'ईश्वर के दरबार में तो समानता हो'

शनि शिगणापुर मंदिर
प्रकाशित

महाराष्ट्र में महिलावादी संगठनों ने अहमदनगर के शनि शिगणापुर मंदिर और मुंबई की हाजी अली दरगाह में महिलाओं को प्रार्थना की अनुमति दिए जाने के लिए प्रदर्शन किए हैं.

बीबीसी हिंदी ने शुक्रवार को अपने पाठकों से भारत के मंदिर, मस्जिद और गिरजाघरों में क्या औरत और मर्द को पूजा का अधिकार समान रूप से नहीं होना चाहिए विषय पर राय मांगी थी.

सैकड़ों लोगों ने इस मुद्दे पर टिप्पणियां की. हम यहां हमारे फ़ेसबुक और ट्विटर पन्ने पर आई कुछ चुनिंदा टिप्पणियां प्रकाशित कर रहे हैं.

राशिद अली ने लिखा, "इस्लाम क़ुरान और हदीस से चलता है. औरतों को घर में इबादत करने का हुक्म है. मर्दों के साथ नहीं. पर सबाब सबका बराबर है. वो घर में भी दुआ मांग सकती हैं अल्लाह सबकी सुनता है. बेहुरमती करना जायज़ नहीं."

ज्योत्सना सिंह कहती हैं, "अगर आपको अपने धर्म पर विश्वास है तो परंपरा नहीं तोड़नी चाहिए. अगर ऐसा करते हैं तो आपको अपने धर्म पर विश्वास नहीं. चाहे आप हिंदू हो, मुस्लिम हो या ईसाई. बस कुछ कुप्रथाओं को छोड़कर."

ज्ञानेश मिश्र लिखते हैं, "अलग अलग तर्क हैं पर हिंदुओं मे कुछ ही जगह रोक है. गुरुद्वारे में भी ऐसा नहीं है. मुसलमानों का तो रिवाज ही उलटा है."

मंजेश कुमार की टिप्पणी है, "धर्म अर्थात जो धारण किया जा सके जिसे अपनाया जा सके. धर्म कोई भी हो स्त्री पुरुष दोनों एक है. फिर धार्मिक स्थलो पर रोक एक मानसिक बीमारों की समस्या है."

हाजी अली दरगाह में प्रवेश के लिए प्रदर्शन
इमेज कैप्शन, महिला संगठनों ने हाजी अली दरगाह में प्रवेश के लिए प्रदर्शन किया है.

अतिउल्लाह मोहम्मद कहते हैं, "हिंदुस्तान की औरतों को बराबरी का हक़ दिला दिला कर पश्चिमी फ़ैशन आया और अपनी भारतीय सभ्यता को नुक़सान हुआ. मंदिर, मस्जिद और गिरजाघर की परंपराओं को तो ना तोड़ो. इसमें सियासत मत करो."

राजेश कुमार लिखते हैं, "कुछ बड़े मंदिर, मस्जिद और गिरिजाघरों को सरकारी घोषित कर दो और बाक़ी सबको बंद करके उनमे स्कूल और अस्पताल खोल दो. बस यही अंतिम उपाय है."

मोबीन अंसारी ने टिप्पणी की, "जहां हक़ छीन लेना चाहिए वहां तो औरतें ख़ामोश रहती हैं जैसे दहेज लेना-देना. पति का ज़ुल्म भी चुपचाप सह लेती हैं. इन सबके लिए लड़ती तो शायद औरतों की ज़िंदग़ी में फ़ायदा होता. मंदिर-मजार से कुछ नहीं मिलने वाला."

शशिकांत मिश्र- धर्म की बहस छोड़िए. उस मंदिर मे जाना ही बंद कर दो. ख़ुद ही समझ आ जाएगा. औरतें जाए ही ना वहां.

प्रीति सिंह कहती हैं कि धार्मिक परंपराओं का तार्किक आधार होता है उन्हे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए.

हाजी अली दरगाह मुंबई

चेतन शर्मा का मानना है- सभी प्रार्थना स्थानों में समान रूप से प्रवेश हो, सिर्फ एक ही स्थान पर प्रवेश के लिए आंदोलन और दूसरे में मौन ये ना हो.

दिनेश राठौर ने लिखा है, "औरतों को सनातन काल से चले आ रहे नियमों का पालन करना चाहिए. भगवान को विवाद से दूर रखना चाहिए. यह मन की भावना, श्रद्धा का प्रश्न है."

रामदत्त तिवारी लिखते हैं, "ईश्वर के दरबार में समानता न होगी तो फिर कहाँ होगी? हम समानता के पक्षधर हैं."

प्रमोद कुमार लिखते हैं, "जब प्राचीन समय से प्रथा चली आ रही है तो महिलाएँ क्यों पूजा करना चाहती हैं. धर्म को धर्म रहने दें."