कारोबार हीरों का और मिशन है पानी

    • Author, प्रशांत दयाल
    • पदनाम, अहमदाबाद से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

गुजरात के सौराष्ट्र इलाके में साल के क़रीब दस महीने पानी की क़िल्लत रहती है और सरकारी योजनाएं ज़मीन से ज़्यादा काग़ज़ों पर ही चलती हैं.

लेकिन सूरत के तीन बड़े हीरा व्यापारियों ने अपने गांवों में नदियों को बड़ी करने और उन्हें जोड़ने का काम किया है.

बहुत सामान्य परिवार से आए लालजी पटेल पैसा कमाने कई साल पहले भावनगर ज़िले के गांव उगमडी को छोड़कर सूरत आए थे.

छोटी नौकरी से उन्होंने शुरुआत की और बहुत जल्द बड़े हीरा व्यापारी बन गए.

सूरत में धर्मानंद डायमंड के नाम से अपना कारोबार चलाने वाले लालजी पटेल ने बीबीसी को बताया, "जब भी अपने गांव उगमडी जाता तो बहुत दुख होता था, क्योंकि गांव में पानी ही नहीं था, हर साल भूमिगत जल का स्तर नीचे जा रहा था, ग़रीब किसान बारिश के भरोसे सिर्फ़ एक ही फ़सल ले सकते थे."

पटेल कहते हैं, "मैंने सुना था, अगर नदियों को जोड़ा जाए तो हमें पानी मिल सकता है. मैंने पता किया, हमारे गांव में केरी नदी थी, लेकिन वो बहुत ही छोटी थी, जिसमें बारिश में बहुत पानी आता था, जबकि ढाई किलोमीटर दूर सोनल नदी में बहुत पानी आता था, पर समंदर में बह जाता था."

वो आगे बताते हैं, "मैंने तय किया कि गांव की केरी नदी को सोनल नदी से जोड़ूंगा और तीन साल पहले हमने ढाई किलोमीटर लंबी पाइप लाइन से इन्हें जोड़ दिया. इसमें 15 करोड़ रुपए का ख़र्च भी हुआ."

आज उगमडी नदी के आसपास के 20 गांवों की स्थिति बदल गई है. अब साल भर इस नदी में पानी रहता है.

गांव के किसान भगवान मोरडिया ने बीबीसी को बताया, "पहले मेरे खेत में एक बीघा में 200 किलो कपास होता था, आज पानी मिलने के कारण 700 किलो पैदा कपास हो रहा है."

भाजपा सांसद मनसुख मांडविया कहते हैं कि लालजी पटेल की कोशिश से 500 हेक्टेयर ज़मीन में भूगर्भ जल का स्तर ऊपर आया है, जिसका सीधा फ़ायदा किसानों को हुआ है.

उगमडी के सरपंच वीनू पटेल भी इससे सहमत हैं. वो कहते हैं, "पहले पानी के लिए कुओं में 80 फ़ीट पर पानी मिलता था, लेकिन केरी नदी में पानी आने के कारण अब दस फ़ुट गहरा कुआं खोदने पर ही पानी मिल जाता है. हमारे गांव समेत आसपास के 10 हज़ार की आबादी को इसका फ़ायदा हुआ है."

लालजी पटेल के काम से प्रभावित होकर अमरेली ज़िले के इंगरोला गांव के जयराम ठेसिया ने भी अपने गांव में कुछ करने की ठानी.

जयराम भी 45 साल पहले गांव छोड़कर सूरत चले गए थे और हीरों के व्यापार में उन्होंने खूब पैसा कमाया.

जयरामभाई ने बीबीसी से कहा, "बचपन में मवेशियों को लेकर बीहड़ों में घूमता था तब सोचा था, अगर मेरे पास पैसा होगा तो गांव के लिए कुछ करूंगा. मुझे लगा कि अब वह वक़्त आ चुका है, आज मेरी उम्र 65 साल है, पांच साल पहले मैंने अपना कारोबार बंद कर दिया और निर्णय लिया कि मेरी जो भी संपत्ति है उसको लोगों के लिए लगा दूंगा."

जयरामभाई के गांव इंगरोला में ठेबी नदी है, लेकिन ये कहने को ही नदी थी और सिर्फ़ दो फ़ीट गहरी और 70 फ़ीट चौड़ी थी.

इसके कारण पानी का इकट्ठा होना संभव ही नहीं था, चार महीने पहले जयरामभाई ने ठेबी नदी की गहराई बढ़ाने का काम शुरू किया, अब नदी की गहराई 25 फ़ीट और चौड़ाई 700 फ़ीट हो गई है.

पिछले चार महीनों से रात-दिन नदी की खुदाई का काम हो रहा है, इस काम में अभी और चार महीने लगेंगे. उन्हें उम्मीद है कि इससे 10 किलोमीटर लंबी ठेसी नदी का स्वरूप बदल जाएगा. जयरामभाई ने बताया कि इस काम की लागत 15 से 20 करोड़ रुपए आने का अंदाज़ा है जिसकी व्यवस्था हो चुकी है.

उन्होंने ठेसी नदी पर पहले से ही 80 लाख रुपए की लागत से चार चेक डैम भी बना दिए हैं.

जयरामभाई को यहां के लोग 'नदी पुरुष' के नाम से भी जानते हैं. इसी प्रकार भावनगर के तुलसी पटेल ने भी अपने गांव के तालाब की गहराई बढ़ाने पर दो करोड़ रुपए ख़र्च किए हैं.

ज़ाहिर है कि अपनी जड़ों की ओर लौटे ये व्यापारी बखूबी जानते हैं कि जिस ज़मीन ने उन्हें मूल धन दिया उसका कर्ज़ ब्याज के साथ कैसे लौटाना है.

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