दादरी की कड़ी तो नहीं पंजाब का बेहबल कलां?

    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, अमृतसर से
  • प्रकाशित

कृष्ण भगवान सिंह की तस्वीर दीवार से टंगी थी. उसके नीचे ज़मीन पर परिवार के सदस्य और निआमीवाला गाँव के कई लोग ख़ामोशी से बैठे थे.

कृष्ण भगवान सिंह उन दो सिखों में से एक थे जो 14 अक्तूबर को हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस की गोली से मारे गए थे.

पुलिस फायरिंग उस समय हुई जब इलाक़े के सिख बेहबल कलां गाँव के एक गुरूद्वारे के बाहर गुरुग्रंथ साहिब के पन्ने बिखरे पड़े होने के बाद भड़क गए थे और गुरुद्वारे के बाहर प्रदर्शन कर रहे थे.

फ़रीदकोट के बेहबल कलां और आस पास के गाँवों में तनाव अब भी महसूस किया जा सकता था.

कृष्ण भगवान सिंह के घर को ढूंढ़ने के लिए किसी से पूछने की ज़रुरत नहीं पड़ी. घर के बाहर अब भी पुलिस का पहरा था.

लोग अब भी पुलिस और प्रशासन से नाराज़ थे. इस कांड के बाद गुरुग्रंथ साहिब की 'बेअदबी' के कुछ और भी मामले सामने आए. पूरे पंजाब में सिखों ने प्रदर्शन शुरू किए. प्रदर्शन तो अब थम से गए हैं लेकिन सिखों का ग़ुस्सा अभी भी कम नहीं हुआ है.

दरअसल उनकी नाराज़गी इन कांडों से पहले से चली आ रही है. सिरसा वाले डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत राम रहीम के ख़िलाफ़ सालों से इलज़ाम चला आ रहा है कि उन्होंने गुरु गोविंद सिंह का अपमान किया था.

पिछले महीने अचानक सिख धर्म के सर्वोच्च स्थायी समिति अकाल तख़्त ने उन्हें माफ़ कर दिया. सिखों ने इस पर ज़बरदस्त प्रदर्शन किया.

अकाल तख़्त पर पंजाब और विदेश के सिखों की नाराज़गी का इतना ज़बरदस्त दबाव पड़ा कि तख़्त के पाँचों सदस्यों ने इस माफ़ी नामे को वापस लेने का फ़ैसला किया.

लेकिन तब तक नुक़सान हो चुका था.

सिख समुदाय के कई प्रमुख लोगों के अनुसार इन घटनाओं की तारें देश भर में हो रही 'दलित और बीफ़' की घटनाओं से जुड़ते हैं.

करंजौत कौर एसजीपीसी की एक सीनियर सदस्य हैं.

वो कहती हैं, "जब हम देश में हो रही घटनाओं पर नज़र डालते हैं. जब हम दादरी जैसे कांड पर निगाह दौड़ाते हैं तो हमें लगता हैं कि फूट डालने की जो कोशिशें की जा रही हैं शायद पंजाब उसकी कड़ी तो नहीं?"

जसविंदर सिंह एडवोकेट श्रीमोनी गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) के एक पूर्व सदस्य हैं.

वो भी इन वारदातों को फूट डालने की कोशिश समझते हैं. उनके विचार में ये 2017 में पंजाब विधान सभा चुनाव को देखते हुए कराए जा रहे हैं.

वो कहते हैं, "जब चुनाव आता है तो कहीं बीफ़ पर लड़ाई होती है, कहीं दलितों को मार दिया जाता है, कहीं एक अकेले बंदे को आग लगा कर मार दिया जाता है कि इसने गाय को मार दिया. पंजाब का चुनाव आने वाला है. मुझे भी लगता है कि कोई न कोई ताक़त तो है इन कांडों के पीछे."

पुलिस कहती है कि गुरुग्रंथ साहिब की 'बेअदबी' के मामलों के पीछे कुछ असामाजिक सिखों का हाथ है. इस सिलसिले में पुलिस ने पांच लोगों को गिरफ़्तार किया है.

लेकिन सिख समुदाय इस दावे को ख़ारिज करता है. वो पुलिस के इस बयान को नकारते हुए कहते हैं कोई सिख ये काम नहीं कर सकता.

सिखों के विचार में उनके बीच मौजूदा अशांति का मुख्य कारण डेरा सच्चा को माफ़ करना है जो उनके मुताबिक़ एक राजनीतिक फ़ैसला है और ये मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की सरकार के 'इशारे' पर हुआ है.

गुरमीत राम रहीम के ख़िलाफ़ इलज़ाम का मामला 2007 से दबा हुआ था.

वो पूछते हैं, "अचानक बग़ैर सिखों की सहमति से उन्हें माफ़ी कैसे दे दी गई?"

सिखों का इलज़ाम है कि सरकार उनकी धार्मिक संस्थाओं पर क़ब्ज़ा करती जा रही है.

सरकार इस इलज़ाम को ग़लत बताती है लेकिन सिखों में सरकार विरोधी भावना बढ़ती ही जा रही है.

सिखों के एक स्थानीय धार्मिक नेता केवल सिंह कहते हैं, "एसजीपीसी वही दिमाग़ चला रही है जो सरकार चला रही है. हमारी सब से बड़ी संस्था है अकाल तख़्त. इसे भी सरकार ने वोटों की राजनीती करते हुए अपने पक्ष में कर लिया है."

गुरमीत राम रहीम को माफ़ करने में जिसका भी हाथ हो या सिख संस्थाओं पर सरकार का दबदबा हो या न हो ये बात सच है कि सिखों की धार्मिक संस्थाएं इस समय संकट का शिकार हैं.

करंजौत कौर कहती हैं, "ज़मीनी सतह पर जो सिख धर्म का प्रचार कर रहे हैं, जो कीर्तन कर रहे हैं जो कथा कर रहे हैं अब वो एक जगह पर आकर खड़े हो गए हैं और वो महसूस कर रहे हैं कि जत्थेदार साहिबान ने एक ग़लत फ़ैसला किया है (राम रहीम को माफ़ करने का) तो उन्हें अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ेगा."

जसविंदर सिंह एडवोकेट भी स्वीकार करते हैं कि सिख संस्थाएं संकट में हैं.

"अकाल तख़्त को सियासी लोग इस्तेमाल कर रहे हैं और वो इस्तेमाल हो रहे हैं. इससे एक संकट खड़ा हो गया है."

एक तरफ़ हालिया कांडों से सिख नाराज़गी जता रहे हैं तो दूसरी तरफ़ सिख धर्म में आत्म निरीक्षण की वकालत की जा रही है.

जिन सिख धार्मिक नेताओं से मैंने बातें कीं उनका कहना था सिख धार्मिक संस्थाओं में सुधार लाने की ज़रुरत है.

जसविंदर सिंह एडवोकेट कहते हैं, "सिस्टम बदलने की ज़रुरत है और इसे आधुनिक बनाने की ज़रुरत है."

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