गैप ईयर अमीरों के लिए केवल फोटो-अप?

गैप ईयर
    • Author, विक्रम बारहाट
    • पदनाम, बीबीसी कैपिटल
  • प्रकाशित

अमरीका और ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देशों में छात्र हाई स्कूल और यूनिवर्सिटी की पढ़ाई के बीच कुछ सामाजिक काम करते हैं.

इसे गैप ईयर के नाम से जाना जाता है. इस दौरान छात्र, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका के ग़रीबों के बीच कुछ दिन बिताते हैं.

पश्चिमी देशों के छात्रों के बीच ये चलन साठ के दशक में शुरु हुआ था. लेकिन, आज की तारीफ़ में इस गैप ईयर के सामाजिक काम की कड़ी आलोचना हो रही है.

जानकार कह रहे हैं कि ये रईसों के शौक़ हैं. जो छात्र ग़रीब समुदायों के बीच काम करने जाते हैं, असल में वो लोगों की मदद करने या ज़िंदगी का नया तजुर्बा करने नहीं जाते.

वो ख़ाली फ़ोटो खिंचवाने और पिकनिक मनाने के लिए जाते हैं.

अभी हाल में कैलिफ़ोर्निया की लुईस लिंटन नाम की छात्रा का सोशल मीडिया पर जमकर मज़ाक़ बना.

लिंटन ने, अफ्रीकी देश ज़ाम्बिया में कुछ दिन ग़रीबों के बीच बिताए थे. अपने इस तजुर्बे को लिंटन ने टेलीग्राफ़ अख़बार में छपवाया.

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आरोप ये लगा कि लिंटन ने लोगों को ग़लत जानकारी दी. ग़रीबों के बारे में वही घिसी-पिटी बातें लिखकर उनका मज़ाक़ बनाया.

लिंटन के लेख के बाद से ही गैप ईयर के सामाजिक काम के मिशन को लेकर सवाल उठ रहे हैं.

इसकी सबसे बड़ी वजह है इन गैप ईयर कार्यक्रमों का बेहद ख़र्चीला होना.

आम छात्र तो गैप ईयर में किसी और देश में जाकर लोगों की मदद का काम कर ही नहीं सकते.

ये रईसों के शौक़ जैसा हो गया है. गैप ईयर में छात्रों को दूसरे देश भेजने वाली एजेंसियां, इस काम के लिए मोटी रकम ऐंठती हैं.

ऐसे में गैप ईयर कार्यक्रम में जाने वाले छात्र भी पिकनिक की तरह ही ग़रीबों के बीच वक़्त बिताते हैं.

ये तस्वीरें लेते हैं, फिर अपने देश लौटकर बड़बोले तरीक़े से अपने काम का बखान करते हैं.

इसी वजह से इसका मक़सद ख़त्म होने की बात कही जा रही है.

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इस बारे में काम करने वाली फिलाडेल्फिया यूनिवर्सिटी की सारा गोल्डरिक-रैब कहती हैं कि गैप ईयर अब तो 'पॉवर्टी टूरिज़्म' या ग़रीबी का पर्यटन बन गया है.

सारा कहती हैं कि अमीर देशों के बच्चे, अपने हाई स्कूल और यूनिवर्सिटी के बीच के वक़्त में ग़रीब मुल्क़ों में घूमने जाते हैं.

इसे ही वो गैप ईयर बताते हैं. इस दौरान चाहिए तो ये वो ग़रीब समुदायों के बीच काम करें, ज़िंदगी का नया तजुर्बा लें.

मगर वो तो सिर्फ़ तस्वीरें खिंचवाने के लिए जाते हैं. उन्हें अमीरी और ग़रीबी के बीच का फ़र्क़ तक समझ नहीं आता.

सारा का ऐतराज़ इस बात पर भी है कि गैप ईयर को तमाम एजेंसियां, मौज-मस्ती के दिनों के तौर पर पेश करती हैं.

वो छात्रों को बताती हैं कि यूनिवर्सिटी जाने से पहले वो ज़िंदगी में कुछ 'फन' कर लें.

सारा कहती हैं कि मध्यम वर्ग के बच्चे तो गैप ईयर के दौरान दूसरे देशों में सोशल वर्क के लिए जा भी नहीं पाते.

क्योंकि गैप ईयर का ये 'पॉवर्टी टूरिज़्म' काफ़ी महंगा सौदा है. इसमें हज़ारों डॉलर ख़र्च होते हैं.

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किसी अफ्रीकी देश में महीने डेढ़ महीने बिताने के लिए चार से छह हज़ार डॉलर तक ख़र्च करने पड़ते हैं.

ओरेगन में अमरीकन गैप एसोसिएशन के ईथन नाइट कहते हैं कि ऐसे कार्यक्रमों के महंगे होने की वजह है.

गैप ईयर टूरिज़्म कराने वाली कंपनियां, ग़रीब देशों में तमाम समुदायों के साथ समझौते करती हैं ताकि अमीर देशों के बच्चे वहां कुछ दिन बिता सकें.

जब बच्चे वहां नहीं भी होते, तब भी ये कंपनियां उन समुदायों को पैसे देती हैं. इससे उनका ख़र्च बढ़ जाता है.

फिर बीमा का, सेहत का और सलाहकारों का ख़र्च. छात्रों की निगरानी और उनकी सुरक्षा के लिए भी गैप ईयर के दौरान विशेषज्ञों को उनके साथ भेजा जाता है.

कुल मिलाकर गैप ईयर के कार्यक्रम आयोजित करने वाली एजेंसियों का अच्छा ख़ासा ख़र्च बैठता है. इसी वजह से ये कार्यक्रम महंगे होते जा रहे हैं.

फिर असली तजुर्बे के लिए छात्रों को ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त इन समुदायों के बीच बिताने की सलाह दी जाती है.

अगर वो कुछ ही दिन रहेंगे तो फोटो खिंचवाने से ज़्यादा कुछ नहीं कर पाएंगे. जब ज़्यादा वक़्त गुज़ारेंगे तभी कोई तजुर्बा उनके काम आएगा.

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कनाडा की एलान डिकीसन को ही लीजिए. जब वो यूनिवर्सिटी जाने की तैयारी कर ही थीं तो उन्होंने अफ्रीकी देश बोत्सवाना में आठ महीने बिताने का फ़ैसला किया.

उन्हें उम्मीद थी कि ये तजुर्बा उनका करियर आगे बढ़ाने में काम आएगा.

मगर उनके लिए असली चुनौती थी पैसे का इंतज़ाम. इस काम में उन्हें क़रीब तीन हज़ार डॉलर की ज़रूरत थी.

इसे एलान ने बमुश्किल जुटाया. डिकीसन मानती हैं कि गैप ईयर के कार्यक्रम काफ़ी महंगे हैं. सबके बस की बात नहीं.

ब्रिटेन में जानकार गैप ईयर के कारोबार बन जाने को लेकर काफ़ी फ़िक्रमंद हैं.

लीसेस्टर यूनिवर्सिटी के फैबियन फ्रेंजेल कहते हैं कि अगर सरकार, छात्रों के गैप ईयर का ख़र्च उठाए तो हालात बेहतर होंगे.

फिर कुछ लोग ये भी कहते हैं कि क्या ग़रीब लोग दूसरे देशों में ही होते हैं?

ये छात्र अपने ही देश के कमज़ोर लोगों की मदद के लिए क्यों नहीं काम करते?

फैबियन का कहना है कि लोग, अगर अच्छा काम करते भी हैं तो इसका इतने ज़ोर-शोर से प्रचार करते हैं कि, काम का मक़सद ही ख़त्म हो जाता है.

गैप ईयर टूरिज़्म के विरोधी ये भी कहते हैं कि छात्रों का कुछ वक़्त ग़रीबों के बीच बिताना, उन ग़रीबों के लिए ज़रा भी फ़ायदेमंद नहीं होता.

उनके हालात ज़रा भी नहीं बदलते. हालांकि सभी गैप ईयर कार्यक्रम बद इरादे से किए जाते हों ऐसा नहीं है.

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कुछ लोग बड़ी गंभीरता से लोगों की मदद के लिए काम करते हैं.

मगर, जब ये लोग अपने तजुर्बे, ब्लॉग या दूसरे माध्यमों से साझा करते हैं, तब विवाद खड़ा हो जाता है.

कुछ लोगों को लगता है कि वो ग़रीबी का महिमामंडन कर रहे हैं.

जैसे कि अमरीका की लिंटन का हाल हुआ. उनके ख़िलाफ़ तो बकायदा सोशल मीडिया पर ट्रेंड चल गया था.

कुछ जानकार सलाह देते हैं कि सामाजिक काम के लिए दूसरे देश जाने वाले छात्रों को ईमानदारी से अपना तजुर्बा बयां करना चाहिए.

छात्र कुछ वक़्त, दूसरे समुदायों के बीच बिताकर, उन्हें ठीक से समझ नहीं पाते.

इसलिए बेहतर होगा कि वो अपने काम को बढ़ा-चढ़ाकर न पेश करें. इससे ग़रीबी को ग्लैमर के तौर पर पेश करने का आरोप लग सकता है.

जानकार सलाह देते हैं कि गैप ईयर इतनी बुरी बात नहीं, अगर छात्र ख़ूब सोच-समझकर इस मिशन पर जाने का फ़ैसला करते हैं.

वो अच्छा और सस्ता कार्यक्रम चुनें. जिन देशों में जाएं, वहां के लोगों के रहन-सहन को समझें.

उनकी ज़िंदगी में बेहतर बदलाव लाने की कोशिश करें. फिर अपने तजुर्बे को ईमानदारी से बयां करें.

अगर छात्र ऐसा करेंगे तो आगे चलकर उन्हें भी इस गैप ईयर से काफ़ी फ़ायदा होगा.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.com/capital/story/20160714-is-gap-year-volunteering-a-luxury-for-the-rich" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कैपिटल</caption><url href="http://www.bbc.com/capital" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)

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