सौर मंडल के ज्वालामुखी: 15 अद्भुत तस्वीरें

प्रकाशित

आज पृथ्वी को हम जिस रूप में देख रहे हैं वह ज्वालामुखियों के कारण है. ज्वालामुखी ने हमारे वायुमंडल को भी प्रभावित किया है.

गर्म लावा धरती की सतह पर गिरा जिससे नई मज़बूत ज़मीन बनी. जमी हुई पृथ्वी पर जब ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हुआ तो ज्वालामुखी के कारण ही यह संभव हो पाया कि पृथ्वी आगे जमी न रहे.

हवाई द्वीप को ही देखिए. ज्वालामुखी से निकले लावे की वजह से हवाई द्वीप समुद्र तल के बाहर निकल आया और दुनिया उसे द्वीप के तौर पर देख पाई.

लेकिन ज्वालामुखी केवल पृथ्वी पर ही नहीं पाए जाते. सोलर सिस्टम की पड़ताल बताती है कि ज्वालामुखी दूसरे ग्रहों-उपग्रहों पर भी मौजूद हैं, पृथ्वी के ज्वालामुखियों से कहीं विशाल हैं.

कुछ निष्क्रिय हैं और लाखों सालों से इनमें विस्फोट नहीं हुआ है और शायद आगे भी न हो. लेकिन कई पृथ्वी पर मौजूद ज्वालामुखी की तरह सक्रिय हैं.

बुध

पहली नज़र में बुध देखने पर चंद्रमा जैसा नज़र आता है. सूर्य के सबसे नज़दीक स्थित इस ग्रह पर ढेरों चट्टानें और गड्ढे दिखते हैं.

माना जाता है कि अतीत में यहां काफी ज्वालामुखी मौजूद थे. ज्वालामुखी से निकले लावा की बदौलत ही यहां मैदान बना.

सतह में दरारों की मौजूदगी बताती है कि सतह टूट कर फिर दोबारा इस शक्ल में आई है. जब ग्रह का आंतरिक हिस्सा ठंडा पड़ा तो ये ज्वालामुखी मृत समान हो गए और फिर सक्रिय नहीं हुए.

शुक्र

अंतरिक्ष में शुक्र सबसे रहस्यमयी ग्रह माना जाता है. यह घने बादलों में घिरा है, जो कभी नहीं टूटते. इसलिए इसकी सतह को सीधे देख पाने का कोई तरीका नहीं है.

ऐसे में रडार की सूचनाओं पर ही भरोसा करना होगा. वैसे शुक्र काफी गर्म ग्रह है. यहां वातावरण का दबाव भी बहुत ज़्यादा है.

इसके अलावा इसके ज्वालामुखियों के सक्रिय होने के सबूत मिले हैं. ग्रह पर कई ऐसी आकृतियां नज़र आती हैं जो ज्वालामुखी की तरह लगती हैं.

सबसे लंबी आकृति माट मॉन्स ज्वालामुखी है जो सतह से करीब 8 किलोमीटर ऊपर नज़र आती है. यानी इसकी उंचाई माउंट एवरेस्ट जितनी है. ये स्पष्ट नहीं है कि ये सक्रिय है या नहीं.

इडुनन मॉन्स अपने आसपास के इलाके से ज़्यादा गर्माहट लिए हुए है. ऐसा मालूम होता है कि इसमें पिघला हुआ मैग्मा मौजूद होगा.

शुक्र के ऑरबिट की जांच कर रही वीनस एक्सप्रेस के मुताबिक ग्रह के चारों ओर ऐसे कई स्पॉट हैं जहां तापमान तेज़ी से बढ़ता और गिरता है. ये ज्वालामुखी के लावा के प्रवाह से संभव है.

चंद्रमा

बुध की तरह ही हमारा चंद्रमा भी एक समय ज्वालामुखीय तौर पर सक्रिय था, लेकिन अब नहीं है.

इसका सबसे पुख्ता संकेत है विशाल मैदानी भाग मारिया, जिसे लैटिन में सीज़ या समुद्र कहते हैं. यह चंद्रमा की सतह पर लावा के फैलने के बाद बचे अवशेष हैं, जो जम गए हैं और ठोस रूप ले चुके हैं.

इसके अलावा चंद्रमा पर चंद्र गुंबद भी नज़र आते हैं जो कई किलोमीटर के दायरे में फैले हैं. वे अक्सर क्लस्टर्स या झुंड में नज़र आते हैं. ऊपर की तस्वीर में हर्टेनसियस गड्ढा नज़र आ रहा है.

चंद्र गुंबदों के बारे में माना जाता है कि वे पिघले लावा से बने हैं और समय के साथ ठंडे हुए हैं.

मंगल

मंगल ग्रह पर एक समय में जल मौजूद था और किसी तरह का जीवन भी. लेकिन आज यहां पानी जम चुका है और किसी जीवन का पता नहीं चल पाया है.

वैसे मंगल ग्रह पर भी कभी ज्वालामुखी सक्रिय थे, काफी बड़े और काफी सक्रिय.

ओलंपस मोन्स सोलर सिस्टम का सबसे बड़ा ज्ञात ज्वालामुखी है. इसके सामने पृथ्वी के ज्वालामुखी ही नहीं, बाक़ी सभी चीज़ें बौनी हो जाती हैं.

यह 25 किलोमीटर ऊंचा है. यानी माउंट एवरेस्ट से तीन गुना ऊंचा ! इसका व्यास 674 किलोमीटर का है, अमरीका के एरिजोना प्रांत के आकार जितना ही.

लेकिन यह लाखों सालों से सक्रिय नहीं है और शायद कभी होगा भी नहीं.

बृहस्पति

लो सबसे बड़े ग्रह बृहस्पति के चार बड़े चंद्रमाओं में एक है. यह ज्वालामुखी की सक्रियता के लिहाज़ से सोलर सिस्टम का सबसे सक्रिय पिंड है.

लो एक तरह से सक्रिय ज्वालामुखी से ही भरा हुआ है. इसके लावा में फैले गंधकयुक्त रसायन अंतरिक्ष में दूर तक फैल जाते हैं.

यह उपग्रह बृहस्पति के बेहद नज़दीक है लिहाज़ा इस उपग्रह पर बृहस्पति के खिंचाव का काफ़ी प्रभाव है और इस बल के चलते लो का आंतरिक हिस्सा काफी गर्म रहता है.

यही उष्मा ज्वालामुखी के रास्ते बाहर निकलती है.

शनि

टाइटन शनि का सबसे बड़ा चंद्रमा है. यह ऐसा उपग्रह है जिसके वायुमंडल का घनत्व काफी ज़्यादा है, जिसमें हम सांस नहीं ले सकते.

पृथ्वी को छोड़कर सोलर सिस्टम में टाइटन इकलौता ऐसा उपग्रह है जिसमें झीलें मौजूद हैं. लेकिन इन झीलों में पानी नहीं होता बल्कि तरल हाइड्रोकार्बन मौजूद होता है.

टाइटन में मौजूद ज्वालामुखी से निकलने वाले लावा में जल और अमोनिया तरल पदार्थ के रूप में निकलता है.

उपर की तस्वीरों में नज़र आ रहा पर्वत ज्वालामुखी डूम मोन्स कहलाता है. इसके बाईं तरफ मौजूद गड्ढा सोट्रा पटेरा कहलाता है जो एक तरह का सक्रिय क्रायोवॉलकेनो हो सकता है.

हालांकि ये स्पष्ट नहीं है कि टाइटन में सक्रिय क्रायोवॉलकेनो हैं या नहीं, लेकिन शनि के दूसरे उपग्रह एनक्लेडस पर ऐसी स्थिति को लेकर कोई संदेह नहीं है.

एनक्लेडस की सतह पर 100 गीज़र पानी और दूसरे रसायन फ़वारों की तरह छोड़ते रहते हैं. इसका 2005 में कैसिनी परियोजना के तहत पहली बार पता चला था.

इसकी बर्फीले सतह के नीचे संभवत: मौजूद समुद्र से यहाँ पानी आता है.

नैप्चून

इसके अलावा ज्वालामुखी वाला पिंड नैप्चून के सबसे बड़े उपग्रह ट्राइटन पर मौजूद है. नैप्चून सूर्य से पृथ्वी के मुकाबले 30 गुना दूरी पर स्थित है.

इसके बारे में वोयेजर 2 स्पेस मिशन ने 1989 में पता लगाया था. वोयेजर की भेजी तस्वीरों से पता चला कि इसकी सतह भी चंद्रमा जैसी ही है.

वोयेजर 2 ने ही ये पता लगाया कि ट्राइटन की सतह से निकलने वाला लावा या कोई और पदार्थ अंतरिक्ष में आठ किलोमीटर ऊपर उठ रहा है.

हालांकि बहुत संभव है कि ट्राइटन से निकलने वाला पदार्थ लावा नहीं होकर बर्फ भी हो सकता है. नासा के वैज्ञानिकों के मुताबिक पूरी सतह वाटर आइस से भरी हुई है.

<italic><bold>अंग्रेज़ी में <link type="page"><caption> मूल लेख</caption><url href="http://www.bbc.com/earth/story/20150708-the-volcanoes-found-in-space" platform="highweb"/></link> यहां पढ़ें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी अर्थ</caption><url href="http://www.bbc.com/earth" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.</bold></italic>

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>