महिलाएं जो बनीं हिम्मत और जज़्बे की मिसाल

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी.
    • Author, वात्सल्य राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
  • प्रकाशित

अपने काम से समाज के बीच अलग मुकाम बनाने वाली 100 महिलाएं शुक्रवार को दिल्ली में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात करेंगी.

अलग-अलग क्षेत्रों में पहचान बनाने वाली इन महिलाओं को महिला और बाल विकास मंत्रालय ने फ़ेसबुक पर कराए गए सर्वेक्षण के जरिए ख़ास सम्मान के लिए चुना है.

इनमें से कुछ महिलाओं से बीबीसी हिंदी ने बात की.

इन 100 महिलाओं में से एक हैं रूमा रोका. करीब एक दशक पहले टीवी पर मूक बधिरों के लिए प्रसारित होने वाले समाचार को देखते हुए रूमा ने अपनी ज़िंदगी का लक्ष्य तय किया. तब से अब तक वो हज़ारों मूक बधिरों की ज़िंदगी में बदलाव ला चुकी हैं.

रूमा बताती हैं, "टेलीविज़न में रविवार को एक कार्यक्रम आता था, जिसमें एक महिला सांकेतिक भाषा में समाचार पढ़ रही थी."

वो कहती हैं, "वहीं से मुझे लगा कि मुझे ये सीखना चाहिए और मैंने इसे सीखा. मुझे ऐसा लगा कि भगवान ने मुझे बोला कि ये तुम्हारा काम है इसे करो."

मकसद मिला. काम शुरु हुआ और बदलाव नज़र आऩे लगा. रूमा के परिवार में कोई मूक बधिर नहीं है. लेकिन उन्होंने हर मूक बधिर को अपने परिवार का सदस्य मान लिया.

छोटे बच्चों को सांकेतिक भाषा में ट्रेनिंग देना बहुत ही चुनौती भरा काम है. लेकिन रूमा रुकी नहीं. आज उनकी संस्था से प्रशिक्षण लेने वाले 1100 से ज़्यादा छात्र अलग-अलग उद्योगों से जुड़े हैं.

उनकी संस्था के 80 फ़ीसदी ट्रेनर भी मूक बधिर हैं. नोएडा और दिल्ली के अलावा जयपुर और जम्मू में भी उनके सेंटर हैं.

नोएडा की उर्मिला भार्गव ने भी संघर्ष को कामयाबी में बदलने का करिश्मा दिखाया और वो भी राष्ट्रपति से मिलने वाली 100 महिलाओं की सूची में शामिल हैं.

अब 80 बरस की हो चुकीं उर्मिला कहती हैं, "हम 1973 में दिल्ली आए थे. ये मेरे पति का प्रोजेक्ट था. हमने साहिबाबाद में तेल रिफाइनरी के लिए ज़मीन ख़रीदी."

वो अपने साथ हुए हादसे के बारे में बताती हैं, "लेकिन 1976 में मेरे पति को दिल का दौरा पड़ा. इससे उनकी मौत हो गई. मेरे तीन बच्चे हैं. उस समय मेरा बड़ा बेटा 16 साल का था."

वो आगे बताती हैं, "घरवालों ने कहा कि नौकरी कर लो लेकिन मैंने ये सोच रखा था कि मैं इसी को चलाऊंगी."

उर्मिला कहती हैं कि उन्हें दिक्कतें सहने और उनसे निपटने की आदत पड़ गई थी. बैंक से लोन नहीं मिला तो उन्होंने नौकरी की.

साल 2005 में एसिड क्ले की तकनीक को बंद किया गया तो उन्होंने आधुनिक वैक्यूम डिस्टलेशन की तकनीक के साथ नई यूनिट लगाई.

उर्मिला भार्गव की यूनिट को लेकर डॉक्यूमेंट्री बनी और दुनिया के सामने उनके संघर्ष और कामयाबी की कहानी आई.

लोगों को कन्या भ्रूण हत्या रोकने की शपथ दिलाती प्रोफ़ेसर संतोष अहलावत दहिया.

वहीं, इस लिस्ट में शामिल हरियाणा के झज्जर ज़िले की डॉक्टर संतोष दहिया अहलावत बेटी बचाओ अभियान की वजह से पूरे राज्य में पहचानी जाती हैं.

वो कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं. नौकरी के बाद का समय वो समाज को देती हैं.

अपनी उपलब्धि के बारे में वो कहती हैं,"कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए काम करते हुए मुझे करीब 15 साल हो गए. इसके लिए मैंने एक हस्ताक्षर अभियान चलाया हुआ है. इसके तहत मैंने 50 हज़ार हस्ताक्षर कराए हैं."

वो आगे कहती हैं, "मैंने हिसार ज़िले में मौजूद मुजारपुर गांव को गोद लिया है, जहां एक हज़ार पुरुषों पर केवल 273 महिलाएं हैं."

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाक़ों में महिलाओं के लिए निशुल्क कैंप लगाने वाली डॉक्टर सुजाता संजय ने भी 100 महिलाओं की इस लिस्ट में जगह बनाई है.

देहरादून की डॉक्टर सुजाता कहती हैं, "हमारी संस्था अब तक कुल 185 स्वास्थ्य कैंप लगा चुकी है जिसमें क़रीब सात हज़ार लोगों ने स्वास्थ्य लाभ उठाया है."

उलूपी झा.

बिहार के भागलपुर में मंजूषा कला को बचाने के लिए अनूठी पहल करने वाली उलूपी झा भी राष्ट्रपति से मिलेंगी.

उलूपी को गर्व है कि उन्होंने अपने प्रयासों से लगभग भुला दी गई मंजूषा कला को नई ज़िंदगी दी है.

वो कहती हैं, "मंजूषा कला एक लोक कला है, जो पूरी तरह से ख़त्म हो चुकी थी. मैंने इसे हर चीज़ पर उकेरना शुरू किया."

वो कहती हैं, "बड़े से बड़े कैनवास से लेकर एक छोटी सी कलम पर उकेरा और इसे व्यवसाय से जोड़ा. हमारा मकसद था कि अगर आर्टिस्ट को इससे फायदा होगा तभी ये कला जीवित रह पाएगी."

उलुपी झा से प्रशिक्षण लेने के बाद करीब 300 महिलाओं ने मंजूषा आर्ट को कमाई का जरिया बनाया है.

ऐसी ही बेमिसाल कहानियां उन बाकी महिलाओं की भी हैं, जिन्हें मिलाकर 100 वूमेन अचीवर्स की लिस्ट तैयार की गई है.

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