कैसे होती है समुद्र के अंदर ख़ज़ाने की खोज?

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आपको जल्दी से अमीर बनना है. सोचते हैं कि कहीं से कोई छुपा हुआ पुराना ख़ज़ाना मिल जाए. ठीक है. चलिए आपको ले चलते हैं करोड़ों के ख़ज़ाने की तलाश के मिशन पर.

ये ख़ज़ाना छुपा हुआ है समंदर की अथाह गहराइयों के भीतर, दस बीस पचास नहीं पूरे डेढ़ सौ सालों से समंदर में पड़ा हुआ है.

ये ख़ज़ाना पड़ा है अटलांटिक महासागर की गहराइयों में... अमेरिकी समुद्र तट से क़रीब सौ मील दूर. एक डूबे हुए जहाज़ के मलबे के अंदर कहीं दबा हुआ है. डेढ़ सौ बरस से ज़्यादा वक़्त गुज़रा, इंग्लैंड से अमेरिका आते हुए ये जहाज़ डूब गया था. एक हादसे की वजह से अटलांटिक की अथाह गहराइयों में समा गया था और अपने साथ लेता गया था, करोड़ों डॉलर का सोना-चांदी जो जहाज़ पर लदा हुआ था.

इसी ख़ज़ाने को तलाशने और समंदर की गहराइयों से निकालने के मिशन पर काम कर रही है...ट्रेज़र हंटर्स की एक टीम...ट्रेज़र हंटर्स यानी, ख़ज़ाना तलाशने वाले.

ये टीम इकट्ठा हुई है, अमेरिका के मैसाचुसेट्स राज्य के ग्लोसेस्टर शहर में. अटलांटिक किनारे बसा हुआ ये अलसाया सा शहर, जिसके समुद्री किनारों पर छुट्टियां मनाने वाले, यूं ही वक़्त गुज़ारने वाले और समुद्र में शौक़िया नाव चलाने वाले जमा हैं.

इन्हीं लोगों के बीच आपको नज़र आएंगे, मीका एल्ड्रेड. फ्लोरिडा के रहने वाले एल्ड्रेड अपनी सर्च बोट को जांच परख रहे हैं. उस पर रखी तमाम मशीनों, चरखी, रस्से और पानी के भीतर काम करने वाला रोबोट, को वो देख रहे हैं. ये वो साधन हैं, जिनकी मदद से वो अटलांटिक की गहराइयों में दबे पड़े जहाज़ से ख़ज़ाना निकालने के मिशन में अगला क़दम बढ़ाने वाले हैं.

जिस जहाज़ के ख़ज़ाने की तलाश वो कर रहे हैं, उसका नाम था एस एस कनाट. अपने वक़्त में वो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्टीमर था. 370 फुट लंबा वो जहाज़, एक हज़ार लोगों ने मिलकर क़रीब नौ महीनों तक दिन-रात मेहनत करके बनाया था.

वो इंग्लैंड से अटलांटिक पार स्थित अमरिका का लंबा सफर एक बार तय कर चुका था. मगर, अपने दूसरे दौरे पर वो जहाज़, सन 1861 में ग्लूसेस्टर के समुद्र तट से क़रीब सौ मील दूर हादसे का शिकार हो गया था. पहले एस एस कनाट के इंजिन रूम मे पानी भरने लगा था, जैसे तैसे उसे रोका गया तो न जाने कैसे उसमें आग लग गई.

एक के बाद एक, दो मुसीबतों से जूझते , जहाज़ पर सवार क़रीब छह सौ लोगों को तो पास से गुज़रते एक छोटे से जहाज़ ने बचा लिया था. मगर, एस एस कनाट को डूबने से नहीं बचाया जा सका था. कनाट के साथ ही डूब गया था, उस पर लदा हुआ सोना, जिसकी क़ीमत आज करोड़ों डॉलर आंकी जा रही है.

इसी जहाज़ के ख़ज़ाने को निकालने के मिशन पर हैं फ्लोरिडा के मीका एल्ड्रेड. वो कोई प्रोफेशनल ट्रेज़र हंटर नहीं, या ख़ज़ाना तलाशने वाले नहीं. वो कारोबार में अच्छा ख़ासा पैसा और नाम कमा चुके हैं. फ्लोरिडा में बचपन गुज़ारने वाले एल्ड्रेड अपने पिता के साथ समंदर में सैर के लिए जाते थे. मछलियां मारते थे, समुद्र में डुबकी लगाना, डूबे हुए जहाज़ों के मलबे खोजना उन्हें पसंद था.

उसी वक़्त उन्होंने ट्रेज़र हंटर मेल फ़िशर का क़िस्सा सुना था. फ़िशर ने फ्लोरिडा के पास डूबे स्पेनिश जहाज़ 'द अटोचा' गहराइय़ों में डूबे ख़ज़ाने को समुद्र की तलहटी से ढूंढकर निकाला था. एल्ड्रेड, समुद्र में डूबे ख़ज़ानों की तलाश के क़िस्से शौ़क़ से पढ़ते थे. मगर ऐसे ख़ज़ाने तलाशने का लालच उन्हें कभी नहीं आया.

पढ़ाई के दौरान ही एल्ड्रेड को शेयर बाज़ार में दिलचस्पी हो गई. ग्रेजुएशन के दौरान ही वो शेयर बाज़ार के उतार चढ़ाव से एक लाख डॉलर सालाना कमाने लगे थे. पढ़ाई बीच में ही छोड़कर एल्ड्रेड ने अपना ख़ुद का ट्रेडिंग बिज़नेस शुरू किया. कामयाबी हासिल की, पैसे कमाए.

पर, अब वो कुछ अलग करना चाहते हैं. वो समुद्र में छुपे ख़ज़ाने की तलाश करना चाहते हैं, इस काम के लिए उन्होंने एन्ड्योरेंस एक्सप्लोरेशन ग्रुप के नाम से एक कंपनी बनायी है. कामयाबी की गारंटी हो, इसके लिए एल्ड्रेड ने खोज-खोजकर बेहतरीन लोगों की टीम बनाई है.

इस टीम ने चार साल पहले समुद्र में डूबे ख़ज़ाने की तलाश पर रिसर्च शुरू की थी. पहला क़दम था, ऐसे जहाज़ का पता लगाना जिसमें इतना ख़ज़ाना हो कि उसे निकालने में जो पैसा लगे, उसका ख़र्च भी निकल आए और उनकी बरसों की मेहनत का इनाम भी मिले. अब समुद्र में तो बहुत से जहाज़ डूबे हैं. कोई सौ साल पहले तो कोई दो सौ बरस पहले.

अब उस जहाज़ के बारे में जब तक पक्के तौर पर जानकारी न हो, तो तलाश बेमानी है. फिर, जहाज़ तट से कितनी दूर डूबा, कितनी गहराई में उसका मलबा पड़ा है. क्या ये मुमकिन है कि उसे बाहर निकाला जा सकता है. समुद्र के भीतर किन चुनौतियों, किन ख़तरों का सामना करना होगा, इन सब सवालों के जवाब खोजने होते हैं.

बहरहाल, एल्ड्रेड और उनके साथियों की टीम ने क़रीब डेढ़ हज़ार डूबे हुए जहाज़ों की लिस्ट से शुरुआत की थी. और...काट-छांटकर इसे बीस तक घटा लाए. इन बीस जहाज़ों की लिस्ट में एस एस कनाट पहले नंबर पर था.

रिसर्च का ये पूरा काम किया था एल्ड्रेड की रिसर्च टीम ने. जिसके मुखिया हैं टेलर ज़ायोंस. टेलर ने अमेरिका और दूसरे देशों की लाइब्रेरी में घंटों तलाश की, दूसरे देशों में भटके. अख़बारों में उस वक़्त छपी ख़बरों को खंगाला. तब जाकर एस एस कनाट के बारे में तमाम जानकारी जुटा सके.

मगर, अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद टेलर, जहाज़ की बनावट का प्लान नहीं जुटा सके. जिससे ये पता लग सके कि मलबे के भीतर, ख़ज़ाना कहां रखा हो सकता है. अब उन्हें एस एस कनाट की बनावट के प्लान के बग़ैर ही अपने मिशन पर आगे बढ़ना होगा.

फिर भी टेलर और उनकी टीम ने एस एस कनाट के बारे में ढेर सारी जानकारियां जुटा ली हैं. मसलन, ये जहाज़ 21 अप्रैल 1860 को पहली बार अमेरिका के सफर पर, इंग्लैंड के न्यूकैसल से अमेरिका के लिए रवाना हुआ था. लेकिन, उसका दूसरा सफर कभी पूरा नहीं हो सका.

6 अक्टूबर 1860 को इंग्लैंड से अमेरिका आते वक़्त, जब एस एस कनाट बोस्टन शहर से महज़ सौ मील की दूरी पर था, तो पहले उसके इंजन रूम में लीकेज का पता चला. जैसे तैसे ये मुसीबत टाली गई, तो इंजन रूम से आग निकलती देखी गई.

मुश्किल वक़्त मे कनाट के कैप्टेन ने पास से गुज़र रहे जहाज़ों से मदद की गुहार लगाई. एक छोटा कारोबारी जहाज़ पास आया, जिसका नाम था मिनी शिफर. कैप्टेन ने कनाट पर सवार सभी 600 लोगों को तो बचा लिया, मगर अपने जहाज़ को नहीं बचा सके. और उसी के साथ डूब गया, उस पर लगा हुआ ख़ज़ाना. पिछले डेढ सौ सालों से वो वैसे ही अटलांटिक की गहराइयों में पड़ा हुआ है.

2015 की गर्मियों में एल्ड्रेड और उनके साथियों ने अटलांटिक के भीतर, एस एस कनाट का मलबा खोजने में कामयाबी हासिल कर ली. आधुनिक मशीनों की मदद से एन्ड्योरेंस की टीम ने समुद्र में तीन सौ मीटर की गहराई से, जहाज़ के मलबे से बोन चाइना की प्लेट, इत्र की शीशी और कांच की बोतल ढूंढ निकाली थी चाइना प्लेट पर उस कंपनी की मुहर थी, जो एस एस कनाट कंपनी की मालिक थी, अटलांटिक रॉयल मेल स्टीम नेविगेशन कंपनी.

एल्ड्रेड ने फौरन ग्लूसेस्टर में अमेरिकी कस्टम अधिकारियों को इसकी ख़बर दी. क़ानूनी तौर पर ये ज़रूरी है. जहाज़ अमेरिकी समुद्री सीमा के भीतर नहीं डूबा. मगर, फिर भी क़ानूनी तौर पर इसके मलबे या दूसरे सामान के मिलने पर क़रीबी देश को ख़बर करना ज़रूरी है.

मगर, अमेरिकी कस्टम अफसर ने उनके निकाले सामानों में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं ली और ये कहते हुए फ़ोन रख दिया कि जब कुछ ढंग की चीज़ मिले तो फ़ोन करना. ढंग की चीज़ से उसका मतलब शायद सोने-चांदी के सिक्कों से रहा होगा.

कस्टम अफ़सर भले बेज़ार हुआ हो, अपनी इस कामयाबी से एल्ड्रेड और उनके साथियों का हौसला सातवें आसमान पर था. उनकी कंपनी को बरसों की मेहनत और हज़ारों डॉलर के ख़र्च से ये कामयाबी मिली थी.

इसके लिए उन्होंने न्यूज़ीलैंड के शौक़िया नाविक पियर्स लेनक्स किंग की मदद ली थी. किंग दुनिया भर में नाव से शौक़िया सैर करते थे. समंदर में मुसीबत में फंसे लोगों की मदद करते थे और अपने जोखिम भरे तजुर्बों पर ब्लॉग लिखते थे.

एन्ड्योरेंस की टीम ने समुद्र के भीतर सोनार सिस्टम की मदद से मलबे की तस्वीरें लेने की सोची थी. इसके लिए रिमोट से चलने वाले रोबोट की मदद भी ली गई थी. इस काम में किंग का तजुर्बा बहुत काम आया था. जब समुद्र के भीतर जहाज़ का मलबा दिखा तो किंग ख़ुशी से झूम उठे थे.

लेकिन ये शुरुआती उत्साह ठंडा पड़ गया, जब, टीम एन्ड्योरेंस बेहतर सोनार सिस्टम और बड़े रोबोट सिस्टम के साथ समुद्र की गहराइयों में उतरी. पता चला कि एस एस कनाट का मलबा बुरी तरह मछली मारने के जाल में उलझा हुआ है. पहली बार की तस्वीरों में ये जाल नहीं दिखे थे.

ख़ज़ाने तक पहुंचने के लिए सबसे पहले मलबे से ये जाल हटाना ज़रूरी था. जब सोनार सिस्टम से ली गई तस्वीरों को एल्ड्रेड और टेलर ने अपने लैपटॉप पर देखा तो उन्हें अपनी चुनौती का अंदाज़ा हुआ. जहाज़ के मलबे से क़रीब सौ फुट ऊपर लिपटा हुआ ये बहुत बड़ा जाल था. इसे हटाना उनके बस की बात नहीं थी. इसके लिए चाहिए थे अलग तरह के स्पेशलिस्ट.

एल्ड्रेड ने अमेरिका के मैरीलैंड में ऐसे लोगों को खोज निकाला. मेरीलैंड में स्थित कंपनी एक्लिप्स ग्रुप को समुद्र में से फंसे लोगों और जहाज़ों को निकालने में महारत हासिल है. वो एल्ड्रेड और उनकी टीम के लिए एक ख़ास तरह का लोहे का बड़ा सा पंजा बना रहे हैं, जिसकी मदद से कनाट के मलबे से लिपटा जाल खींचकर अलग किया जाएगा.

जो लोहे का पंजा एल्ड्रेड के लिए एक्लिप्स ग्रुप के इंजीनियर बना रहे हैं वो क्रेन की मदद से समुद्र के भीतर क़रीब पौने तीन सौ मीटर की गहराई में उतारा जाएगा, जाल को मलबे से खींचकर अलग करने के लिए. ये पंजा खेती की एक मशीन में बदलाव करके बनाया जा रहा है.

एक्लिप्स ग्रुप के मुखिया, स्टीव एमोर भी एक दिलचस्प शख़्सयत हैं. समुद्र के भीतर डूबी चीज़ों को निकालने के उस्ताद. वो टाइटैनिक फ़िल्म के निर्देशक जेम्स कैमरून के साथ काम कर चुके हैं. दो बार टाइटैनिक के मलबे तक समुद्र में डुबकी लगा चुके हैं. जून 2009 में अटलांटिक में डूबे एयर फ्रांस की फ्लाइट 447 के मलबे को उन्होंने ही निकाला था. इसके अलावा उन्होंने समुद्र की गहराइयों से ऐसे ही और डूबे विमानों के कई मलबे निकाले हैं.

एमोर कहते हैं कि उनके बरसों लंबे करियर में ये पहला मौक़ा है जब वो ख़ज़ाने की तलाश के किसी मिशन से जुड़े हैं. वो अपने गले में एक ख़ास सिक्का पहने हुए हैं, जिसे उन्हें मशहूर ट्रेज़र हंटर मेल फ़िशर ने दिया था, जब वो उनसे अचानक टकराए थे. फ़िशर ने ये सिक्का, फ़्लोरिडा के पास डूबे स्पेनिश जहाज़ अटोचा से निकाला था.

इससे पहले जब वो ठीक से जवां भी नहीं हुए थे, तो अपने मां-बाप के झगड़ों से तंग आकर, वो एक नाव लेकर निकल पड़े थे, 1717 में डूबे समुद्री डाकुओं के जहाज़ विदाह की तलाश में. मगर, ख़ज़ाना तलाशने के उस्ताद बैरी क्लिफर्ड ने उन्हें मात दे दी थी. ये बात 1981 की है.

इसके अलावा, उनका ख़ज़ाने की तलाश करने वालों से कोई वास्ता नहीं रहा. इसीलिए जब पहली बार एल्ड्रेड ने उनसे मदद मांगी तो उन्हें पहले भरोसा नहीं हुआ. वजह साफ है. दूसरों के पैसे से अमीर बनने का ये फॉर्मूला एमोर को पसंद नहीं. लेकिन जब एल्ड्रिड और टेलर की बातों से उन्हें लगा कि ये पैसे का नहीं, किसी बड़े मक़सद का मामला है, तो वो ख़ुशी से एन्ड्योरेंस की टीम का हिस्सा बन गए.

एमोर की फ़िक्र की वजह टॉमी थॉमसन जैसे ट्रेज़र हंटर हैं. टॉमी थॉमसन ने कई लोगों की मदद से 1980 के दशक में समुद्र के भीतर से एक ख़ज़ाना खोज निकाला था. लेकिन साल 2012 में ऐसे ही खज़ाने की खोज के बाद वो क़ानूनी विवाद से बचने के लिए भाग निकला.

उसने ख़ज़ाने की रकम न अपने साथियों से बांटी और न उसने निवेशकों को पैसे दिए. वो सारी रकम लेकर भाग निकला. हालांकि साल 2014 में उसे अमेरिका के फ्लोरिडा से खोज निकाला गया. अदालत से इस धोखेबाज़ी के लिए थॉमसन को दो साल क़ैद की सज़ा हुई.

मगर दग़ाबाज़ी से इतर, भविष्य में ख़ज़ाना तलाशने वालों के लिए टॉमी की एक देन हमेशा काम आएगी. वो है समुद्र के भीतर काम करने वाले रोबोट. थॉमसन ने इसका नाम नेमो रखा था. नेमो और ऐसी ही औऱ तकनीकी तरक़्क़ियो की मदद से आज समुद्र के भीतर से ख़ज़ाना खोज लाने का काम अगर आसान नहीं हुआ तो कम मुश्किल ज़रूर हुआ है.

यही वजह है कि आज बेहतर तकनीक की मदद से बहुत से लोग ख़ज़ाना तलाशकर अमीर बनने के ख़्वाब देख रहे हैं. लेकिन, एल्ड्रेड, टेलर औऱ एमोर की टीम का मक़सद अमीर बनने से ज़्यादा बड़ा है.

एन्ड्योरेंस कंपनी ने अब बोस्टन की एक कंपनी ब्लूफिन रोबोटिक्स की भी मदद मांगी है. इस कंपनी ने पानी के भीतर काम करने वाले ड्रोन बनाए हैं.

इन ड्रोन्स का इस्तेमाल, मलयेशिया के लापता हुए जहाज़ फ्लाइट एमएच370 की तलाश में भी किया गया था. साथ ही माइक्रोसॉफ्ट के अधिकारी पॉल एलेन ने भी दूसरे विश्व युद्ध के दौरान डूबे जहाज़ को निकालने में ब्लूफिन के इस पानी में चलने वाले ड्रोन की मदद ली थी.

रोबोट्स के मुक़ाबले ड्रोन्स की मदद से पानी के भीतर किसी चीज़ की तलाश ज़्यादा आसान है. रोबोट को बाहर से रिमोट से चलाना पड़ता है, किसी चीज़ से टकराने पर आपको नए सिरे से उसकी पोज़ीशन बदलने की मशक़्क़त करनी होती है.

वहीं ड्रोन, ख़ुद अपना रास्ता तलाशते हैं. किसी चीज़ से टकराने से पहले रास्ता बदल लेते हैं. पानी के भीतर ये ड्रोन किसी सैटेलाइट की तरह काम करते हैं. और तलहटी में पड़ी किसी चीज़ की तस्वीर भी ले सकते हैं, सोनार सिस्टम की मदद से.

तकनीक की ये तरक़्क़ी एल्ड्रेड और उनके साथियों के बड़े काम आ रही है. हालांकि किसी को पक्के तौर पर नहीं मालूम की समुद्र की गहराइयों में ऐसे कितने ख़ज़ाने छुपे हुए हैं. जिनकी तलाश से मालामाल हुआ जा सकता है. अटकलों का बड़ा बाज़ार है. समुद्र के अंदर ख़ज़ाना तलाशने के लिए हौसले से भरपूर एल्ड्रेड जैसे लोग हैं. अरबों डॉलर के सोने-चांदी, समुद्र से निकालकर रातों-रात अरबपति बनने का ख़्वाब है.

मगर एल्ड्रेड, इसके आगे की सोचते हैं. वो कहते हैं कि सोने से अमीर होने का उन्हें लालच नहीं. उन्हें तो इस काम में लगने वाली तकनीक और इंजीनियरिंग को जानने-परखने का उत्साह ज़्यादा है.

वो चाहते हैं कि एस एस कनाट के ख़ज़ाने को गहरे समंदर से निकालने से जो कामयाबी मिलेगी, वो उनकी कंपनी एन्ड्योरेंस को शोहरत की नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी. लाखों डॉलर का मुनाफ़ा होगा. आगे ख़ज़ाने की तलाश करने वाले उनके तजुर्बे की मदद लेंगे. ये एक जोखिम भरा कारोबार है. मगर इसे करने का रोमांच उन्हें इस तरफ खींच लाया है.

अब इस रोमांच भरे कारोबार में थोड़ा सोना भी मिल जाए तो बुरा क्या है?

पर अभी तो एल्ड्रेड और उनकी टीम, मेरीलैंड में एक्लिप्स कॉर्पोरेशन के दफ़्तर में बैठकर, इस राह में आने वाली चुनौतियों की बात कर रही है.

वो रोबोट कंट्रोल की खींची हुई तस्वीरें देखकर अंदाज़ा लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि जहाज़ के इस मलबे के भीतर आख़िर कहां पर छुपा होगा, इसमें लदा ख़ज़ाना. ये फुटबॉल के मैदान में किसी एक कोने में गड़े सोने के सिक्के तलाशने जैसा है.

मगर एल्ड्रेड और उनके साथियों को यक़ीन है कि वो कामयाब होंगे. आख़िर पिछले कई सालों से वो पूरे धीरज से इस काम में जुटे हैं. पैसा लगाया है, वक़्त दिया है, दुनिया भर से बेहतरीन लोगों की टीम जुटाई है. और साथ में है कामयाबी का पक्का इरादा.

एल्ड्रेड कहते हैं कि सिक्के बहुत दिन रह लिए समंदर के भीतर, अब उनके रौशन दुनिया में आने का वक़्त आ गया है.

एल्ड्रेड के इरादे देखकर हम उन्हें कहेंगे...आमीन

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