युवा इस तरह सड़कों पर उमड़ आएंगे, इसका अंदाज़ा मोदी सरकार को क्यों नहीं था?

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- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 11 मिनट
इसकी शुरुआत उस डर से हुई जो भारत के लाखों युवाओं के लिए जाना-पहचाना है. अगर उनके भविष्य का फ़ैसला करने वाली परीक्षाओं पर ही भरोसा नहीं किया जा सकता, तो फिर किस पर किया जाए?
पिछले कुछ हफ़्तों के दौरान इस चिंता को लेकर भारत में हज़ारों युवा संसद की ओर मार्च करने निकले.
पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया. इसके बाद भी हज़ारों छात्र लगातार सड़कों पर उतरते रहे.
बार-बार होने वाले प्रश्नपत्र लीक के ख़िलाफ़ ग़ुस्से से पैदा हुआ युवा-नेतृत्व वाला आंदोलन कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) कुछ ही समय में भारत का पिछले कई वर्षों का सबसे बड़ा स्टूडेंट आंदोलन बन गया है.
आंदोलन शिक्षा व्यवस्था में सुधार और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग कर रहा है. इसके केंद्र में सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक हैं, जिनका कहना है कि आंदोलन के समर्थन में 26 दिन की भूख हड़ताल के दौरान उनका 11 किलो वजन कम हो गया.
उन्होंने गुरुवार देर रात अपना अनशन समाप्त कर दिया, लेकिन स्टूडेंट नेताओं का कहना है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, विरोध प्रदर्शन जारी रहेगा.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ़ एक और स्टूडेंट आंदोलन है, या फिर किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की शुरुआत?
इतिहास दोनों तरह की संभावनाओं की ओर इशारा करता है.
छात्र आंदोलनों से बदली भारत की राजनीति

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समय-समय पर छात्र आंदोलनों ने भारतीय राजनीति की दिशा बदली है. गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन 1970 के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ वरिष्ठ समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की एक बड़ी वजह बना था.
वहीं कई अन्य छात्र आंदोलन भी हुए, जिन्होंने शुरुआत में ज़ोरदार असर डाला, लेकिन कुछ समय बाद उनकी धार कमज़ोर पड़ गई.
हालांकि, सीजेपी को असाधारण बनाने वाली बात सिर्फ़ इसका आकार नहीं है, बल्कि इसकी शिकायत की प्रकृति और उसका व्यापक दायरा भी है.
पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के ख़िलाफ़ हुए कई बड़े आंदोलनों चाहे वे नागरिकता क़ानून, कृषि क़ानूनों या अन्य विवादास्पद नीतियों को लेकर रहे हों, के विपरीत यह आंदोलन मूल रूप से वैचारिक नहीं है.
न ही यह किसी एक समुदाय या सामाजिक समूह के हितों तक सीमित है.
इसके बजाय, यह आंदोलन इस सवाल को सामने रखता है कि क्या स्टेट अब भी उस परीक्षा व्यवस्था में निष्पक्षता की गारंटी दे सकता है, जिसे भारत के लाखों युवा सामाजिक और आर्थिक उन्नति का सबसे बड़ा माध्यम मानते हैं.
ये आंदोलन अलग कैसे है?

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ब्राउन यूनिवर्सिटी में सीनियर विजिटिंग फेलो यामिनी अय्यर ने बीबीसी से कहा, "परीक्षा और शिक्षा व्यवस्था काफ़ी हद तक जाति, वर्ग और लैंगिक सीमाओं से परे जाती है. इन प्रदर्शनों में शामिल होने वाला मुख्य समूह किसी एक ख़ास हित समूह का प्रतिनिधित्व नहीं करता."
यही व्यापकता इस आंदोलन को राजनीतिक रूप से भी अलग बनाती है.
दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के फेलो राहुल वर्मा ने बीबीसी से कहा, "यह आंदोलन प्रशासनिक विफलता पर केंद्रित है. निष्पक्ष तरीक़े से परीक्षाएं कराने और पेपर लीक रोकने में स्टेट की नाकामी इसे बीजेपी के लिए एक बिल्कुल अलग तरह की राजनीतिक चुनौती बनाती है."
वर्मा का कहना है कि यही अंतर इस आंदोलन की राजनीति को बदल देता है. उनके मुताबिक, पहले के आंदोलन जहाँ विचारधारा या नीतियों के इर्द-गिर्द केंद्रित थे, वहीं यह आंदोलन बीजेपी की शासन क्षमता पर सवाल उठाता है. वह कहते हैं, "बीजेपी को अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना होगा."
उनके अनुसार, प्रदर्शन में शामिल होने वाले कई लोग स्वाभाविक रूप से बीजेपी के विरोधी नहीं हैं.
वे कहते हैं, "ये महत्वाकांक्षी युवा भारतीय और उनके माता-पिता हैं, जो इन परीक्षाओं को सामाजिक और आर्थिक उन्नति का रास्ता मानते हैं."
चूंकि उनकी नाराज़गी विचारधारा नहीं बल्कि शासन व्यवस्था से जुड़ी है, इसलिए वर्मा का मानना है कि बीजेपी के लिए अपने समर्थकों को आसानी से एकजुट करना या उन राजनीतिक जवाबी आख्यानों का इस्तेमाल करना मुश्किल होगा, जिनके सहारे उसने पहले के आंदोलनों का सामना किया था. सोमवार के प्रदर्शन इस आकलन को मज़बूत करते हुए दिखाई दिए.
पिछले दो हफ़्तों से इस आंदोलन की तुलना 2011 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से मुख्य रूप से सीजेपी की सोशल मीडिया पर मज़बूत पहुँच को लेकर की जा रही थी.
हालांकि, कई लोगों को संदेह था कि क्या डिजिटल समर्थन वास्तव में सड़कों पर भी दिखाई देगा. सोमवार की भारी भीड़ ने संकेत दिया कि ऐसा संभव है.
'सोशल मीडिया बारूद का ढेर'

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यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में टेक्नोलॉजी और समाज का अध्ययन करने वाले प्रोफ़ेसर जोयोजीत पाल का कहना है कि सोशल मीडिया अब "बारूद के ढेर" की तरह है, जो किसी भी नए मुद्दे पर कभी भी विस्फोट कर सकता है. इसके तेज़ प्रसार और व्यापक पहुंच के पीछे भावनाएं सबसे बड़ी वजह हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा कि लंबे समय से राज्य की जवाबदेही की कमी को लेकर जमा हो रही नाराज़गी ने इस "विस्फोट" की ज़मीन तैयार की.
उनका यह भी कहना है कि सोशल मीडिया की संरचना ऐसी है कि भविष्य में भी इस तरह के उभार बार-बार देखने को मिल सकते हैं.
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया पर शुरू हुआ यह उभार अब एक अधिक स्थायी आंदोलन का रूप ले चुका है.
राहुल वर्मा कहते हैं, "मुझे लगता है कि सोमवार की भीड़ यह संकेत देती है कि यह आंदोलन एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुका है."
उनके मुताबिक, अब यह आंदोलन आगे कितना बढ़ता है, यह काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार इसकी प्रतिक्रिया किस तरह देती है.

यामिनी अय्यर के लिए सोमवार के प्रदर्शन ने एक और महत्वपूर्ण बात उजागर की.
प्रदर्शन में छात्र संगठन, वामपंथी समूह और दलित अधिकार संगठन भीम आर्मी जैसे संगठन मौजूद थे, लेकिन आख़िरकार उनकी संख्या उन छात्रों से कहीं कम थी जो देशभर से स्वतःस्फूर्त तरीक़े से आंदोलन में शामिल होने पहुंचे थे.
वह कहती हैं, "भारत के हाल के इतिहास के किसी भी बड़े आंदोलन की तुलना में यह एक अनोखी बात है."
अय्यर का मानना है कि इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि यह आंदोलन अब उस संगठन और सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल, जिनसे इसकी शुरुआत हुई थी, उनसे आगे निकल चुका है.
वह कहती हैं, "इस आंदोलन की चिंगारी भले ही सीजेपी ने लगाई हो, लेकिन बाद में यह उनसे कहीं बड़ा बन गया."

अय्यर का तर्क है कि छात्र सिर्फ़ इसलिए सड़कों पर नहीं उतरे क्योंकि सरकार ने आंदोलन से जिस तरह निपटा, बल्कि इसलिए भी क्योंकि वे लंबे समय से अपने भीतर की गहरी निराशा और असंतोष को व्यक्त करने के लिए "एक मंच और एक जगह" चाहते थे.
उनके मुताबिक, "मीम, पोस्टर और नारों से साफ़ दिख रहा था कि लोगों की नाराज़गी सिर्फ़ परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक तक सीमित नहीं थी."
शुरुआत में सरकार की ओर से जवाब देने की ज़िम्मेदारी मंत्रियों और पार्टी प्रवक्ताओं पर छोड़ी गई थी.
लेकिन बुधवार को सत्तारूढ़ बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने खुद मोर्चा संभाला. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विपक्ष पर छात्रों का "राजनीतिक औज़ार" की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया.
साथ ही उन्होंने कहा कि सरकार संसद के माध्यम से छात्रों की चिंताओं का समाधान करने के लिए प्रतिबद्ध है.
मोदी का संदेश क्या आंदोलन थाम पाएगा?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को पहली बार सार्वजनिक रूप से इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी.
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, "हमारे युवाओं का भविष्य और उनका कल्याण सबसे महत्वपूर्ण है."
उन्होंने यह भी घोषणा की कि पेपर लीक के मामलों में शामिल लोगों को "तेज़ और कड़ी सज़ा" दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतें बनाई जाएंगी.
उन्होंने कहा, "जो लोग हमारे युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने की कोशिश करेंगे, उन्हें बख्शा नहीं जाएगा."
हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि सरकार के ये आश्वासन आंदोलन को शांत करने के लिए पर्याप्त साबित होंगे या नहीं.
अय्यर का मानना है कि इस आंदोलन ने धीमी पड़ती अर्थव्यवस्था, रोज़गार के सीमित अवसरों और इस बढ़ती भावना जैसी व्यापक चिंताओं को भी आवाज़ दी है कि भविष्य में अवसर लगातार कम होते जा रहे हैं.
अय्यर कहती हैं, "अर्थव्यवस्था को लेकर गहरी असंतुष्टि और परेशानी है, जिसने भविष्य के प्रति उम्मीद को कमज़ोर कर दिया है. यह शायद उस सरकार के प्रति बढ़ती थकान को भी दिखाता है, जो लंबे समय से सत्ता में है. जिन वादों के दम पर उसने अपनी पहचान बनाई थी, उन्हें पूरा न कर पाना अब शायद एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है."
उनके मुताबिक़, यह आंदोलन सिर्फ़ किसी एक नीतिगत विफलता का मामला नहीं है.
वह कहती हैं, "प्रदर्शनकारियों का संदेश साफ़ है - हम थक चुके हैं. हमें एक नई तरह की राजनीति और नई राजनीतिक भाषा चाहिए, जो विचारों पर आधारित हो और जिसका केंद्र सुशासन और नतीजे हों."
हालांकि, क्या यह नाराज़गी लंबे समय तक एक राजनीतिक आंदोलन के रूप में बनी रह पाएगी, यह एक अलग सवाल है.
'सिर्फ़ जेन ज़ी का आंदोलन नहीं'

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राजनीतिक विश्लेषक सुहास पलशीकर का मानना है कि कॉकरोच आंदोलन शायद केवल लोगों के ग़ुस्से को अभिव्यक्त करने का एक माध्यम बनकर रह जाए और बाद में किसानों के आंदोलन की तरह धीरे-धीरे उसकी रफ़्तार कम हो जाए.
उन्होंने एक पर लिखा, "कॉकरोच आंदोलन आगे कहां जाएगा? शायद कहीं नहीं. यह लोगों को अपनी निराशा और ग़ुस्सा व्यक्त करने का अवसर देगा और फिर धीरे-धीरे शांत पड़ जाएगा."
वह इसे ज़ेन ज़ी का आंदोलन बताने के ख़िलाफ़ भी आगाह करते हैं.
उनका कहना है, "इसे युवा आंदोलन या जेन ज़ी आंदोलन मान लेना एक भूल होगी. ऐसी बातें टिप्पणीकारों के लिए सुविधाजनक मिथक भर हैं."
पलशीकर का तर्क है कि इस आंदोलन का "वैचारिक और राजनीतिक चरित्र फिलहाल कमज़ोर है" और समय के साथ अलग-अलग राजनीतिक ताक़तें उस पर अपना प्रभाव स्थापित करने की कोशिश करेंगी.
पलशीकर कहते हैं कि प्रदर्शनकारियों ने एक बात निर्विवाद रूप से साबित कर दी है - वे स्टेट का सामना करने के लिए तैयार हैं.
उनके शब्दों में, "युवाओं ने अपना ग़ुस्सा और अपनी घोर नाराज़गी खुलकर दिखाई है. उन्होंने लोकतांत्रिक सरकार की पुलिस की कठोर कार्रवाई का सामना किया है. उन्होंने यह भी दिखाया है कि इस शासन को सुनने और बातचीत करने के लिए मजबूर करने का रास्ता सड़कों पर उतरकर आंदोलन करना ही है."
हालांकि, पलशीकर का कहना है कि यह ऊर्जा कितने समय तक बनी रहेगी, यह कई बातों पर निर्भर करेगा. इनमें सरकारी दमन, मीडिया की चुप्पी, नेतृत्व से जुड़ी चुनौतियां और व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने की कठिनाई शामिल हैं.

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जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री सुरजीत मजूमदार का भी मानना है कि यह आंदोलन पहले ही परीक्षा प्रश्नपत्र लीक के मुद्दे से कहीं बड़ा रूप ले चुका है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "मौजूदा विरोध प्रदर्शन और इसके प्रति स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया इस बात का संकेत है कि देश की मौजूदा स्थिति और शिक्षा व्यवस्था को लेकर युवाओं और छात्रों में व्यापक असंतोष है, जो केवल पेपर लीक के मुद्दे तक सीमित नहीं है."
उनका कहना है कि पहले के छात्र आंदोलनों की तुलना में मौजूदा आंदोलन "कहीं अधिक व्यापक और बड़े पैमाने का" दिखाई देता है.
मजूमदार इस धारणा से भी सहमत नहीं हैं कि यह आंदोलन विचारधारा से परे है. उनका कहना है कि किसानों के आंदोलन की तरह यह आंदोलन भी दिखाता है कि "भारतीय समाज में लोकतांत्रिक भावना आज भी जीवित है."
अय्यर के मुताबिक़, यह लोकतांत्रिक चेतना पहले ही भारतीय राजनीति का स्वरूप बदल रही है.
वह कहती हैं, "लोग अब चुनावी प्रक्रिया से बाहर भी शासन व्यवस्था के लिए जवाबदेही की मांग कर रहे हैं. चुनावी वैधता और चुनावी दायरे से बाहर लोकतांत्रिक जवाबदेही के बीच जो अंतर उभर रहा है, वही आज भारत की राजनीति की नई परिघटना है."
हालांकि, कॉकरोच जनता पार्टी के इस आंदोलन की सबसे बड़ी विरासत यही बनेगी या फिर यह केवल जनाक्रोश का एक क्षणिक विस्फोट साबित होगा, इसका जवाब समय ही देगा.
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