अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने कहा, 'यह इतिहास का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट है'

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अमेरिका और इसराइल के ईरान पर हमलों के बाद शुरू हुई जंग ने अब तक का सबसे भीषण ऊर्जा संकट खड़ा कर दिया है.
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के प्रमुख फ़ातिह बिरोल ने फ़्रांस इंटर रेडियो पर प्रसारित एक इंटरव्यू में कहा, "यह वास्तव में इतिहास का सबसे बड़ा संकट है."
ईरान युद्ध के बाद से होर्मुज़ सट्रेट से जहाज़ों का गुज़रना लगभग बंद पड़ा है. इस युद्ध से पहले दुनिया भर में तेल और गैस सप्लाई का क़रीब 20 फ़ीसदी हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से होकर सप्लाई होता रहा है.
इसके अलावा ईरान युद्ध के दौरान खाड़ी के क्षेत्र में कई देशों के ऊर्जा ठिकानों को भी निशाना बनाया गया है. युद्ध के दौरान कई संयंत्रों को हुए नुक़सान को पूरी तरह ठीक करने में कुछ महीनों से लेकर कुछ साल तक का वक़्त लग सकता है.
बिरोल ने पहले कहा था कि वो वर्तमान ऊर्जा स्थिति को साल 1973, 1979 और 2022 के संकटों से कहीं अधिक ख़राब मानते हैं.
साल 1973 के अरब-इसराइल युद्ध के बाद एक बड़ा तेल संकट पैदा हुआ था. जबकि साल 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति के वक़्त भी यह संकट पैदा हुआ था.
वहीं साल 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भी यूरोपीय देशों में ऊर्जा का बड़ा संकट पैदा हुआ था.
युद्ध शुरू होने के बाद, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने तेल की बढ़ती क़ीमतों का मुक़ाबला करने के लिए वैश्विक रणनीतिक भंडार से अभूतपूर्व रूप से 40 करोड़ बैरल तेल जारी किया है.
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का मुख्यालय पेरिस में है. यह ऊर्जा बाज़ार में आंकड़े, विश्लेषण और नीति निर्माण पर 31 सदस्य देशों और इससे जुड़े ग़ैर-सदस्य देशों को सलाह देती है.












