क़िस्से-कहानियों के वो समुद्री दैत्य

समुद्री दैत्य
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धरती के दो तिहाई हिस्से में समंदर फैला हुआ है. इनका हमारे क़िस्से-कहानियों में एक बड़ा हिस्सा है.

कमोबेश हर सभ्यता की पौराणिक कहानियों में समंदर में पाये जाने वाले किसी भयंकर जानवर का ज़िक्र है.

हिंदुस्तान की पौराणिक कहानियों में भी समुद्री दैत्य के तमाम ज़िक्र मिलते हैं.

बाइबिल के ओल्ड टेस्टामेंट वाले हिस्से में लिविअफ़ान नाम के एक भयंकर समुद्री जीव का ज़िक्र मिलता है.

इसी तरह योनाह नाम के पैग़म्बर के एक व्हेल जैसी बड़ी मछली के खा लिए जाने का ज़िक्र भी मिलता है.

पुराने क़िस्से ही क्यों, आज भी लॉक नेस मॉन्सटर के क़िस्से सुन-सुनकर लोग हैरान होते हैं.

समुद्री दैत्य

अब जब इतने क़िस्से-कहानियां हैं तो बहुत से कलाकारों ने भी अपनी-अपनी कल्पना से इन भयंकर जीवों को उकेरा है. ऐसा सदियों से होता आया है.

पुराने दौर में भूमध्य सागर के आस-पास के देशों में ज़िंदगी समंदर के आसरे चलती थी.

इसमें तमाम ख़तरे भी थे. इन्हीं ख़तरों को भयानक जानवरों के तौर पर क़िस्से-कहानियों में सुनाया जाता था.

मशहूर यूनानी लेखक होमर के ग्रंथ 'ओडिसी' में ऐसे ही दो भयानक समुद्री जीवों का ज़िक्र मिलता है. इनके नाम स्कायला और चैरिब्डीस थे.

रोम के बादशाह टाइबेरियस ने इटली के स्परलोंगा शहर के क़रीब एक आशियाना बनवाया था.

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यहां पर उन्होंने संगमरमर से ऐसे ही कुछ भयानक समुद्री जानवरों के बुत बनवाए थे. इनमें 'ओडिसी' का स्कायला भी था.

दूसरी यूनानी और लैटिन कहानियों में भी ऐसे तमाम समुद्री जीवों का ज़िक्र मिलता है, जो बेहद डरावने थे और इंसानों के दुश्मन माने जाते थे.

मध्य युग में यूरोप के सैलानी दुनिया की खोज के लिए निकले. वो समंदर का ख़ूब सफ़र करने लगे थे.

इस दौरान तमाम तरह के समुद्री दैत्यों के क़िस्से चलन में आ गए. ऐसे ही एक जीव का ख़ूब ज़िक्र मिलता है.

उसे लोग क्राकेन के नाम से पुकारते थे. मगर कई ऐसे भी थे, जिनकी ऊट-पटांग की तस्वीरें बनाई गई थीं.

जैसे कि एक व्हेल जैसा जीव जिसके बहुत बड़े-बड़े दांतों वाली तस्वीर बनाई गई थी.

सोलहवीं सदी के आते-आते इन क़िस्सों का सच पता लगाने की बातें भी होने लगीं.

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1520 में जर्मन कलाकार अल्ब्रेख़्त ड्यूरर ने हॉलेंड के एक सूबे, ज़ीलैंड का दौरा किया.

वो वहां एक बहुत बड़ी व्हेल को देखने गए थे. बाद में ड्यूरर ने लिखा कि लोगों ने इतनी लंबी व्हेल पहले नहीं देखी थी.

दिलचस्प बात ये कि लंबा सफ़र तय करके जब ड्यूरर वहां पहुंचे तो, समंदर की लहरें उस विशाल व्हेल को बहा ले जा चुकी थीं.

इस लंबे सफ़र की वजह से उन्हें मलेरिया हो गया और 1528 में उनकी मौत हो गई.

सोलहवीं और सत्रवहीं सदी में तटों पर आकर फंस जाने वाली ऐसी व्हेल्स को बड़ी दिलचस्पी से देखा जाता था.

कई बार इन्हें ऊपरवाले के आने वाले क़हर का संकेत भी कहा जाता था.

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1658 में एक व्हेल बहते-बहते इंग्लैंड की टेम्स नदी से अंदर आ गई थी.

बाद में लोगों ने इसे मार डाला था. इसे उस वक़्त के अंग्रेज़ तानाशाह ओलिवर क्रॉमवेल की मौत का संकेत माना गया था.

लेकिन, कुछ लोग इन व्हेलों को अच्छी क़िस्मत का नतीजा भी मानते थे.

आख़िर इनसे खाने का इंतज़ाम भी हो जाता था और कुछ लोग पैसे भी कमा लेते थे.

ब्रिटिश लेखक फिलिप होर कहते हैं कि सत्रहवीं सदी में हॉलैंड के तट पर कई बार व्हेलों के आकर फंसने की घटनाएं हुई थीं. इन पर कई पेंटिंग्स भी बनीं.

फिलिप होर बताते हैं कि उन्नीसवीं सदी तक आते आते यूरोप की फैक्ट्रियों में व्हेल से निकलने वाले तेल की भारी मांग होने लगी थी.

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इसके लिए बड़ी तादाद में व्हेलों का शिकार किया जाने लगा.

वो बताते हैं कि उन्नीसवीं सदी में न्यूयॉर्क, बर्लिन, पेरिस और लंदन की सड़कों को व्हेल के तेल से रौशन किया जाता था.

उस दौर में अमरीका, लकड़ी के बाद सबसे ज़्यादा निर्यात व्हेल के तेल का ही करता था.

खुले समंदर में व्हेलों का शिकार बेहद ख़तरनाक था. नर व्हेलें क़रीब साठ हज़ार किलो वज़न की होती थीं.

मगर व्हेलों का शिकार बदस्तूर जारी रहा. व्हेलों के शिकार पर ब्रिटिश कलाकार जेएमडब्ल्यू टर्नर ने 1840 में कई पेंटिंग्स बनाई थीं.

इस बारे में ज़िक्र अमरीकी लेखक हरमन मेलविल के उपन्यास मोबी-डिक में भी मिलता है.

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हरमन ने अपनी क़िताब में लिखा था, "समंदर की सतह के अंदर जो है, उसे हम नहीं जानते. उसे हम जीत नहीं सकते."

शायद उनका मतलब ऐसे ही भयानक समुद्री दैत्यों से था.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.com/culture/story/20160620-the-monsters-hidden-beneath-the-sea" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कल्चर</caption><url href="http://www.bbc.com/culture" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)

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