जर्मन भाषा बदलेगी रिश्तों की तस्वीर?

    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
  • प्रकाशित

केंद्रीय विद्यालयों के छात्र फिर से जर्मन पढ़ पाएंगे.

पिछले साल जर्मन को त्रिभाषा फॉर्मूले के तहत पढ़ाए जाने पर विवाद के बाद इसे केंद्रीय विद्यालय के पाठ्यक्रम से हटा दिया गया था.

अब जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल के भारत दौरे में जिन 18 सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर हुए हैं, उनमें जर्मन को अतिरिक्त विदेशी भाषा के तौर पर स्कूलों में पढ़ाना भी शामिल है.

हालांकि स्वच्छ ऊर्जा, सुरक्षा, विज्ञान और टेक्नॉलॉजी के क्षेत्रों में हुए महत्वपूर्ण समझौतों की ख़बरों के बीच जर्मन भाषा पर हुई सहमति की ख़बर दब कर रह गई.

लेकिन ये सहमति भारतीय युवाओं के लिए एक अहम क़दम साबित हो सकती है.

जर्मन भाषा की अहमियत

मैर्केल के भारत दौरे में कई अहम क्षेत्रों में बनी सहमति
इमेज कैप्शन, मैर्केल के भारत दौरे में कई अहम क्षेत्रों में बनी सहमति

मैं 2012 में जर्मनी के शहर हनोवर में एक भारत प्रेमी जर्मन उद्योगपति से मिला था जिनकी कंपनियों के दफ़्तर कई भारतीय राज्यों में थे.

उनका कहना था कि भारतीय युवाओं का फ़ोकस अमरीका और इंग्लैंड है जबकि जर्मनी में उनकी खपत बहुत अधिक हो सकती है, बस उन्हें जर्मन भाषा आनी चाहिए.

उनका ये भी कहना था कि जर्मन आए तो आईटी क्षेत्र में भारत के युवाओं को जर्मनी में आसानी से नौकरियां मिल सकती हैं.

केंद्रीय विद्यालयों में 2011 से जर्मन भाषा पढ़ाई जा रही थी लेकिन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने इसे त्रिभाषा फॉर्मूले के तहत पढ़ाने पर आपत्ति की थी जिसके बाद जर्मन को हटाकर संस्कृत को लाया गया.

अब मोदी-मर्केल के बीच नई सहमति से भारतीय युवाओं के लिए जर्मन भाषा सीखने के मौक़े बढ़ेंगे और वे जर्मनी में रोज़गार के योग्य बन सकेंगे.

भारतीय इंजीनियरिंग और आईटी कंपनियों के लिए जर्मनी एक बड़ा बाज़ार है. लेकिन भाषा उनकी एक बड़ी समस्या है.

उनकी आम शिकायत ये है कि जर्मन भाषा बोलने वाले भारतीयों की बड़ी कमी है जिससे व्यापर के विस्तार में कठिनाई होती है.

क़रीब 1500 जर्मन कंपनियां भारत में मौजूद हैं जिन्हें हिंदी और जर्मन दोनों भाषा बोलने वाले लोग अक्सर नहीं मिलते.

दोतरफ़ा कारोबार

भाषा की इस समस्या के बावजूद आज दोनों देशों के बीच 17 अरब डॉलर से अधिक का व्यापार होता है.

जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और भारत एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यस्था है.

जर्मनी यूरोप में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है. विशेषज्ञ मानते हैं कि ये व्यापारिक रिश्ते इससे कई गुना बढ़ सकते हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने सोमवार को कहा कि भारत के आर्थिक विकास में जर्मनी की एक अहम भूमिका है.

भारत को जर्मनी की इंजीनियरिंग और मशीनों की ज़रूरत है और जर्मनी को भारत की आईटी विशेषज्ञता की.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'मेक इन इंडिया' के सपने को पूरा करने के लिए जर्मनी से कई समझौते किए गए हैं.

इस पर अमल हुआ तो जर्मनी अगले कुछ सालों में कई अरब डॉलर भारत में निवेश कर सकता है.

सच तो ये है कि इन दिनों वैश्विक राजनीति में भारत और जर्मनी की महत्वाकांक्षा मिलती जुलती हैं.

दोनों देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग कर रहे हैं और इसमें सदस्यता चाहते हैं. दोनों इस मुद्दे पर तालमेल बनाए हुए हैं.

मज़बूत होते रिश्ते

दरअसल भारत और जर्मनी के बीच 60 साल से भी पुराने संबंध जितने मज़बूत आज हैं पहले कभी नहीं रहे.

ये रिश्ता 1990 में जर्मनी के एकीकरण तक उतार-चढाव का शिकार थे.

जर्मन एकीकरण के एक साल बाद ही भारत के तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने विदेशी निवेश का रास्ता खोला और एक मज़बूत जर्मनी ने आर्थिक प्रगति में भारत का साथ देने का फ़ैसला किया था.

चांसलर मर्केल 2008 में जब भारत आईं थीं तो दोनों देशों के बीच एक रणनीतिक साझीदारी क़ायम हुई थी. यूरोप के बाहर चीन समेत भारत उन गिने चुने देशों में से हैं जिन्हें जर्मनी ने रणनीतिक साझीदार बनाया है.

मर्केल के मौजूदा भारतीय दौरे पर अगर आपकी गहरी निगाह है तो आपको इस बात का अहसास हुआ होगा कि इसमें काम की बातें अधिक हुईं, ठोस क़दम उठाने पर सहमति हुई.

साथ ही नाटकीय और भावुक घोषणाओं से परहेज़ किया गया, दोनों नेताओं के बीच हुई मुलाक़ातों को एक इवेंट मैनेजमेंट की तरह से पेश नहीं किया गया.

पारंपरिक रूप से जर्मनी का काम करने का यही तरीक़ा है और यही व्यावहारिक तरीक़ा भी है.

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