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आर्थिक मंदी क्या आकर ही दम लेगी, क्या कहते हैं अर्थशास्त्री?
ऐसे अर्थशास्त्रियों की लिस्ट लंबी होती जा रही है जो उस 'भूत' को आते हुए देख रहे हैं, जिसे दुनिया मंदी कहती है.
अर्थव्यवस्थाओं में तेज़ी लाने के मक़सद से दिए गए आर्थिक पैकेज के नाम पर बेतहाशा खर्च, दुनिया को चीन की ओर से भेजे जाने वाली चीज़ों की सप्लाई चेन में रुकावट, यूक्रेन पर रूस का हमला और दूसरी तमाम वजहों ने मुद्रास्फीति को उस मुकाम पर पहुंचा दिया है जो बीते कई दशकों में नहीं देखी गई थी.
इसे रोकने के लिए केंद्रीय बैंक को ब्याज दरों में वृद्धि जैसे कदम मजबूरी में उठाने पड़े. दूसरी तरफ़ दुनिया भर के शेयर बाज़ारों में गिरावट का रुख जारी है.
उदाहरण के लिए अमेरिकी सूचकांक देखे जा सकते हैं, जहां लंबे समय से गिरावट का सिलसिला जारी है, ऐसा लगता है कि मानो निवेशकों का भरोसा ही उठ गया है.
ऐसे में जो चीज़ हमारा इंतज़ार करती हुई लगती है, वो है मंदी. मंदी यानी आर्थिक गतिविधियों में कमी आ जाना और जिसका नतीजा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में निगेटिव ग्रोथ रेट के रूप में देखने को मिलता है.
सामान्य रूप से अगर किसी देश की अर्थव्यवस्था की जीडीपी पर लगातार दो तिमाही तक दबाव में रहती है तो उसे 'टेक्निकल रिसेशन' कहा जाता है.
फिनांशियल टाइम्स और यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो बूथ के एक ज्वॉयंट सर्वे में अमेरिका के दस अर्थशास्त्रियों में से सात ने ये बात कही है कि मंदी इस बरस नहीं तो अगले साल आने ही वाली है.
ये सर्वे जून के शुरुआत में हुआ था, शेयर बाज़ारों में 'ब्लैक वीक' और ब्याज दरों में इजाफे के फ़ैसले से पहले. इसलिए मंदी को नज़दीक महसूस करने वाले अर्थशास्त्रियों का ये अनुपात अब बढ़ भी गया होगा.
मंदी की चपेट में आने के कई ख़तरनाक नतीज़े हो सकते हैं. निवेश का माहौल गड़बड़ा सकता है. उपभोग और लेन-देन में कमी से कई कंपनियां बंद होने की कगार पर पहुंच सकती हैं. नौकरियां कम हो जाएंगी, लोग और कारोबारी प्रतिष्ठान कर्ज चुकाने में डिफॉल्ट होने लगेंगे और बहुत से लोग दिवालिया भी हो सकते हैं.
बीबीसी मुंडो ने इस बारे में 4 जाने-माने अर्थशास्त्रियों से बात की. उनसे पूछा कि क्या वे अमेरिका और दुनिया की दूसरी अर्थव्यवस्थाओं में नज़दीकी भविष्य में मंदी का वाकई कोई ख़तरा देख रहे हैं.
'2023 में मंदी की65 फ़ीसदी आशंका'
डेविड वेसल वॉशिंगटन डीसी स्थित ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के हचिंस सेंटर फ़ॉर फिस्कल एंड मॉनेटरी पॉलिसी के डायरेक्टर हैं.
वे कहते हैं, "मंदी की भविष्यवाणी करना एक मुश्किल काम है. मंदी आम तौर पर ऐसे हालात में आती है जिसके बारे में आपको पहले से अंदाज़ा नहीं होता. कई बार आर्थिक विशेषज्ञ जब ये बात पूरे भरोसे के साथ कह रहे होते हैं कि मंदी आने वाली है, लेकिन बाद में पता चलता है कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं."
वेसल कहते हैं, "हालांकि मैं 2023 में अमेरिका में मंदी की ठोस संभावना देखता हूं. ये संभावना 65 फ़ीसदी तक है. इसकी वजह भी है. फेडरल रिज़र्व के चेयरमैन जे पॉवेल के पूर्ववर्ती महंगाई दर को कम करने और उसे संभालने में कामयाब रहे थे. पॉवेल नहीं चाहेंगे कि उन्हें इसलिए याद रखा जाए कि उन्होंने अपने पूर्ववर्तियों के किए कराए पर पानी फेर दिया."
उनके अनुसार, "फ़िलहाल फेडरल रिज़र्व को मांग को धीमा रखने, क़ीमतों पर ऊपरी दबाव दूर करने और महंगाई के मनोविज्ञान को पकड़ बनाने से रोकने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने की ज़रूरत है. हालांकि, ब्याज दरें बढ़ाने या उन्हें थामने जैसे मामलों पर फेडरल रिज़र्व को और अधिक कठिन फ़ैसले लेने पड़ेंगे, ताकि अर्थव्यवस्था को मंद करके महंगाई दर को 2 फ़ीसदी के लक्ष्य से कम किया जाए."
वेसल बताते हैं, "हर विकल्प के पक्ष में अच्छे तर्क हो सकते हैं. मुझे उम्मीद है कि पॉवेल दरों को सहज बनाने के बजाय उसे कसने की ग़लती करेंगे, जिससे कि मंदी आने की आशंका है. हालांकि यह मध्यम मंदी होगी. मैं चाहता हूं कि मैं ग़लत रहूं. दुनिया की आपूर्ति शृंखलाओं में आई सभी समस्याएं हल हा जाएं, कोरोना के चलते पड़े बुरे असर दूर हो जाएं और यह भी कि हमें और फेड दोनों को थोड़ा भाग्य का भी साथ मिले."
हालांकि वे कहते हैं, "लेकिन मुझे नहीं लगता कि ऐसा सौभाग्य रहने की गुंजाइश है."
'अगले साल के शुरू में आ सकती है मंदी'
गेब्रियल गैसवे, 'इंडिपेंडेंट इंस्टीट्यूट के सेंटर फॉर ग्लोबल प्रॉस्पेरिटी' में रिसर्च एसोसिएट और Elindependent.org (ओकलैंड, कैलिफ़ॉर्निया) के डायरेक्टर हैं.
गैसवे कहते हैं, "मुझमें यह कहने की हिम्मत है कि शायद 2023 के शुरू में हम कभी भी यूरोप और अमेरिका दोनों ही जगह एक अहम मंदी का सामना करेंगे. यह कोरोना महामारी, आपूर्ति शृंखलाओं में आई रुकावट, यूक्रेन पर रूस के हमले, भोजन की कमी या ऊर्जा की बढ़ती क़ीमतों के चलते नहीं आएगी, बल्कि इसकी मूल वजह कुछ और होगी.''
उनके अनुसार, ऑस्ट्रियन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की शर्तों को लागू करें तो, सरकारों द्वारा तरलता में की गई ज़बरदस्त वृद्धि से पैदा हुई बनावटी उछाल पर लगाम लग जाएगी और डिप्रेशन शुरू हो जाएगा.
गैसवे बताते हैं, "फ़िलहाल उत्तरी गोलार्द्ध में गर्मी रहने और साल के अंत के त्योहारों के चलते मेरा आकलन है कि मंदी मध्यम स्वरूप की होगी. इस दौरान लोग घूमेंगे, ख़र्च करेंगे और महामारी के दौरान सरकारों द्वारा दी गई वित्तीय सहायता सुविधाओं का लाभ लेंगे. लेकिन मौजमस्ती का दौर हमेशा नहीं चलता.''
वो कहते हैं, "कभी न कभी चीज़ें पहले की तरह हो जाएंगी, चीज़ें पहले जैसी सामान्य हो जाएंगी और उस सामान्य दशा को कई अर्थशास्त्री मंदी का नाम देते हैं. ये भी सच है कि अब अमेरिका के कर्ज़ बॉन्डों का रिटर्न बढ़ रहा है, जिससे कि अंतरराष्ट्रीय पूंजी के अमेरिका की ओर लौटने का आकर्षण बढ़ेगा.''
गैसवे के अनुसार, "इसलिए ये देखना ज़रूरी होगा कि दुनिया से कितनी पूंजी अमेरिका लौटती है. साथ ही डॉलर कितनी मजबूत होता है और बाक़ी देशों की मुद्राएं कितनी गिरती हैं, उस पर भी नज़र रहेगी. इन सबका अर्थव्यवस्था पर असर होता है.''
'इस साल के अंत तक आ सकती है मंदी'
लिंडसे पिएग्ज़ा शिकागो के स्टिफ़ेल फाइनेंशियल की सीईओ और प्रिंसिपल इकोनॉमिस्ट हैं.
पिएग्ज़ा बताती हैं, "फेडरल रिज़र्व ने महंगाई दर पर क़ाबू करने के लिए अपने संकल्प को नया और मजबूत बनाया है. जून में ब्याज दरों में 0.75 फ़ीसदी की वृद्धि की और जुलाई में इसमें फिर से 0.75 फ़ीसदी की वृद्धि करने की संभावना जताई है. हालांकि राष्ट्रपति जो बाइडन ने पिछले हफ़्ते कहा था कि फेडरल रिज़र्व मंदी लाने की कोशिश नहीं कर रहा है. लेकिन अभी जो हो रहा है उससे शायद इस साल के अंत तक नकारात्मक विकास दर या स्टैगफ्लेशन (एक ही साथ मंदी और महंगाई का होना) आ जाए.''
वो कहती हैं, "सप्लाई चेन में बाधा पड़ने और युद्ध के जारी रहने के चलते लोग अभी भी महंगाई से परेशान हैं. और अब जब फेडरल रिज़र्व क़रीब 4 फ़ीसदी की प्रस्तावित या उससे भी ज़्यादा गति से दरें बढ़ा रहा है, तो इससे अर्थव्यवस्था के कमज़ोर होने का ख़तरा है.''
उनके अनुसार, "ब्याज दर बढ़ाने की रणनीति का एक आम इंसान और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर कहीं ज़्यादा बड़ा असर पड़ेगा. पूंजी के महंगा हो जाने से खपत और निवेश दोनों घट जाते हैं, जिससे मांग भी घटती है. यह पहले ही हो चुका है और सामानों की बिक्री घटती हुई दिख रही है. लेकिन कोरोना या यूक्रेन युद्ध के चलते सप्लाई पक्ष में आया ठहराव शायद ही दूर हो पा रहा है.''
'नहीं आएगी मंदी'
एंड्रेस मोरेनो जारामिलो अर्थशास्त्री होने के साथ स्वतंत्र वित्तीय सलाहकार और शेयर बाज़ार के विश्लेषक (बोगोटा) भी हैं.
जारामिलो का कहना है, "कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि तेज़ी से गिरी हुई विकास दर के दौर से गुज़रते हुए हम मंदी के दौर का सामना कर रहे हैं. लेकिन ब्याज दर बढ़ने के चलते ऐसे लोग मानते हैं कि अब यह चक्र उल्टा घूमने वाला है. बेशक़ ऐसा हो सकता है, लेकिन तमाम समस्याओं के बाद भी दुनिया की जियोपोलिटिक्स अभी इस हद तक ख़राब नहीं हुई है कि मंदी आ जाए.''
वो कहते हैं, "अभी तक इसका पता नहीं है. अमेरिका ने अपनी ब्याज दरें बढ़ाने में काफ़ी वक़्त लगाया, ताकि मंदी न आ पाए. ऐसे वक़्त जब महंगाई बहुत ज़्यादा हो, तब उच्च ब्याज दरों के चलते छोटी सी मंदी पैदा हो सकती है.
उनके अनुसार, "यदि ऐसा होना है, तो यह बहुत कम असर की होगी. मुझे लगता है कि सरकार पूरी कोशिश करेगी कि मंदी को आने से रोका जाए. बहुत सी ऐसी घटनाएं या जियोपोलिटिक्स हैं, जिससे अर्थव्यवस्था का पूरा अनुमान ही बदल जाए. इसलिए हमें बहुत सतर्क रहने की ज़रूरत है. दुनिया की अर्थव्यवस्था एक चक्र में चलती है. ब्याज दरें और आर्थिक मंदी दोनों उस चक्र का एक हिस्सा हैं, जो उथल पुथल रहने तक गंभीर होती हैं. हालांकि अभी किसी उथल पुथल दिखाई नहीं देती.''
जारामिलो कहते हैं, "इन्हीं बातों को तय करने के लिए केंद्रीय बैंक और आर्थिक नीति होती है, ताकि उन चक्रों को पूरा किया जा सके. और अर्थव्यवस्था इतनी तेज़ी से न बढ़े कि उससे महंगाई बहुत बढ़ जाए. और न ही अर्थव्यवस्था में इतनी तेज़ गिरावट आ जाए कि इससे बेरोज़गारी, डिप्रेशन और दूसरी चीज़ें पैदा हो जाएं.''
उनके अनुसार, "हमने अभी-अभी जो कोरोना का बुरा असर देखा, वो दुनिया के लिए बिल्कुल नया था. इससे लगभग पूरी दुनिया में नकारात्मक वृद्धि दर रही और उसके बाद जो सुधार हो रहा है, उससे थोड़ी उथल पुथल है. लेकिन यह बहुत ज़्यादा भी नहीं है.''
जारामिलो का मानना है, "मुझे लगता है कि सबसे बुरा दौर अब ख़त्म हो गया है. दूसरे देशों की तरह, अब अमेरिका भी महंगाई का सामना कर रहा है. और महंगाई पर क़ाबू पाने के चलते अर्थव्यस्था थोड़ी सुस्त हो सकती है, हो सकता है यह नकारात्मक भी हो जाए. लेकिन यह इतनी बुरी बात भी नहीं है."
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