सुबह होती है और ग़ालिब ट्रैंड करने लगता है..

मिर्ज़ा ग़ालिब
    • Author, मिर्ज़ा एबी बेग
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू, दिल्ली
  • प्रकाशित

सुबह उठते ही सोशल मीडिया अपना हुनर दिखाता है और ग़ालिब ट्रेंड करने लगता है और ऐसे लोग जिनका शेर-ओ-सुख़न से दूर का वास्ता भी नहीं, वो भी इसमें कूद पड़ते हैं.

कोई शेर की टांग तोड़ता है, तो कोई कमर. यानी शेर उठने के क़ाबिल न रहे. ग़ालिब होते तो इस दुर्गति पर यही तो कहते-

हैरान हूँ कि रोऊँ कि पीटूँ जिगर को मैं,

मक़दूर हो तो साथ रखूँ नौहागर को मैं.

मिर्ज़ा ग़ालिब

218 साल पहले आज ही के दिन अागरा में अब्दुल्लाह बेग के घर एक लड़का पैदा हुआ, जो बाद में असदुल्लाह, नौशा मियां और फिर ग़ालिब के नाम से मशहूर हुआ.

लेकिन ग़ालिब अगर अपने बारे में कहते तो शायद ‘मशहूर’ की जगह ‘बदनाम’ शब्द का इस्तेमाल करते.

आज ग़ालिब हमें इसलिए याद आ गए कि हमारे ज़माने में हर चीज़ के लिए दिन मुक़र्रर कर दिया गया है और शायद हमारे ख़मीर (डीएनए) में भी यही है.

मिर्ज़ा ग़ालिब

ग़ालिब हमारे दौर के हैं या हम उनके ज़माने से आगे नहीं निकल पाए हैं, यह कहना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि ग़ालिब ने भी तो कहा था कि हर चीज़ के लिए संदर्भ होता है.

सीखे हैं महरुख़ों के लिए हम मुसव्वरी,

तक़रीब कुछ तो बहरे मुलाक़ात चाहिए.

मिर्ज़ा ग़ालिब

अगर ग़ालिब अभी ज़िंदा होते, तो अपनी 218वीं वर्षगांठ मना रहे होते और फिर बड़ा नाज़ उठवाते. और यह शेर शायद उन्होंने इसीलिए कहा था.

बहरा जो हूँ तो चाहिए दूना हो इल्तेफ़ात,

सुनता नहीं हूँ बात मुक़र्रर कहे बग़ैर.

मिर्ज़ा ग़ालिब के समय की दिल्ली की सड़कें
इमेज कैप्शन, मिर्ज़ा ग़ालिब के समय की दिल्ली की सड़कें

ख़ैर ग़ालिब हर किसी के लिए अपने मायने रखते हैं. हम कौन होते हैं किसी की सोच बदलने वाले.

लेकिन ग़ालिब बहुत अजीब हैं. उनके यहां विरोधाभास इतना है कि सबके लिए गुंजाइश है. वह अपनी भी सराहना से नहीं चूकते लेकिन बुराई के रूप में. या फिर अगर करेंगे भी तो लोगों की ज़बान से.

आज हमें सोशल मीडिया पर सबसे ज़्यादा जो शेर नज़र आया वह था.

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे,

कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े-बयां और.

मिर्ज़ा ग़ालिब

मेरे उस्ताद और जेएनयू के प्रोफ़ेसर असलम परवेज़ ने ग़ालिब के एक शेर से बहस करते हुए कहा था कि उसका शेर हलका हो ही नहीं सकता.

उसमें मायनों का एक समंदर होता है. और फिर उन्होंने एक शेर की व्याख्या करते हुए उनकी शायरी के मैदान को चुनने की बात कही.

खुलता किसी पे क्यों मेरे दिल का मुआमला,

शेरों के इंतिख़ाब ने रुसवा किया मुझे.

यहां ‘रुसवा’ का मतलब शोहरत है. यानी ग़ालिब सीधे-सीधे जिससे इनकार करें, उनका मतलब वही होता है.

मिर्ज़ा ग़ालिब के समय की दिल्ली की सड़कें
इमेज कैप्शन, मिर्ज़ा ग़ालिब के समय की दिल्ली की सड़कें

दूसरे शब्दों में, उन्होंने अपने दिल की हालत या अपने विचार की अभिव्यक्ति के लिए ही इस मैदान का चुनाव किया है. इसी तरह हम देखते हैं जब वह कहते हैं-

होगा कोई ऐसा भी जो ग़ालिब को न जाने,

शायर तो वो अच्छा है पे बदनाम बहुत है.

मिर्ज़ा ग़ालिब

ग़ालिब अगर इस दौर में होते तो उन्हें सोशल मीडिया बहुत रास आता क्योंकि वह किसी को कुछ कहने से चूकने वाले नहीं थे.

उनके लिए फ़ॉलो और अनफ़्रेंड दोनों के बटन का ख़ूब प्रयोग किया जाता. लेकिन अनफ़्रेंड तो सिर्फ़ सिरफ़िरे शायर ही करते.

ग़ालिब में एक बात और थी, जो कम ही शायरों में मिलती है. वह दूसरों की सराहना में कभी पीछे नहीं हटते.

उनकी चोट का असर कोई उनके समकालीन कवि ज़ौक़ से पूछे कि बादशाह ज़फ़र को बीच में आना पड़ा था और अच्छी बात यह है कि जब ज़ौक़ का एक शेर उनके सामने पढ़ा गया, तो वह शतरंज छोड़कर उसके बारे में पूछने लगे. उनकी पसंद का शेर यह था.

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे,

मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे.

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