पायलट बनने वाला बन गया पटवारी

बलवंत खन्ना
इमेज कैप्शन, बलवंत खन्ना कहते हैं कि पॉयलट ट्रेनिंग के चक्कर में उनकी पढ़ाई भी छूट गई.
    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

जांजगीर-चांपा ज़िले में हिर्री गांव के बलवंत खन्ना को पांच साल पहले जब छत्तीसगढ़ सरकार ने पायलट प्रशिक्षण के लिए चुना तो उन्हें लगा कि उनके सपने अब साकार होने के दिन आ गए हैं.

बलवंत कहते हैं, “बचपन में अपने गांव से कभी कभार आसमान से उड़ते हवाई जहाज़ देख कर मैं ख़ुश हो जाता था. जब पायलट प्रशिक्षण की बात सुनी तो आप सोच नहीं सकते कि मैं कितना ख़ुश था.”

बलवंत ने कृषि विश्वविद्यालय की अपनी पढ़ाई छोड़ी और पायलट प्रशिक्षण में शामिल हो गए.

लेकिन एक दिन राज्य सरकार ने अचानक प्रशिक्षण योजना बंद कर दी.

ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले बेरोज़गार बलवंत कहते हैं, “मैं कहीं का नहीं रहा. ना एग्रीकल्चर की पढ़ाई कर सका और ना ही पायलट बन सका.”

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साई फ़्लाइटेक एवियेशन

छत्तीसगढ़ सरकार ने ग़रीब और पिछड़े वर्ग के लिए 2007 में पायलट प्रशिक्षण योजना शुरू की थी.

सरकार ने साईं फ़्लाईटेक नामक कंपनी के साथ क़रार किया और बाक़ायदा परीक्षा आयोजित कर के हज़ारों ग़रीब नौजवानों में से योग्य प्रतिभागियों को डेढ़ साल के प्रशिक्षण के लिए चुना.

हरेक प्रशिक्षु पायलट के लिए सरकार ने लगभग 14 लाख रुपए का भुगतान कंपनी को किया.

पायलट प्रशिक्षण के लिए चुने गए इन नौजवानों की आंखों में सपना था और उस सपने के सच होने की उम्मीद भी.

लेकिन प्रशिक्षण पूरा हो पाता, उससे पहले ही प्रशिक्षण देने वाली कंपनी साईं फ़्लाईटेक एक दिन अपना बोरिया बिस्तर बांध कर रवाना हो गई.

राज्य सरकार की इस योजना ने दम तोड़ दिया और हर साल पायलट प्रशिक्षण योजना में चुने जाने वाले नौजवानों के चांद-तारों को छूने के सपने तार-तार हो गए.

पड़ोसी राज्य झारखंड से भी 30 बच्चों को प्रशिक्षण के लिए भेजा गया लेकिन उन बच्चों का भी प्रशिक्षण अधूरा ही रह गया.

मस्तूरी इलाक़े के सुशील खांडे बनना तो चाहते थे पायलट, लेकिन बड़ी मुश्किल से अब पटवारी का काम मिला है. वे गांव-घर में इन दिनों ज़मीन की नाप जोख का काम करते हैं.

'अब मैं पटवारी हूँ'

सुशील खांडे
इमेज कैप्शन, सुशील खांडे.

सुशील खांडे कहते हैं, “मैंने सरकार की पायलट प्रशिक्षण योजना के लिए अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ दी थी. लेकिन 89 घंटे की फ़्लाइंग के बाद मेरी पायलट ट्रेनिंग बंद हो गई. न मैं इंजीनियर बना, ना ही पायलट. अब पटवारी हूं.”

राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह अब भी गाहे-बगाहे अपने भाषणों में पायलट प्रशिक्षण योजना का उल्लेख करते हैं लेकिन हालत ये है कि बंद हो चुकी प्रशिक्षण योजना के पूरे दस्तावेज़ भी सरकार के पास उपलब्ध नहीं है.

गायत्री नेताम
इमेज कैप्शन, आदिवासी विभाग की सहायक आयुक्त गायत्री नेताम.

यहां तक कि प्रशिक्षण ले रहे पूरे बच्चों की संख्या और नाम-पता भी विभाग के पास नहीं है.

आदिवासी विभाग की सहायक आयुक्त गायत्री नेतम कहती हैं, “जिन ग़रीब, आदिवासी और पिछड़े बच्चों ने ठीक से ट्रेन नहीं देखी हो, उनके लिए ये कल्पना से परे की योजना थी. इसका बंद हो जाना दुर्भाग्यजनक है.”

गायत्री नेतम का कहना है कि प्रशिक्षण बीच में ही छोड़ने वाली साईं फ़्लाईटेक के ख़िलाफ़ उन्होंने पिछले छह महीने में कई बार थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाने की कोशिश की. लेकिन हर बार उन्हें काग़ज़ात का हवाला दे कर वापस लौटा दिया जाता है.

मोदी से गुहार

नरेंद्र मोदी

गायत्री कहती हैं, “हमारी कोशिश है कि साईं फ़्लाईटेक के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो और उससे पैसों की वसूली भी की जाए.”

कुछ सरकारी अफ़सरों का कहना है कि सरकार फिर से इस प्रशिक्षण योजना को शुरू कर सकती है.

पायलट बनने की उम्मीद मन में पाले बच्चों को भी अफ़सर और नेता यही भरोसा दिला रहे हैं.

इसी सप्ताह कुछ प्रशिक्षु पायलटों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘स्किल डेवेलपमेंट’ का हवाला देते हुए, इस योजना को शुरू करने का अनुरोध किया है.

लेकिन ऐसे समय में, जबकि राज्य सरकार आदिवासियों और किसानों की तमाम योजनाओं के बजट में भारी कटौती कर रही है, हवाई जहाज़ उड़ाने का प्रशिक्षण अधूरा छोड़ चुके नौजवानों को सरकारी उम्मीद हवा-हवाई ही लग रही है.

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