आप अपने सपनों का रिकॉर्ड रख सकते हैं

सपनें
    • Author, क्रिस बारानियूक
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
  • प्रकाशित

सपने क्या हैं? हम दिन भर जो काम करते हैं, जो बातें करते हैं वो सब हमारे दिमाग़ कि किसी अलमारी में जमा होती रहती हैं.

फिर जब हम सो जाते हैं तब हमारा दिमाग़ उन बातों की जांच-परख करता है.

हमारे अवचेतन मन और दिमाग़ के बीच बात-मुलाक़ात होती है.

ये दोनों जैसी बातें करते हैं, उसकी एक तस्वीर हमारे सामने बनती चली जाती है.

इन्हें ही हम ख़्वाब कहते हैं. दुनिया में ऐसा कोई शख्स नहीं जिसे सपने ना आते हों.

कुछ ख्वाब हमें लंबे वक्त तक याद रहते हैं, तो कुछ आंख खुलने के साथ ही ख़त्म हो जाते हैं.

लेकिन अब आप अपने सपनों का रिकॉर्ड रख सकते हैं. इसके लिए बहुत से ऐप्स आ गए हैं.

स्मार्ट फोन पर भी इन्हें महफ़ूज़ रखा जा सकता है.

लेकिन ये जानना दिलचस्प है कि आखिर सपनों का रिकॉर्ड रखने का ख़्याल सबसे पहले किसके ज़हन में आया?

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वो कौन शख़्स था जिसने इसकी शुरूआत की?

ख्वाबों को शब्दों का अमली जामा पहनाने का विचार इंसान को तब से आया, जब से हमारे पुरखों ने अपने ख़्यालात और सोच को ज़बान देना सीखा.

उससे पहले ख़्वाब का नज़र आना बेमानी था.

सपनों का रिकॉर्ड रखने की दिशा में पहली कोशिश दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमरीका के मनोवैज्ञानिक बर्ट काप्लान ने की.

काप्लान के ख़्याल को हाल ही में क़िताब की शक्ल में जमा किया गया है.

इसका नाम है, 'डेटाबेस ऑफ़ ड्रीम्स'. इसमें हार्वर्ड की छात्रा रेबेका लेमोव का बड़ा रोल रहा.

वैसे इस डेटाबेस ऑफ ड्रीम को जमा करने का काम क़रीब पचास सालों से चल रहा था.

इसमें बहुत से लोगों ने अपना योगदान दिया. इसकी शुरुआत पिछली सदी में पचास के दशक से हुई थी.

जब कुछ एंथ्रोपोलॉजिस्ट यानी इंसान के बारे में पढ़ाई करने वालों ने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से तमाम लोगों के इंटरव्यू लिए.

इनसे हुई बातचीत का लेखा-जोखा उन्होंने बहुत छोटे-छोटे कार्ड की शक्ल में रखा था.

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ये ऐसे जादुई कार्ड थे जिन पर क़रीब सौ पेज के ख्वाबों को भी लिखा गया.

जिन्हें पढ़ने के लिए लेंस की मदद लेनी पड़ती थी. रेबेका ने इन सभी कार्ड में छुपी जानकारी को जमा किया.

इसे डिजिटल आंकड़े में तब्दील किया. यही आंकड़े और जानकारी अब क़िताब की शक्ल में हमारे सामने हैं.

रेबेका लेमोव का कहना है कि कुछ सपने ऐसे होते हैं जिनका हम कोई मतलब निकाल सकते हैं.

वहीं कुछ सपने ऐसे भी होते हैं जिनका कोई सिर-पैर ही नहीं होता.

इसलिए ये कहना मुश्किल है कि ख़्वाब का कोई सटीक मतलब होगा ही, बहुत बार सपनों का अर्थ पकड़ से दूर होता है.

लिहाज़ा ऐसे ख़्यालों की दुनिया में तैरते ख़्वाबों का रिकॉर्ड रखना भी मुश्किल है.

लेकिन कुछ ऐसे भी रिसर्च स्कॉलर हैं जो ये मानते हैं ख्वाबों की ताबीर में टेक्नोलॉजी मददगार साबित हो सकती है.

जैसे ड्रीमबोर्ड और शैडो दो ऐसे ऐप्स हैं जिनकी मदद से ख़्वाबों को समझा जा सकता है.

शेडो ऐप को बनाने वाले हंटर ली सोइक का कहना है कि इस एप में क़रीब दस हज़ार लोगों के ख़्वाबों का डेटा मौजूद है.

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इनकी मदद से आप अपने ख़्वाब का मतलब निकाल सकते हैं. हर सपने का मतलब भी फीड किया हुआ है.

लेकिन ली ये भी मानते हैं इतने लोगों के सपनों की डीटेल होने के बावजूद पक्के तौर पर ये कह पाना मुश्किल है कि जो ख़्वाब आपने देखा है उसका वही मतलब हो जो ऐप में फीड किया गया है.

ली मिसाल देते हुए बताते हैं कि रिसर्च के नतीजों में उन्होंने ये पाया है कि पूर्णिमा के वक्त जो सपने देखे जाते हैं उनमें हिंसा और सेक्स का ख़्याल ज़्यादा होता है.

लेकिन ऐसा सभी के सपनों में होता है ये मानना भी मुश्किल है.

कुछ लोगों के लिए उनके सपनों का मतलब कुछ और भी हो सकता है.

बहरहाल इस ऐप में कुछ ऐसे शब्द फ़ीड किये हुए हैं जो आपको आपके सपने का मतलब समझाने में मददगार साबित हो सकते हैं.

जैसे अगर आपने ख़्वाब में गॉडज़िला को देखा है तो उसका क्या-क्या मतलब हो सकता है, इस ऐप से आप जान सकते हैं.

अमरीकी मनोवैज्ञानिक पैट्रिक मैक्नमारा इस दावे को सिरे से ख़ारिज करते हैं कि किसी तरह के डेटाबेस ख़्वाब का मतलब बता सकते हैं.

यहां तक कि साइंस भी ख़्वाबों का मतलब समझाने में नाकाम है.

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दरअसल ये डेटाबेस लोगों से उनके ख़्वाबों के बारे में जानकारी लेकर तैयार किये जाते हैं.

अब ये ज़रूरी नहीं की सभी अपने सपने के बारे में आपसे खुलकर बात करे.

कई मर्तबा ख़्वाब की तफ़सील देते हुए लोग कई बातों को बढ़ा-चढ़ा कर भी बता सकते हैं.

कुछ लोग अपने सपनों की बहुत सी बातें छुपा भी सकते हैं. ऐसे में रिसर्च के नतीजों पर इसका असर पड़ता है.

बहरहाल ड्रीमबोर्ड एप्स को चलाने वालों की दलील है कि वो ये कोशिश करते हैं कि लोग उन्हें बेबाक होकर अपने सपनों के बारे में बताएं ताकि रिसर्च को ज़्यादा से ज़्यादा भरोसेमंद बनाया जा सके.

मनोवैज्ञानिक पैट्रिक मैक्नमारा भी मानते हैं कि सपनों के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी जमा करने से हमारी उनके बारे में समझ बढ़ेगी.

जितने ज़्यादा आंकड़े इकट्ठे होंगे, उतने ही पैटर्न हमें पता चलेंगे.

तब शायद हम आगे चलकर सपनों का कोई मतलब निकाल सकेंगे.

तब तक तो आप ख़्वाब देखते रहिए.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.com/future/story/20160727-what-we-learnt-from-reading-peoples-dreams" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी फ्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)

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