हिटलर से जुड़े चर्च पर बंटा जर्मनी

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जर्मनी में इन दिनों पूर्व नाज़ी तानाशाह हिटलर से जुड़े एक चर्च के पुनर्निर्माण को लेकर बहस हो रही है.

बहस का मूल केंद्र ये है कि जर्मनी अपने अतीत से किस तरह निपटे.

हिटलर के शासन में 60 लाख यहूदियों के नरसंहार के कारण वो ऐसी शख़्सियत हैं जिन्हें लेकर जर्मनी के ज़्यादातर लोग सहज नहीं होते.

बर्लिन से बीबीसी संवाददाता स्टीफ़न इवांस की रिपोर्ट

ये चर्च जर्मन शहर पोट्सडैम में है और इसे फिर से बनाने के आलोचक और समर्थक आमने सामने हैं.

ये वही चर्च है जिसमें जर्मनी के कुलीन वर्ग ने हिलटर को पहली बार एक तरह से मान्यता दी थी और उन्हें बतौर चांसलर व्यापक अधिकार दिए गए.

इससे पहले जर्मनी का उच्च वर्ग उन्हें छोटा मोटा व्यक्ति मानता था लेकिन 23 मार्च 1933 से नाज़ियों ने उन्हें एक सम्मानित व्यक्ति के तौर पर पेश करने की मुहिम शुरू की.

जर्मनी के इतिहास में इसे एक कुख्यात दिन माना जाता है. इसीलिए कई लोग इस चर्च को बुराई के प्रतीक के तौर पर भी देखते हैं.

'उम्मीद की इमारतें'

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 1945 में रॉयल एयर फोर्स की बमबारी में इस चर्च को आंशिक रूप से नुक़सान हुआ. इसके बाद 1968 में पूर्वी जर्मनी में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ने इसे ध्वस्त ही कर दिया गया.

अब इसके पुनर्निर्माण के लिए धन जुटाया जा रहा है.

जिस समिति को ये चर्च फिर से बनाने का काम सौंपा गया है, उसके अध्यक्ष प्रोफेसर वोल्फगांग हुबर हैं. वो बर्लिन ब्रांडेबुर्ग के बिशप भी रह चुके हैं.

वो कहते हैं, "बेशक ये एक विवादित चर्च है लेकिन यह एक प्राचीन इमारत है. ये वो जगह है जहां जर्मन इतिहास की अस्पष्टताओं को हम सबसे ज़्यादा महसूस करते हैं."

वो दिखाना चाहते हैं कि किस तरह धूल से उम्मीद जगाने वाली इमारतें खड़ी की जा सकती हैं.

अतीत की परछाइंयां

दूसरी तरफ़ इसके आलोचक कहते हैं कि जहां इतिहास को अंधकार में ले जाने वाली घटना हुई, क्या उसे फिर से बनाए जाने की वाकई ज़रूरत है.

पोट्सडैम में रहने वाले मैक्सीमिलियन डैलिखोव कहते हैं कि विवाद इसे लेकर है कि जर्मनी अपने अतीत को किस तरह देखता है.

वो महसूस करते हैं कि कोशिश नाज़ियों से पहले वाले जर्मनी को बनाने की हो रही है, इसे सैलानियों और पैसे वालों के लिए तैयार किया जा रहा है.

वो कहते हैं, "यहां रहने वाले लोग ये समझते हैं कि इस प्रोजेक्ट को वो लोग आगे बढ़ा रहे हैं जो इसे ऐसी जगह के तौर पर देखना चाहते हैं जहां कुछ बर्बाद नहीं किया गया था. बुनियादी तौर पर तो ये पेश करने की कोशिश हो रही है कि जैसे दूसरा विश्व युद्ध हुआ ही नहीं था. और मुझे ये बात पसंद नहीं."

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