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तालिबान का मज़बूत होना पाकिस्तानियों के लिए कैसा रहेगा?
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
अफ़ग़ानिस्तान से विदेशी सैनिकों की वापसी के साथ, अफ़ग़ान तालिबान की कार्रवाइयों में तेज़ी आ गई हैं और हर दिन ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि उन्होंने देश के विभिन्न क्षेत्रों और चौकियों पर क़ब्ज़ा कर लिया है.
न्यूज़ एजेंसी एएफ़पी ने पिछले दिनों ख़बर दी थी कि अफ़ग़ान तालिबान ने सीमावर्ती प्रांत बदख्शां में मुख्य सीमावर्ती कॉरिडोर के अलावा कई क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा कर लिया है.
हालांकि, शुक्रवार को पाकिस्तान की सीमा पर कार्रवाई करते हुए, तालिबान ने अफ़ग़ान सेना की पाकिस्तान से लगी सीमा पर स्थित चौकियों पर भी क़ब्ज़ा कर लिया.
याद रहे कि इससे पहले तज़ाकिस्तान की तरफ से जारी हुए एक बयान में कहा गया था कि अफ़ग़ान तालिबान ने सीमाई इलाक़ों में अफ़ग़ान सेना पर हमले और हिंसक कार्रवाई की है जिसकी वजह से अफ़ग़ान सेना के एक हज़ार से अधिक सैनिक सीमा पारकर तज़ाकिस्तान में शरण लेने के लिए मजबूर हो गए हैं.
पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रांत के मंत्री और बाजौर के विधानसभा सदस्य ने पुष्टि की है कि अफ़ग़ान तालिबान ने पिछले हफ़्ते कुनार और कंधार से लगी पाकिस्तानी सीमा पर स्थित अफ़ग़ान सेना की चौकियों पर हमले किए हैं.
इन घटनाओं के बाद बलूचिस्तान के पूर्व बाजौर एजेंसी और चमन ज़िले से सटे इलाक़ों के रहवासियों में दहशत का माहौल है.
बीबीसी ने टिप्पणी के लिए पाकिस्तान सेना के जनसंपर्क विभाग आईएसपीआर से संपर्क किया, लेकिन उन्होंने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.
अफ़ग़ान तालिबान की तरफ़ से जारी किए गए वीडियो में देखा जा सकता है कि हथियारबंद लोग किसी पहड़ी क्षेत्र में मौजूद हैं, जहाँ आसपास कंटीले तारों की बाड़ लगी हुई है.
वीडियो में बात करने वाला व्यक्ति दावा करता है कि वो इस समय अफ़ग़ान सरकार की सीमा चौकी पर मौजूद है और वो अफ़ग़ान सैनिकों को वहाँ से हटाने में क़ामयाब हो गए हैं.
हालांकि, ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के ज़कात और उशर विभाग के मंत्री और बाजौर के विधानसभा सदस्य अनवर ज़ेब ख़ान ने कहा कि इस घटना से बाजौर पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
उन्होंने कहा कि "हमारी सेना और सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट हैं. वे सीमा पर अपनी ड्यूटी निभा रही हैं और साथ ही सीमा पर बाड़ भी लगा दी गई है."
उन्होंने बताया कि "स्थिति नियंत्रण में है. सरकार और संस्थान अलर्ट हैं. क्षेत्र के राघान बांध पर बड़ी संख्या में पर्यटक आये हुए हैं. लोग अपनी ज़िंदगी के कारोबार में व्यस्त हैं."
स्थानीय नागरिकों में डर और दहशत
बाजौर से नेशनल असेंबली के पूर्व सदस्य सैयद अखुंदज़ादा चिटान के मुताबिक़, शुक्रवार को शाम के समय बड़ी संख्या में अफ़ग़ान तालिबान ने कुनार प्रांतीय मुख्यालय खार से क़रीब 30 किलोमीटर दूर गाखी दर्रा सीमा पर हमला किया था और वहाँ मौजूद अफ़ग़ान सैन्य चौकियों पर क़ब्ज़ा कर लिया था.
पूर्व एमएनए के अनुसार, इस समय आम लोग डर की स्थिति में हैं. उन्हें डर है कि कहीं वो दिन वापस तो नहीं आने लगे हैं, जब उन्हें अपनी कोठरियों, घरों, खेतों, बगीचों और स्कूलों से वंचित कर दिया गया था.
"हमें डर है कि अगर इस बार भी ऐसा ही हुआ, तो शायद यह पहले से ज़्यादा ख़तरनाक साबित होगा."
पूर्व एमएनए का कहना था कि अब, जबकि अफ़ग़ान तालिबान ने पाकिस्तान से जुड़े सीमावर्ती इलाकों को अपना निशाना बना लिया है, अगर पाकिस्तान अपनी नीति ठीक नहीं करेगा, तो यहाँ स्थिति बिगड़ने का ख़तरा रहेगा.
बाजौर में अफ़ग़ानिस्तान की सीमा पास के क्षेत्र में रहने वाले एक नागरिक के अनुसार, उन्हें डर है कि कहीं वो उसी तरह की स्थिति का शिकार न हो जाएं जिसका सामना उन्हें 1990 के दशक में करना पड़ा था.
उस समय बाजौर के हर घर में बम का गोला गिरा था. हर घर आतंकवाद से प्रभावित हुआ था. लोग अपने घरों को छोड़कर दूसरे शहरों में असहाय जीवन जीने को मजबूर हो गए थे.
हालांकि, बीबीसी से बात करते हुए प्रांतीय मंत्री ने कहा कि बाजौर में किसी भी तरह के डर और दहशत की बातें ग़लत हैं और इस तरह की छोटी-छोटी घटनाएं तो हर जगह होती हैं, लेकिन कोई बड़ी समस्या नहीं है.
सीमावर्ती इलाक़ों और चौकियों को क्यों निशाना बनाया जा रहा?
रक्षा विश्लेषक और पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल अमजद शोएब के अनुसार, अफ़ग़ान तालिबान योजना के तहत अफ़ग़ानिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा करते जा रहे हैं.
उन्होंने कहा कि "पहले उन्होंने उत्तर में तज़ाकिस्तान के साथ लगे सीमावर्ती क्षेत्रों और चौकियों पर क़ब्ज़ा किया और अब वे दक्षिण की ओर बढ़ रहे हैं. कुनार और कंधार के सीमावर्ती क्षेत्रों के साथ साथ, मुझे यह भी डर है कि वे लांडी कोटल में तोरखम सीमा पर भी अपना दबाव बढ़ाएंगे जिसके लिए वो योजना बना रहे होंगे."
बीबीसी से बात करते हुए पूर्व लेफ़्टिनेंट जनरल अमजद शोएब ने कहा कि ज़ाहिरी तौर पर ऐसा लग रहा है कि अफ़ग़ान तालिबान यह सब अपनी लॉन्ग टर्म प्लानिंग के तहत कर रहे हैं.
वे बोले, "हो सकता है कि वे क़ाबुल की ओर बढ़ने से पहले सभी सीमावर्ती क्षेत्रों को अपने क़ब्ज़े में लेकर क़ाबुल की वर्तमान सरकार को अपनी शर्तों पर बातचीत की मेज़ पर लाना चाहते हों या उनकी सभी मदद, समर्थन और फ़रार होने के रास्तों को बंद करना चाहते हों."
उनका कहना था कि ज़ाहिरी तौर पर मुझे ऐसा लग रहा है कि सीमावर्ती क्षेत्रों और काबुल से दूरदराज़ चौकियों की रक्षा के लिए तैनात अफ़ग़ान सैनिक तालिबान का ज़्यादा मुक़ाबला नहीं कर पाएंगे, क्योंकि चौकियों पर तैनात सैनिकों की संख्या कम होती है.
उन्होंने कहा कि "इन सैनिकों को ज़मीनी और हवाई मदद मिलना मुश्किल है, जबकि अफ़ग़ान तालिबान बड़ी संख्या में इकठ्ठे होकर हमला करने के बाद, इन चौकियों पर क़ब्ज़ा कर रहे हैं."
हालांकि, उनका कहना था कि अफ़ग़ान तालिबान के लिए क़ाबुल और अफ़ग़ानिस्तान के शहरी इलाक़े आसान नहीं होंगे.
उन्होंने कहा कि "अफ़ग़ान सेना क़ाबुल सहित अन्य शहरी क्षेत्रों में अपना भरपूर बचाव करेगी, इसलिए इससे पैदा होने वाली अराजकता की स्थिति को नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता."
सेवानिवृत्त लेफ़्टिनेंट जनरल अमजद शोएब ने कहा कि इसमें तो कोई संदेह नहीं है कि अगर अफ़ग़ानिस्तान में एक स्थिर सरकार नहीं बनी तो पाकिस्तान में समस्याएं पैदा होंगी.
अफ़ग़ानिस्तान में अराजकता के कारण आतंकवादी कहे जाने वाले ग्रुप सक्रिय होंगे और उन्हें कार्रवाई करने का अवसर मिलेगा और ऐसी स्थिति में न केवल पाकिस्तान बल्कि दूसरे देश भी प्रभावित हो सकते हैं. इसीलिए अफ़ग़ानिस्तान की सीमा से लगे पाकिस्तान, रूस, ईरान जैसे सभी देश मिलकर कोशिश कर रहे हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा न हो.
सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल अमजद शोएब के मुताबिक, बाजौर समेत पाकिस्तान के अन्य सीमावर्ती इलाकों में हालात बिगड़ने का खतरा ज़रूर है, लेकिन पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियां हालात पर नजर रखे हुए हैं.
'आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध' और बाजौर
बाजौर क्षेत्र का अतीत में पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के लिए बहुत महत्व रहा है. 1960 के दशक की शुरुआत में इस क्षेत्र पर कब्जे को लेकर पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच संघर्ष हुआ था. लेकिन अफ़ग़ान सेना हार गई थी और उसके बाद कुछ समय के लिए दोनों देशों के राजनयिक संबंध ख़त्म हो गए थे.
9/11 की घटना के बाद से बाजौर में हालात ख़राब होते चले गए और अमेरिका ने इस क्षेत्र में कई बार ड्रोन हमले किए. सबसे बड़ी घटना जनवरी 2006 में हुई थी, जब बाजौर में अफ़ग़ान सीमा से सटे गाँव डामडोला में अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए ने ड्रोन हमला किया था. इस ड्रोन हमले में 18 नागरिकों की मौत हुई थी.
हमले के बाद, अमेरिका और पाकिस्तानी अधिकारियों की तरफ से कहा गया था कि ये हमला, ओसामा बिन लादेन के बाद अल-कायदा में दूसरे सबसे बड़े नेता अयमान अल-जवाहिरी को निशाना बनाने के लिए किया गया था, और इस हमले में अन्य नेता मारे गए हैं.
हालांकि, बाद में यह स्वीकार किया गया कि इस हमले में अल-कायदा का कोई भी वरिष्ठ नेता नहीं मारा गया था.
इस घटना के दस महीने बाद, अक्टूबर 2006 में, अमेरिका ने एक बार फिर अयमान अल-जवाहिरी को निशाना बनाने के लिए चिनागई गांव के एक मदरसे पर ड्रोन हमला किया, जिसमें 70 से अधिक लोग मारे गए, जिनमें से ज़्यादातर मदरसे के छात्र थे.
अफ़ग़ानिस्तान में स्थिति क्या है?
अफ़ग़ान सरकार और अफ़ग़ान तालिबान के बीच देश के विभिन्न हिस्सों में संघर्ष जारी है, और दोनों पक्षों की तरफ से अपनी-अपनी कामयाबियों के दावे भी किये जा रहे हैं.
अफ़ग़ान तालिबान देश के विभिन्न प्रांतों में 100 से अधिक शहरों पर नियंत्रण का दावा करता है, दूसरी तरफ अफ़ग़ान सरकार के सूत्रों का कहना है कि ये वो क्षेत्र हैं जहां पहले से ही तालिबान के लोग मौजूद थे और जो इलाक़े अफ़ग़ान सरकार ने छोड़े हैं वह रणनीति के तहत छोड़े गए हैं.
काबुल के एक अफ़ग़ान पत्रकार असद समीम ने बीबीसी को बताया है कि अफ़ग़ान सैनिकों ने 14 जिलों का कंट्रोल वापिस ले लिया है और इसके लिए जमीनी और हवाई हमले किए गए हैं. हालांकि, इसका पता नहीं चल सका है, कि ये 14 जिले कौन से हैं.
दूसरी ओर, अफ़ग़ान तालिबान ने ऐसी वीडियो भी जारी की हैं, जिनमें अफ़ग़ान तालिबान, पाक-अफ़ग़ान सीमा के पास कुनार प्रांत के सीमावर्ती इलाकों में घुस गए हैं.
अफ़ग़ानिस्तान में अफ़ग़ान तालिबान के प्रवक्ता ज़बीहुल्ला मुजाहिद ने इस बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में कहा है कि उन्हें इस बारे में कोई सूचना नहीं मिली है.
तालिबान का पक्ष
अमेरिका सहित सभी विदेशी सेना अफ़ग़ानिस्तान से वापिस जा रही हैं, लेकिन दूसरी ओर, युद्धग्रस्त इस देश में ऐसा खालीपन नज़र आ रहा है, जिसे भरने के लिए सशस्त्र प्रयास चल रहे हैं, और इस समय देश के विभिन्न हिस्सों में अफ़ग़ान सरकार और अफ़ग़ान तालिबान के बिच संघर्ष जारी है.
कतर में तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के प्रवक्ता सोहेल शाहीन ने पिछले दिनों एक बयान में कहा था कि यह धारणा गलत है कि तालिबान ने जिन क्षेत्रों पर नियंत्रण कर लिया है, वहां मीडिया के लोगों और महिलाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया है.
उनका कहना था, कि "इन क्षेत्रों में लोगों को पूरी आज़ादी है और कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है."
तालिबान के प्रवक्ता की तरफ से इस बयान में कहा गया है कि ये एक प्रोपेगेंडा चलाया जा रहा है.इन इलाक़ों में लोग रह रहे हैं और जो इस्लाम के दायरे में रह कर ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं उनके लिए कोई समस्या नहीं है.
अफ़ग़ानिस्तान के कुनार और कंधार प्रांतों का महत्व
पाकिस्तान की अफ़ग़ानिस्तान के साथ 2670 किलोमीटर लंबी सीमा है. पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के कई हिस्सों में रहने वाले लोग एक दूसरे के करीबी रिश्तेदार हैं. उनके आपस में आर्थिक और सामाजिक संबंधों के अलावा एक-दूसरे के पास आना जाना भी हैं.
अफ़ग़ान मामलों के विशेषज्ञ फैज़ुल्ला ख़ान के अनुसार, सोवियत संघ और अफ़ग़ानिस्तान के बीच हुए युद्ध के दौरान और उससे पहले भी कुनार और कंधार प्रांत अफ़ग़ान युद्ध का एक महत्वपूर्ण केंद्र होता था.
ये प्रांत कभी सोवियत संघ के साथ युद्ध के दौरान गुलबुद्दीन हिकमतयार के हिज़्ब-ए-इस्लामी संगठन के महत्वपूर्ण केंद्र थे.
फैजुल्ला ख़ान के अनुसार, कुनार और कंधार बाद में अफ़ग़ान तालिबान के महत्वपूर्ण गढ़ बन गए थे, और मुल्ला उमर सहित अफ़ग़ान तालिबान के शीर्ष नेतृत्व के एक बड़े हिस्से का संबंध कंधार प्रांत से ही है.
उनका कहना था कि आईएसआईएस ने जब अफ़ग़ानिस्तान में अपनी गतिविधियाँ शुरू की, तो उन्होंने भी अपनी गतिविधियों की शुरुआत कुनार और नंगरहार प्रांतों से की थी.
एक समय आईएसआईएस ने कुनार प्रांत में काफी मज़बूती से अपने क़दम जमा लिए थे, और इसके अलावा कुनार में अफ़ग़ान तालिबान और आईएसआईएस के बीच खूनी लड़ाईयाँ भी हो चुकी हैं.
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