'मोदी जी कुछ नया सोचिए, नया कीजिए'

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नरेंद्र मोदी सरकार ने बुधवार को कश्मीरी पंडितों के पुनर्स्थापन के लिए 2000 करोड़ रुपए के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया.

कैबिनेट ने कश्मीर घाटी में पंडितों को दोबारा बसाने के लिए उन्हें 3,000 सरकारी नौकरियां और ट्रांज़िट एकोमोडेशन देने की मंज़ूरी दे दी.

नए प्रस्तावों के मुताबिक़ कैबिनेट ने जम्मू के पहाड़ी इलाक़ों में चरमपंथ से प्रभावित लोगों को मदद देने पर मुहर लगा दी.

कश्मीरी पंडित इन प्रस्तावों के बारे में क्या सोचते हैं, ये जानने के लिए बीबीसी संवाददाता विनीत खरे ने उनसे बात की.

सुशील पंडित–हाईव कम्युनिकेशंस प्रमुख

कश्मीर में विस्थापन किसी पैसे, ज़मीन की तलाश में नहीं था. हम कोई बाढ़ या भूकंप पीड़ित नहीं हैं कि हमें घर, मकान या नौकरी की ज़रूरत हो.

ये विस्थापन एक सोची-समझी जाति संहार की नीति के तहत किया गया था. तब पूरे समुदाय को घरों से खदेड़ दिया गया था.

आज भी वहां स्थिति बेहतर नहीं हुई है, बल्कि बिगड़ी हुई ही है. आज भी वहां जान के लाले हैं. जो सैंकड़ों हत्याएं, बलात्कार, आगज़नी और लूटपाट हुई, आतंक मचा, उसके एक भी अपराधी को न तो सज़ा हुई, न अपराध तय हुआ.

ऐसे में आप लोगों को लौटने के लिए किस तरह से आत्मविश्वास दे पाएंगे. इसीलिए पिछले 26 सालों में इन टुकड़ों के फेंके जाने के बावजूद आज तक कोई नहीं लौटा.

उम्मीद अभी भी इन्हीं (मोदी सरकार) पर टिकी हुई है. कोई चारा भी नहीं है. बार-बार यही कहा जा रहा है कि आप पुराना ढर्रा छोड़िए.

आप इन नौकरशाहों की घिसी-पिटी तरकीबों से बाहर निकलिए. कुछ नया सोचिए. और कुछ नया कीज़िए.

अगर आप उसी पुरानी नीति पर चलते रहेंगे तो इस बदलाव का फ़ायदा क्या है? बार-बार बताया जा रहा था कि चुनाव के बाद हालात बदल जाते हैं. तब तक या तो आपकी इच्छा शक्ति मर जाती है या वातावरण आपको ऐसे संभाल लेता है कि आप सब कुछ भूल जाते हैं.

कश्मीर में सरकार बनाने के बाद जिस तरह के समझौते किए गए और एजेंडा फ़ॉर एलायंस लिखकर जिस तरह अपने हाथ-पांव बांध दिए गए उसके बाद लगता नहीं कि आप कुछ करने की स्थिति में हैं. इस बात से सबसे ज़्यादा मायूसी हुई है.

जी नहीं (मेरी नरेंद्र मोदी से कोई बात नहीं हुई है). वो बहुत दूर हैं. और वो पहुंच के बाहर दिखाई पड़ते हैं.

रशनीक खेर–रूट्स इन कश्मीर

आठ साल पहले मनमोहन सिंह जी ने भी पैकेज की घोषणा की थी. इसमें 6,000 नौकरियों की बात की गई थी. इसमें से ज़्यादातर नौकरियां भरी नहीं गई हैं. लगभग 1600 लोगों की नौकरियां लगी और क़रीब 4400 पद ख़ाली हैं.

अब ट्रांज़िट शेड की बात करते हैं. कश्मीर को जिस ट्रांजिट एकोमोडोशन में रखा गया है, वो कंसंट्रेशन कैंप जैसे हैं. ये घर दरअसल प्री-फ़ैब्रिकेटेड सेट्स हैं.

कश्मीर की सर्दियों में इन घरों में रहना बहुत मुश्किल हो जाता है. यही नहीं, इनमें लोगों को भेड़-बकरियों की तरह ठूंसकर रखा जाता है.

इन घोषणाओं से पहले जब तक न्याय की बात नहीं की जाएगी तब तक लोग वापस नहीं जाएंगे.

ऐसा लगता है कि इस मुद्दे को अभी तक सही तरीक़े से समझा ही नहीं गया है. आप कश्मीरी पंडितों को वहीं नौकरी दे रहे हैं जहां वो मारे गए, जहां से वो भागकर आए. हमारी सरकार से गुज़ारिश थी कि वो यही नौकरियां जम्मू में दे देते.

ये कोई हाईक्लास नौकरियां नहीं हैं. लड़कियों की नौकरियां और उनके साक्षात्कार जम्मू में होने चाहिए थे.

अशोक कुमार धर–कश्मीरी पंडित

हम अनंतनाग में रहते थे. हमने 1990 में कश्मीर छोड़ा. वहां कश्मीरी पंडितों को मार दिया गया था.

चरमपंथियों ने कहा था कि आप लोग यहां से निकल जाइए. हमारे कुछ रिश्तेदार चरमपंथी हिंसा में मारे गए थे. इस वक़्त मैं जम्मू के बूटानगर में रह रहा हूं.

हमने पहले भी कहा कि अगर वादी में हमारे लिए अलग टाउनशिप बना दी जाए तो वो अच्छी बात होगी क्योंकि हम वहां मुसलमानों के साथ नहीं रह सकते. इस ताज़ा घोषणा में टाउनशिप पर कुछ नहीं कहा गया है.

पहले भी जिन नौकरियों या पदों की घोषणा की गई थी वो अभी भरी नहीं हैं. कश्मीर में अभी भी चरमपंथ ख़त्म नहीं हुआ है. अभी भी वहां सुरक्षाबलों की मौत हो रही है. टाउनशिप की घोषणा नहीं होने से कश्मीरी पंडितों दुखी हैं.

पहले कहा गया था कि टाउनशिप बनेगा लेकिन ताज़ा घोषणा में इसके बारे में कुछ नहीं कहा गया है.

संजय टिक्कू–कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति

ये एक अस्थायी क़दम है. पहले भी एक टाउनशिप बनाने की बात की गई थी जिस पर अलगाववादियों की ओर से प्रतिक्रिया हुई थी. यहां के राजनीतिक साझेदारों से बात होनी चाहिए.

कश्मीरी पंडितों के पुनर्स्थापन पर ट्रैक-टू पर बात होनी चाहिए. दोनो समुदायों के बीच अभी भी विश्वास की उतनी ही कमी है जितनी 90 के दशक में थी.

ये पुराना मुद्दा है जिसे राजनीतिक बनाया जा रहा है लेकिन अभी तक किसी भी पक्ष ने ईमानदारी से कोशिश नहीं की है.

आम लोग चाहते हैं कि कश्मीरी पंडित वापस आ जाएं लेकिन सुरक्षा कारणों से कश्मीरी पंडित वहां कम तादाद में नहीं रह सकते. सरकार को आप कश्मीर घाटी में एक स्मार्ट सिटी बनाने दीजिए और फिर आप वहां पंडितों को बसाइए.

अगर वहां 50 प्रतिशत कश्मीरी पंडित रहते तो बाक़ी के 50 प्रतिशत अन्य समुदायों के हो सकते हैं. मुझे नहीं लगता उसमें कोई समस्या है. लेकिन अगर पंडित कम संख्या में रहते हैं तो ये उनके लिए ग़ज़ा जैसी स्थिति हो जाएगी.

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