क्या हम मौत की भविष्यवाणी कर सकते हैं?

मौत की भविष्यवाणी
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मौत का आना तय है. लेकिन क्या इसके आने का वक़्त बताया जा सकता है? कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि मौत की भविष्यवाणी की जा सकती है.

अमरीका में कुछ वैज्ञानिकों ने मक्खियों पर किए तजुर्बे के आधार पर उनकी मौत का दिन बता दिया.

वैज्ञानिकों का मानना है कि किसी भी जीव की ज़िंदगी में एक दौर ऐसा आता है जिसे मौत का दौर कहा जा सकता है. अंग्रेज़ी में इसे 'डेथ स्पाइरल' नाम दिया गया है.

आज से पच्चीस साल पहले तक ये माना जाता था कि ज़िंदगी के सिर्फ़ दो बुनियादी दौर होते हैं.

पहला बचपन का, जिसमें तेज़ी से शरीर का विकास होता है. दूसरा दौर होता है प्रौढ़ता या वयस्क उम्र का. जिसमें तमाम जीव बच्चे पैदा करते हैं.

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इन दोनों दौर में क़ुदरती तौर पर मौत की आशंका कम रहती है.

इसके बाद जैसे-जैसे वक़्त बीतता है हमारा शरीर कमज़ोर होता जाता है. हम तेज़ी से मौत की तरफ़ बढ़ रहे होते हैं.

बूढ़े होने पर ये रफ़्तार और तेज़ हो जाती है. नब्बे के दशक में वैज्ञानिकों ने कहा कि ज़िंदगी में एक दौर 'लेट लाइफ़' का भी आता है. जिसमें लोगों की मौत की आशंका बढ़ जाती है.

अमरीका की कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी के दो वैज्ञानिक लॉरेंस म्यूलर और माइकल रोज़ ने मक्खियों पर किए अपने तजुर्बे से बताया है कि इस 'लेट लाइफ' वाले दौर में पहुंच चुके लोगों की मौत का दिन बताया जा सकता है.

उन्होंने 2800 से ज़्यादा मादा मक्खियों को दो नर मक्खियों के साथ एक दिन एक जार में रखा.

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अगले दिन उन्हें दूसरे नरों के साथ रखा जाता था. फिर रोज़ाना ये गिना जाता था कि मक्खियों ने कितने अंडे दिए.

अंडों की गिनती का ये काम तब तक किया जाता था जब तक मक्खियां मर नहीं जाती थीं.

मक्खियों की औसत उम्र कुछ हफ़्तों की होती है. रोज़ाना, मक्खियों के जार बदलना और उनके अंडों की गिनती मुश्किल काम था.

मगर म्यूलर और रोज़ ने ये काम कुछ छात्रों की मदद से पूरा किया.

इस मुश्किल तजुर्बे से एक बात सामने आई. वो ये कि मौत से कुछ दिन पहले मादा मक्खी अंडे देना बंद कर देती है. यानी बच्चे पैदा करने की उसकी कूवत में कमी आ जाती है.

अगर ऐसा होता है तो ये संकेत इस बात का होता है कि मौत क़रीब है.

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कोई भी मक्खी, चाहे उसकी उम्र 60 दिन की हो या 15 दिन की, अगर वो अंडे देना बंद कर देती है, तो ये इस बात का संकेत है कि मौत क़रीब है.

अंडे देने बंद करने के बाद से मौत के दिन तक के दौर को वैज्ञानिकों ने 'डेथ स्पाइरल' का दौर करार दिया है.

बाद में यही चीज़ नर मक्खियों में भी देखी गई. उनकी भी बच्चे पैदा करने की क्षमता में मौत से कुछ दिन पहले भारी गिरावट देखी जाती है.

मक्खियों के अंडे देने की रफ़्तार या नर मक्खियों के सेक्स करने की क्षमता में गिरावट को देखते हुए उनकी मौत का दिन बताया जा सकता है.

वैज्ञानिकों ने ऐसा किया भी और 80 फ़ीसदी मामलों में उनका अंदाज़ा सही निकला.

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ऐसे रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों में म्यूलर और रोज़ के अलावा कई और लोग भी हैं.

ऐसे ही एक वैज्ञानिक हैं अमरीका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी के जेम्स कर्टसिंगर.

उन्होंने भी मक्खियों पर तजुर्बा किया और पाया कि मक्खियों की मौत का उनके अंडे देने की क्षमता में गिरावट से सीधा ताल्लुक़ है.

अगर कोई जवान मक्खी भी अंडे देना बंद कर देती है, तो वो कम उम्र में मर जाती है.

हालांकि कर्टसिंगर ये नहीं मानते कि मक्खियों पर हुए इस तजुर्बे से इंसानों की मौत की भविष्यवाणी की जा सकती है.

मौत से पहले की ज़िंदगी के आख़िरी दौर को भी वो 'डेथ स्पाइरल' के बजाय 'रिटायरमेंट' के नाम से बुलाना चाहते हैं.

वो कहते हैं कि मक्खियों की उम्र में रिटायरमेंट के दौर को आसानी से पहचाना जा सकता है.

वो कहते हैं कि ये दौर उस दिन से शुरू होता है जब कोई भी मक्खी, किसी दिन एक भी अंडे नहीं देती.

कर्टसिंगर बताते हैं कि मक्खियां, अंडे देने की मशीन होती हैं. कुछ हफ़्तों की अपनी ज़िंदगी में वो 1200 अंडे देती हैं.

ऐसे में अगर वो एक दिन एक भी अंडे न दें, तो समझो कि कुछ गड़बड़ है.

हालांकि मौत और बच्चे पैदा करने की क्षमता के बीच ये कैसा संबंध है और क्यों है? इस सवाल का जवाब वैज्ञानिकों के पास नहीं.

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अमरीका की कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक, जेम्स कैरे के पास इस सवाल का जवाब हो सकता है.

वो कहते हैं, बच्चे पैदा करने के बाद कई तरह की ज़िम्मेदारियों का बोझ बढ़ जाता है. इससे मादा की सेहत ख़राब होती है.

जैसे कि मां बनने के बाद महिलाओं को दांत की परेशानी होने लगती है. कई बच्चे होने पर ये परेशानी बीमारी का रूप धर लेती है.

एक दशक पहले जेम्स और उनके साथियों ने एक तजुर्बा किया. उन्होंने कुछ बूढ़ी हो चुकी चुहियों का ऑपरेशन किया.

उनके पुराने पड़ चुके गर्भाशय हटाकर, जवान चुहियों के गर्भाशय ट्रांसप्लांट कर दिए. इससे बूढ़ी चुहियाओं की सेहत भी बेहतर हो गई. उनकी उम्र भी बढ़ गई.

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वैसे कर्टसिंगर भले न मानें, मगर, म्यूलर और उनके साथी मानते हैं कि इंसान भी, दूसरे जीवों की तरह डेथ स्पाइरल के दौर से गुज़रते हैं.

उस वक़्त उनकी मौत के दिन का अंदाज़ा लगाने की कोशिश की जा सकती है.

क्योंकि बुढ़ापे में आपको कई तरह की कमज़ोरियां हो जाती हैं. याददाश्त कमज़ोर पड़ जाती है.

मुश्किलों का सामना करने की कूवत कम हो जाती है. डेनमार्क में हुए एक तजुर्बे से ये बात साफ़ हो गई थी कि मौत से पहले आदमी दिमाग़ी तौर पर भी कमज़ोर हो जाता है.

म्यूलर मानते हैं कि मक्खियों पर हुए उनके तजुर्बे के आधार पर अगर, इंसानों की मौत के दिन का पता चल जाए, तो डेथ स्पाइरल के दौर को कम किया जा सकता है.

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मौत तो तय है, मगर उससे पहले की जो तकलीफ़ है, वो कम हो जाए तो इंसान के लिए मरना उतना तकलीफ़देह नहीं रह जाएगा.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"> <caption> यहां क्लिक करें</caption> <url href="http://www.bbc.com/earth/story/20160620-can-we-predict-the-time-of-our-death" platform="highweb"/> </link>, जो <link type="page"> <caption> बीबीसी अर्थ</caption> <url href="http://www.bbc.com/earth/uk" platform="highweb"/> </link> पर उपलब्ध है.)

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