वक़ार-वसीम की दोस्ती कैसे नफ़रत में बदली?

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- Author, दिनेश उप्रेती
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
सत्तर-अस्सी के दशक में वेस्ट इंडीज़ की पेस बैटरी को क्रिकेट इतिहास का सबसे ख़तरनाक पेस अटैक माना जाता है.
इन कैरेबियाई गेंदबाज़ों ने दुनियाभर के बल्लेबाज़ों के दिलों में दहशत पैदा की और इसके कई क़िस्से क्रिकेट के इतिहास में दर्ज हैं.
यही वजह थी कि वेस्ट इंडीज़ की टीम इन दशकों में विश्व क्रिकेट पर राज करती रही.
लेकिन नब्बे के दशक में वेस्टइंडीज़ के अलावा जिस पेस बैटरी का चर्चा रहा वो थी भारत के पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की.
1990 के अक्टूबर महीने में पहली बार पाकिस्तान के बाएं और दाएं हाथ की खूंखार बॉलिंग जोड़ी एक साथ मैदान में उतरी.

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वसीम अकरम पहले से ही टीम में थे और अपनी स्विंग से बल्लेबाज़ों को छकाने का काम बखूबी कर रहे थे, लेकिन दूसरे छोर पर जैसे ही उन्हें वक़ार यूनुस का साथ मिला, ये जोड़ी दुनिया की हर टीम के लिए चिंता का सबब बन गई.
कराची में न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ टेस्ट मुक़ाबले में पहली बार वसीम-वक़ार की जोड़ी मैदान में उतरी और दोनों ने 20 में से कुल जमा 15 विकेट झटककर न्यूज़ीलैंड को पारी और 43 रनों से धो डाला.
कभी शानदार दोस्ती थी
वसीम और वक़ार की गेंदों ने किस कदर कहर बरपाया था इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि वसीम और वक़ार के हाथों आउट होने वाले इन 15 बल्लेबाज़ों में से 11 बोल्ड या एलबीडब्ल्यू आउट हुए थे.

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इसके बाद तो इन दोनों ने अगले चार सालों तक दुनियाभर के बल्लेबाज़ों को अपनी गेंदों पर नचाया और आंकड़े भी इस बात की ताकीद करते हैं. 1990 से लेकर 1994 के दौरान इन दोनों ने 24 में से 18 टेस्ट में हर मुक़ाबले में 10 से अधिक विकेट चटकाए.
उस दौरान मैदान के भीतर वक़ार और वसीम में जितनी बेहतरीन जुगलबंदी थी, मैदान के बाहर शायद उससे बढ़कर.
गार्डियन के पत्रकार रहे जॉन ग्रेस ने अपनी किताब 'वसीम एंड वक़ार: इमरान्स इनहेरिटर्स' में लिखते हैं कि दोनों के बीच गजब की मित्रता और एक-दूसरे के प्रति सम्मान था. ये पुस्तक 1992 में प्रकाशित हुई थी.

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ग्रेस लिखते हैं, "ये कहना तो अतिशयोक्ति होगा कि वे ख़ून के रिश्ते में भाई थे, लेकिन उनकी जुगलबंदी किसी टीम के लिए खेलने वाले दो खिलाड़ियों से बढ़कर थी. वे बेहद विनम्र थे. कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं, यहां तक कि इस बात पर भी उनके बीच कोई चर्चा नहीं हुई कि किताब में पहले किसका नाम आएगा और किसे ज़्यादा पैसा मिलेगा."
पीठ की चोट के कारण वक़ार 1992 का विश्व कप नहीं खेल सके थे और संयोग है कि इमरान ख़ान की अगुवाई में पाकिस्तान विश्व चैंपियन बन गया.

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इसके बाद वक़ार ने लॉर्ड्स में वापसी की और वो भी धमाकेदार अंदाज़ में. पहली पारी में वसीम ने पांच अंग्रेज़ बल्लेबाज़ों को पैवेलियन लौटाया तो दूसरी पारी में ये काम वक़ार ने किया.
लेकिन वसीम और वक़ार की इस दोस्ती को मानो किसी की नज़र लग गई. 1990 का दशक आधा गुजरते-गुजरते वसीम-वक़ार के बीच तनातनी की ख़बरें आने लगीं.
पूर्व ओपनर मुदस्सर नज़र ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड उनके बीच बढ़ रही तक़रार पर आंखें मूंदे रहा.

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रावलपिंडी एक्सप्रेस के नाम से मशहूर रहे शोएब अख़्तर ने अपनी आत्मकथा 'कंट्रोवर्सली यूअर्स' में वसीम और वक़ार के बीच ड्रेसिंग रूम में तनातनी का विस्तार से जिक्र किया है.
जब हुई तीखी नोकझोंक
शोएब ने दावा किया कि 1999 में कोलकाता के ईडेन गार्डन में एशियन टेस्ट चैंपियनशिप मुक़ाबले से ठीक पहले वक़ार और वसीम के बीच तीखी नोकझोंक हुई थी.
शोएब लिखते हैं, "…हम दिल्ली टेस्ट हार चुके थे और इस पर वसीम की वक़ार से तीखी बहस हुई थी. झगड़ा इस कदर बढ़ गया था कि ये अफ़वाह उड़नी शुरू हो गई कि वक़ार को वापस घर भेजा जाएगा. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और पूरी टीम चैंपियनशिप के पहले टेस्ट के लिए कोलकाता रवाना हो गई. ड्रेसिंग रूम का माहौल बहुत ख़राब था. मुझे याद नहीं है कि ड्रेसिंग रूम में मैंने फिर कभी वैसा तनाव देखा, जो उस वक़्त था."

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शोएब लिखते हैं, "दोनों वरिष्ठ खिलाड़ियों के बीच जंग हो रही थी और हम युवा और नई टीम थे. हर कोई तनाव में था और इन हालात के बीच ये तय हुआ कि मैं खेलूँगा."
शोएब ने आरोप लगाया कि 1997 में जब उन्होंने रावलपिंडी में वेस्ट इंडीज़ के ख़िलाफ़ अपने क्रिकेट करियर का आगाज़ किया था तब कुछ पाकिस्तानी क्रिकेटर उनके ख़िलाफ़ 'लामबंद' हो गए थे.

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शोएब ने वसीम अकरम की कप्तानी में अपना पहला टेस्ट खेला था और उन्होंने अपनी आत्मकथा में वसीम अकरम पर कई गंभीर आरोप भी लगाए.
शोएब लिखते हैं, "मैं आपको अपने पहले टेस्ट मैच के बारे में क्या बताऊँ. उस मैच के बारे में जिसके बारे में मैं जिसके लिए मैंने कई साल तैयारी की थी. वसीम अकरम कप्तान थे और उन्होंने बोर्ड से कह दिया था कि चाहे जो हो जाए वो शोएब को नहीं खेलने देंगे. शायद हो पुरानी टीम के साथ ही खेलना चाह रहे थे क्योंकि शायद वो उनके प्रदर्शन से संतुष्ट थे या फिर वो मुझ जैसे नए गेंदबाज़ को बढ़ावा नहीं देना चाहते थे."
शोएब ने तो यहाँ तक दावा किया है कि वसीम अकरम ने तो धमकी भी दे डाली थी कि अगर मैं अंतिम एकादश में खेला तो वो कप्तानी छोड़ देंगे.

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ख़ैर वापस वक़ार और वसीम के रिश्तों पर लौटते हैं. वसीम और वक़ार खेल ज़रूर साथ-साथ रहे थे, लेकिन दोनों के बीच तनातनी और ड्रेसिंग रूम में गर्मागर्म बहस की छन-छन कर बाहर आती ख़बरें मीडिया की सुर्खियां बनती रही.
साल 2003 में दक्षिण अफ्रीका की मेजबानी में हुए विश्व कप में वक़ार-वसीम की जंग चरम पर पहुँच गई थी. पाकिस्तानी मीडिया में इस बात को लेकर ख़ूब चर्चाएं छपती रहीं कि दोनों आपस में बात तक नहीं किया करते थे और एक-दूसरे को संदेश पहुँचाने के लिए मध्यस्थ का काम इंज़माम उल हक़ का था.
बातचीत भी हो गई थी बंद
फिर जब वक़ार को पाकिस्तानी टीम की कमान सौंपी गई तो तकरीबन आधी टीम ने अकरम के प्रति वफ़ादारी ज़ाहिर की.
टीम के भीतर दो गुट साफ़ तौर पर दिख रहे थे. वसीम टीम में थे, लेकिन वो वक़ार से बात नहीं करते थे, इसकी पुष्टि ख़ुद वसीम अकरम ने भी की है.

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अपनी ऑटोबायग्राफ़ी 'वसीम- द ऑटोबायग्राफ़ी ऑफ़ वसीम अकरम' में अकरम लिखते हैं, "वक़ार मेरी मदद नहीं कर रहे थे....उनके कुछ दोस्त मुझे बताया करते थे कि उसके पास जॉब है...वक़ार दूसरे खिलाड़ियों के साथ ही मुझसे उलझने लगते थे....हम एक-दूसरे से मुश्किल से ही बात किया करते थे."
रिटायरमेंट के बाद वसीम ने एक इंटरव्यू में कहा था, "हम एक-दूसरे से इस कदर नफ़रत किया करते थे कि हमारे बीच मैदान और मैदान के बाहर भी बातचीत नहीं होती थी....पाकिस्तान को हमारी राइवलरी से फ़ायदा हुआ...जब भी वक़ार विकेट लेता...मैं भी वैसा करने के लिए प्रेरित होता."
हालाँकि वक़ार ने 2016 को ईएसपीएनक्रिकइंफो को दिए इंटरव्यू में माना कि उनके बीच कुछ चीज़ों को लेकर विवाद था. वक़ार ने कहा, "मैं वसीम भाई का अच्छा दोस्त हूँ, वो हमेशा बड़े भाई रहेंगे....हां, हमारे बीच कई मुद्दों पर मतभेद थे...मैंने कई मर्तबा इसके लिए अफ़सोस भी जताया है. इससे पाकिस्तान क्रिकेट को फ़ायदा नहीं हुआ."
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