जिन पहलवानों के हाथ मेडल नहीं मिट्टी लगी

रघुबीर पहलवान
    • Author, सुशांत एस मोहन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

कुश्ती पर चल रही इस विशेष सीरीज़ की बीती कड़ी में हमने बात की थी कुश्ती के सहारे सफ़लता कि ऊंचाइयों को छूने वाले पहलवान सतपाल सिंह की.

उन्हें उनके चाहने वाले 'महाबली सतपाल' के नाम से भी जानते हैं और भारत के दो सर्वश्रेष्ठ पहलवान योगेश्वर दत्त और सुशील कुमार उनके शिष्य हैं.

लेकिन कुश्ती और वक़्त हर किसी पर इतना मेहरबान नहीं रहता.

सतपाल जब 1982 के एशियाड में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीत रहे थे तब उन्हीं के साथ अभ्यास करने वाले और अनुभव में उनके सीनियर रहे रघुबीर पहलवान घर वापसी की तैयारी कर रहे थे.

एक ही अखाड़े के दो पहलवानों की कहानी में एक जितनी चकाचौंध से भरी है दूसरी उतनी ही स्याह है.

कोटे से नौकरी

रघुबीर पहलवान सतपाल पहलवान के साथ.
इमेज कैप्शन, रघुबीर पहलवान सतपाल पहलवान के साथ.

उत्तर प्रदेश के श्यामली गांव में मिट्टी के घर में रहते हैं रघुबीर पहलवान. पेशे से पुलिस में हवलदार रहे रघुबीर अब रिटायर हो गए हैं.

वह पेंशन के अलावा गांव देहात के अखाड़ों में बच्चों को कुश्ती सिखा कर या दंगल में कमेंट्री कर पैसा बनाते हैं.

लेकिन एक वक़्त में रघुबीर भी बहुत माने हुए पहलवान थे अपने दोस्त सतपाल की तरह.

वह बताते हैं, "मैं और सतपाल एक ही साथ थे. वह बहुत मेहनती था. कई बार हमने उसे कुछ तकनीकें सिखाई. वह सीखता भी बहुत ज़ोरदार तरीक़े से था लेकिन हमने भी उसे कई बार मुश्किल में डाला है."

कोटे से नौकरी

अखाड़ा, पहलवान

एक साथ शुरू इस सफ़र में एक महाबली बना और दूसरा सरकारी मुलाज़िम. ऐसी क्या मजबूरी थी.

इस पर रघुबीर पहलवान का कहना था, "कुश्ती महंगा खेल है. खाली मिट्टी में लंगोट बांधने से काम नहीं चलता. दूध और बादाम खाने के पैसे भी चाहिए होते हैं. सतपाल के घर से उसे सपोर्ट था लेकिन मेरे घर की ओर से नौकरी का दबाव था."

वह बताते हैं कि कैसे नौकरी के लिए उन्हें कई कंपीटीशन छोड़ देने पड़े.

उन्होंने कहा, "हमारे पिताजी के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह हमें खिला सकते और दूर अखाड़ों में भेज सकते. वह तो बस हमें खिलाड़ी कोटे से भर्ती कराना चाहते थे. जब एशियाड हो रहे थे तो मौक़ा मेरे पास भी था लेकिन घर कि ज़िम्मेवारियों के सामने मेडल छोटे पड़ जाते हैं."

हालात ये हैं कि रघुबीर पहलवान के घर में उनके बाद पहलवानी से जुड़ने वाला कोई नहीं है और न ही वो किसी को इससे जोड़ना चाहते हैं.

मिट्टी की कुश्ती पीछे रह गई है

भारत के पहलवान

रघुबीर आज भी कई बार अपने पुराने दिनों कि यादें ताज़ा करने के लिए अपने दोस्त सतपाल के पास दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में चले आते हैं जहां वो नए पहलवानों को देख कर दंग हो जाते हैं.

रघुबीर कहते हैं, "हमारे ज़माने में कुश्ती ऐसी नहीं थी. आजकल तो कुश्ती बड़ी फ़ास्ट हो गई है. हम पहले दांव और ताक़त पर निर्भर थे आजकल तो सब तकनीक पर है."

रघुबीर पहलवान का घर

रघुबीर को अफ़सोस है कि जिस तेज़ी से दुनिया में कुश्ती आगे बढ़ती जा रही है उससे भारत की पारंपरिक कुश्ती पीछे जाती जा रही है.

उन्होंने कहा, "गांव में तो पैसे के दंगल होते हैं. यहां न कोई फ़िटनेस देखता है न तकनीक. बड़े साइज का पहलवान ज़्यादा लोकप्रिय होता है लेकिन कोई ये नहीं देखता कि वो ओलिंपिक के मैट पर एक सेकेंड में चित्त हो जाएगा."

वह कहते हैं कि अखाड़ों को चाहिए कि वे सरकार से नए कोच मांगे क्योंकि देसी पहलवान सिर्फ़ पहलवानी के बेसिक बता सकते हैं लेकिन नई कुश्ती बिलकुल अलग है.

राहें और भी हैं

रघुबीर पहलवान के युवावस्था की तस्वीर.

रघुबीर पहलवान अपने दोस्त सतपाल की सफलता से ख़ुश तो हैं लेकिन उन्होंने बताया कि पहलवानी से सफलता के और भी रास्ते हैं.

वह ज़िक्र करते हैं अपने दोस्त लीलू पहलवान का जो किसी बड़ी प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं रहे लेकिन उन्होंने नाम और पैसा खूब कमाया है.

भारत में कुश्ती

रघुबीर ने बताया, "लीलू हमारे साथ ही थे लेकिन उन्होंने गांव की राजनीति में अपनी भूमिका ज़्यादा रखी. वह अब बड़े-बड़े दंगल करवाते हैं और अगर मैट की कुश्ती के देवता सतपाल हैं तो गांव की कुश्ती के भगवान लीलू."

रघुबीर अभी भी गांव में कुश्ती का शौक रखने वालों को कच्ची-पक्की लेकिन देसी कुश्ती की ट्रेनिंग देते हैं.

जिन अखाड़ों में वह बच्चों को कुश्ती सिखाते हैं, अगली कड़ी में हम आपको उन अखाड़ों के मालिक से मिलवाएंगे, जिन्हें कुश्ती ने पहलवान नहीं, हथियारों से खेलने वाला बाहुबली बना दिया.

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