे घुल जाती है. नई जुड़ी हुई हड्डी उतनी ही मज़बूत होती है, जितनी चोट लगने से पहले थी.
यक़ीनन ये पहले से मज़बूत नहीं होती.
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