'ऐसी किल्लत कि पानी का छौंक लगाते हैं'

    • Author, संजय तिवारी
    • पदनाम, लातूर से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

महाराष्ट्र में प्रशासन ने लातूर शहर में पानी को लेकर संघर्ष रोकने के लिए जल स्रोतों के आस-पास धारा 144 लगा दी है.

लातूर में पानी के स्रोतों के आसपास अब 5 से अधिक लोगों के इकठ्ठा होने पर निषेधाज्ञा है.

सूखे की मार और उसके बाद पानी की किल्लत जैसी स्थिति पैदा होने के कई कारण हैं.

महाराष्ट्र के लातूर में पिछले एक महीने से नलों में पानी नहीं आ रहा.

इसके पहले तो महीने में एक बार नलों में पानी आ भी जाता था, अब उसकी भी उम्मीद नहीं रही. लिहाजा 13 वॉटर स्टोरेज टैंकों पर भीड़ उमड़ने लगी और कानून व्यवस्था की स्थिति चरमराने लगी.

आगे महानगरपालिका के कॉर्पोरेटर्स की मनमानी के चलते पानी आपूर्ति की प्रक्रिया और ठप पड़ गई है.

इसी मुद्दे पर सोमवार को जिलाधिकारी दफ्तर में नागरिक और अधिकारियों की एक बैठक हुई. इसमें पर्यावरण और पानी से जुड़े मामलों के लेखक अतुल देउलगावकर शामिल हुए.

वे बताते हैं कि हालात महानगरपालिका अधिकारियों के नियंत्रण से बाहर हो चुके थे, इसीलिए जिलाधिकारी को निषेधाज्ञा लागू करनी पड़ी.

अब पूरा जिला प्रशासन पानी आपूर्ति को सुचारू करवाने का प्रयास कर रहा है. देउलगावकर बताते हैं कि इस वर्ष मराठवाड़ा में पानी लेते समय भड़की हिंसा में कुछ लोगों की मौत हो चुकी है.

लातूर में रहने वाले 53 साल के व्यवसायी धनंजय महिन्द्रकर बताते हैं कि लातूर में पानी को लेकर इतने बुरे हालात पहले कभी नहीं थे. पानी को लेकर हिंसा की आशंका बनी रहती है. लिहाज़ा जिलाधिकारी ने जमावबंदी यानी निषेधाज्ञा आदेश जारी कर दिए हैं.

कॉर्पोरेशन टैंकर के ज़रिए 200 लीटर पानी प्रति परिवार दस दिनों के लिए देता है. चाहे परिवार छोटा हो या बड़ा. घर के बाहर 200 लीटर का बैरल रखा होता है जिसमें टैंकर उतना ही पानी देता है. फिर टैंकर दोबारा कभी 12 तो कभी 15 दिनों के बाद आता है.

लोग पानी का इस्तेमाल कैसे करते हैं, इस बारे में महिन्द्रकर कहते हैं, "खाना पकाते समय जैसे तेल डालते हैं, वैसे ही अभी पानी का इस्तेमाल हो रहा है. 200 लीटर पानी किसी भी परिवार को पूरा नहीं पड़ता ये कॉर्पोरेशन को समझना चाहिए."

दूसरी ओर टैंकर माफिया हालात का फ़ायदा उठाकर लोग को निजी रूप से टैंकरों से पानी बेच रहे हैं.

महिन्द्रकर बताते हैं कि 5 हज़ार लीटर टैंकर का पानी पहले 300-400 रुपये में मिल जाता था. आज वो एक हज़ार रुपये में मिलता है. ये आज की बात है. हो सकता है कल इसके लिए डेढ़ हज़ार रुपये देने पड़ें.

कुछ टैंकर अच्छा पानी लाते हैं, तो कुछ खराब लाते हैं. जो लोग यह पानी नहीं खरीद सकते उनके हाल बेहद बुरे हैं. एक अनुमान के मुताबिक़, अब तक 20 से 25 प्रतिशत लोग लातूर छोड़कर जा चुके हैं.

लातूर और मराठवाड़ा बड़े नेताओं का इलाका रह चुका है, जो राज्य में बड़े पदों पर रहे हैं. फिर यहां इस तरह के हालात कैसे बने?

महिन्द्रकर के अनुसार, "नेताओं में दूरदर्शिता की कमी से ये हालात बने. उन्होंने जनता के लिए कुछ नहीं किया. 10 साल मुख्यमंत्री रहने के बावजूद उन्होंने काम क्या किया, ये सवाल है."

लातूर के जलसंकट पर शोध कर चुके अतुल देउलगांवकर का मानना है, "जलसंकट की अहम वजह है 4 साल से बारिश का कम होना. लेकिन इसके पीछे अन्य कारण भी हैं. लातूर शहर को मांजरा डैम से पानी मिलता रहा है. यह 55 किलोमीटर दूर है और अब सूख चुका है."

इसके बावजूद 80 फीसदी तक पाइप लीकेज की आशंका है, कई स्थानों पर नल नहीं लगाए गए हैं, इसका भी बुरा असर हुआ है. मांजरा से पानी लाने के लिए महानगरपालिका को 15 लाख रुपये प्रति महीना बिजली का बिल देना पड़ता था जो महानगरपालिका के लिए आसान नहीं था.

अब नई जल योजना के तहत पानी उजनी डैम से लाने की बात चल रही है जो 163 किलोमीटर दूर है.

अतुल देउलगावकर बताते हैं कि दरअसल जब तक पानी को सिंगापुर और यूरोप की तरह रीसाइकल और रीयूज़ नहीं किया जाएगा ये समस्या हल नहीं हो सकेगी. वाष्पीकरण की गति और पानी की बढ़ती मांग को देखते हुए मई के बाद हालात और बदतर हो सकते हैं.

इस बार भी यदि मानसून ठीक नहीं रहा तो? इस सवाल पर धनंजय महिन्द्रकर कहते हैं, "तो आधा लातूर खाली हो जाएगा."

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