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यूक्रेन के ख़िलाफ़ रूस कैसे प्रोपेगैंडा की लड़ाई में बढ़त बना रहा है
मार्च के शुरुआती दिनों में उस दिन सेरही स्तारुश्को और उनके पत्रकार साथियों ने अपनी सुबह की संपादकीय बैठक खत्म ही की थी कि रूसी सेना के वाहन उनके दफ्तर के बाहर आ खड़े हुए.
कुछ मिनट के भीतर ही रूसी सैनिक सामने के दरवाजे से इस तीन मंजिला इमारत में धड़धड़ाते हुए घुसे. यहां एक स्थानीय टीवी स्टेशन का दफ्तर था.
यह रूस के नियंत्रण वाले यूक्रेन के तटीय शहर बर्दयांस्क की घटना है. करीब 50 कर्मचारियों को 5 घंटे तक बंधक बनाकर रखा गया.
वह सूचनाओं के प्रवाह पर नियंत्रण की लड़ाई का शिकार बन गए थे.
रूस की सेनाएं यूक्रेन के शहरों पर नियंत्रण कर रही हैं और यहां काम कर रहे पत्रकारों पर रूस समर्थक विचारों के प्रसार का दबाव बना रही हैं. जो सेना के दबाव के आगे नहीं झुकते उनका काम बंद करवा दिया जाता है.
रूस अपने नियंत्रण वाले इलाकों में यूक्रेन के सरकारी समाचारों के प्रसारण को रोक रहा है, इसके अलावा यहां ट्रांसमीटर और प्रसारण टावरों को भी बंद किया जा रहा है.
यूक्रेन के मीडिया के कार्यक्रमों की जगह रूस समर्थित चैनलों के कार्यक्रमों को दिखाने की इस रणनीति के तहत यूक्रेन के सिग्नल बंद करके रूस के सिग्नल चालू कर दिए जाते हैं.
यूक्रेन की विशेष संचार सेवा ने बीबीसी को बताया है कि दक्षिणी यूक्रेन में 8 स्टेशनों का इस्तेमाल रूस समर्थित प्रोपेगैंडा दिखाने के लिए किया जा रहा है.
'झूठ बोलने के लिए मजबूर किया गया'
बर्दयांस्क में पत्रकार सेरही को कैमरे पर बयान देने के लिए मजबूर किया गया.
उन्हें कैमरे के सामने झूठ बोलने के लिए मजबूर किया गया कि वह यूक्रेन के राष्ट्रवादियों के खिलाफ युद्ध शुरू कर रहे हैं.
रूस के सैनिकों ने उनसे कहा कि अगर वह सहयोग नहीं करेंगे तो उनका यह वीडियो ऑनलाइन पोस्ट कर दिया जाएगा.
सेरही इस इलाके से बाहर हैं और सुरक्षित हैं. वो बताते हैं, "हर तरफ हथियारबंद लोग के मौजूद थे. वो एक दर्जन से अधिक होंगे, मुझे लगता है कि उनमें से 5-6 रूस की खुफिया सेवा एफएसबी से जुड़े थे. उन्होंने कहा कि अब यह देश रूस है और अगर आप यहां रहना चाहते हैं तो सहयोग करना होगा."
उन्हें और उनके साथियों को सहयोग करने के लिए कहा गया. इसका मतलब यह था कि उन्हें स्थानीय यूक्रेन समर्थक कार्यकर्ताओं और सैनिकों के बारे में जानकारियां देनी होंगी.
इसके अलावा उनसे रूस समर्थक प्रोपेगैंडा चलाने के लिए कहा गया. सिर्फ खोखली धमकियां नहीं दी गई थीं.
'बर्दयांस्क में अंतिम स्वतंत्र मीडिया कंपनी'
उस दिन की घटना को याद करते हुए सेरही कहते हैं, "वह मुझे एक अलग कमरे में ले गए और वहां मुझे पीटना शुरू कर दिया. वह मेरे सिर पर छाती पर, टांगों, अपने घुटनों और हथेलियों से वार कर रहे थे इसलिए मेरे चेहरे पर कोई खरोच नहीं थी."
"फिर उनमें से एक ने मुझे बंदूक की नोक पर धमकाया. उसने मेरी कनपटी से बंदूक सटाई और मुझसे कहा कि मैं अपनी पत्नी को फोन करूं और अलविदा कह दूं."
अगले दिन रूसी टीवी चैनलों पर प्रसारित समाचार में इस स्टेशन पर कब्ज़े को दिखाया गया. जब वह कैमरा लेकर यहां पहुंचे तो इमारत खाली हो चुकी थी.
रूस के रिपोर्टर ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि सेना को इस स्टेशन को इसलिए नियंत्रण में लेना पड़ा क्योंकि ये शहर के हालात के बारे में गलत जानकारियां फैला रहा था.
यह यूक्रेन के बर्दयांस्क में काम करने वाली अंतिम स्वतंत्र मीडिया कंपनी थी.
एक अन्य स्वतंत्र मीडिया कंपनी को यहां पहले ही बंद कर दिया गया था. यूक्रेन के राष्ट्रीय मीडिया का प्रसारण भी यहां रोक दिया गया है.
'लोगों का ब्रेनवॉश किया जा रहा है'
यूक्रेन पर रूस के हमले से पहले यहां के लोग दर्जनों राष्ट्रीय यूक्रेनी चैनल और कुछ स्थानीय चैनल देख सकते थे लेकिन अब सभी का प्रसारण यहां बंद हो चुका है.
जिन लोगों के पास निजी सैटेलाइट डिश नहीं है वह अब सिर्फ रूस से चलने वाले 24 टीवी चैनल ही देख सकते हैं और इन सब पर पूर्वी यूक्रेन के रूस समर्थित स्वघोषित गणतंत्रों से प्रसारित होने वाले कार्यक्रम ही चलते हैं.
बर्दयांस्क में रहने वाली 28 साल की आना (बदला हुआ नाम) कहती है कि, "यह सब फेक न्यूज़ है और मैं इसे बिल्कुल भी नहीं देखती हूं. इसके जरिए लोगों का ब्रेनवॉश किया जा रहा है."
वो टीवी पर म्यूजिक चैनल ही देखती है और खबरों के लिए इंटरनेट मीडिया पर निर्भर हैं.
अब रूस के नियंत्रण वाले क्राइमिया से भी प्रसारित होने वाले एक चैनल ने दक्षिणी यूक्रेन के इन इलाकों के लिए नए बुलेटिन शुरू कर दिए हैं. रूस इन इलाकों को मुक्त इलाका कह रहा है.
रूस की रणनीति का अहम हिस्सा
युद्ध का कहीं कोई जिक्र नहीं है. पत्रकार ये दावा करते हैं कि रूस की सेनाओं के आगमन के बाद से यहां लोगों का जीवन स्तर बेहतर हुआ है.
रिपोर्टों में यह कहा जाता है कि यूक्रेन की सरकार ने जो संकट यहां पैदा किया था अब इन इलाकों के उससे उबरने की वास्तविक संभावना है.
यूक्रेनियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास मीडिया से जुड़ी नतालिया वाइहोव्स्का इसे समझाते हुए कहती हैं, "यह रूस की रणनीति का अहम हिस्सा है. क्योंकि सूचनाओं का युद्ध भी वास्तविक युद्ध का हिस्सा है."
"वह रूसी टीवी चैनलों का प्रसारण करते हैं. स्वतंत्र पत्रकारों को धमकियां देते हैं. वह हथियार लेकर उनके न्यूज़ रूम में पहुंचते हैं उनके घरों और परिजनों के घर पर धमकियां देते हैं."
पत्रकारों की स्वतंत्रता के लिए काम करने वाले संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के मुताबिक रूस ने जब साल 2014 में क्राइमिया पर नियंत्रण किया था तब भी इसी तरह की रणनीति का इस्तेमाल किया गया था.
रूसी सैनिकों का एतराज़
दक्षिणी यूक्रेन के शहर मेलितोपोल में मीडिया कंपनी चलाने वाले मिख़ाइलो कुमोक को पता चला कि रूस एयरवेज को हाईजैक करने के अलावा फर्जी कंटेंट भी तैयार कर रहा है.
जब रूस के सैनिकों ने इस शहर पर नियंत्रण किया तो 5 हथियारबंद सैनिक उनके घर पहुंचे. उनका लैपटॉप और कंप्यूटर कब्जे में ले लिया गया और उनसे और उनकी पत्नी से सेना के अड्डे पर चलने के लिए कहा गया.
उनसे पूछा गया कि उनकी मीडिया कंपनी रूसी सैनिकों को कब्जाधारी क्यों कह रही है. मिख़ाइलो ने जवाब दिया कि इसके अलावा वो उन्हें क्या कहें.
"वो तथाकथित नाजी निरस्तीकरण की बात कर रहे थे. फिर मैंने जवाब दिया कि मैं एक यहूदी हूं. मैं रूसी भाषा बोलने वाला यहूदी हूं- अब ये बताओ कि तुम यहां क्या करने आए हो? मेरे लिए तुम कब्ज़ाधारी के अलावा और कोई नहीं हो."
मिख़ाइलो ने कहा कि वो रूसी सैनिकों का साथ देने और उनका प्रोपेगैंडा को छापने के लिए तैयार नहीं थे. उन्होंने अपने अख़बार और वेबसाइट को बंद करने का फ़ैसला लिया. लेकिन वो तब हैरान रह गए जब उनके अख़बार की ब्रांडिंग के साथ एक फ़र्ज़ी अख़बार स्थानीय लोगों के बीच बांटा जा रहा था.
"वो एक फ़र्ज़ी अख़बार है जिसकी प्रिंटिंग बहुत ही ख़राब है. लेकिन लोगो हमारा है. पहले पन्ने पर रूस के बनाए गए मेयर की तस्वीर है, साथ में पुतिन की एक छोटी फोटो है. एक अन्य तस्वीर में कब्ज़ाधारियों को स्थानीय लोगों की मदद करते हुए दिखाया जा रहा है."
प्रोपेगैंडा और फ़ेक न्यूज़
एक लेख में ये कहा गया था कि रूसी प्रशासन गैस के दाम कम कर देगा, सभी क़र्ज़े माफ़ कर देगा और अस्थायी रूप से टैक्स के सभी भुगतान रद्द कर देगा.
ये ऐसे खोखले वादे थे जैसे 2014 में क्राइमिया पर नियंत्रण करते वक्त किए गए थे.
रूस के प्रोपेगैंडा और फ़ेक न्यूज़ का पर्दाफ़ाश करने में महारथ रखने वाली फैक्ट चैक न्यू़ज़ संस्था स्टोपफ़ेक के चीफ़ एडिटर यूगेन फेडशेंको कहते हैं, "उस समय भी उन्होंने लोगों से वादा किया था कि वो क़र्ज़ माफ़ कर देंगे और उनकी बचत को लौटा देंगे. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ."
"यही वजह है कि यूक्रेन के अधिकतर लोग समझते हैं कि ये वादे खोखले शब्दों के अलावा कुछ भी नहीं हैं."
मिख़ाइले इससे समहत हैं. वो इस बात को लेकर चिंतित हैं कि फ़र्ज़ी अख़बार जैसा प्रोपेगैंडा बुजुर्ग लोगों को प्रभावित करता है. लेकिन वो कहते हैं कि बहुत से लोग ये देखेंगे कि जब रूस ने क्राइमिया पर हमला किया था तब क्या हुआ था.
वो कहते हैं, "लोग यहां आंख बंद करके रूस के मीडिया पर यकीन नहीं करेंगे. सबसे पहले तो वो ख़ुद से ही ये पूछेंगे कि रूस के सैनिकों के हमले के बाद मेरा अपना जीवन बेहतर हुआ है या बदतर हुआ है? और यहां निश्चित रूप से लोगों का जीवन बदतर हुआ है. लगभग सभी का हुआ है."
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