कश्मीर बाढ़: 'मेरे लिए तो बेटा ही असली शहीद'

मेहर बेगम
    • Author, हाज़िक़ क़ादरी
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

भारत प्रशासित कश्मीर में श्रीनगर से 60 किलोमीटर दूर बांदीपुरा ज़िले में वुल्लर नदी के किनारे बसा है एक छोटा सा गांव अशतांगू.

2014 में कश्मीर में आई बाढ़ से ये गांव कमोबेश सुरक्षित ही रहा था.

इसी गांव के शौकत अहमद ने अपने एक रिश्तेदार अब्दुल राशिद के साथ पिछले साल इन्हीं दिनों अपना गांव छोड़ा और श्रीनगर में बाढ़ में फंसी बहन हलीमा को बचाने निकल पड़े.

हलीमा श्रीनगर के बेमिना इलाक़े में रहती थीं जो कि बाढ़ से सबसे अधिक प्रभावित इलाकों में से था.

शौकत और राशिद अभी हलीमा को ढूँढ ही रहे थे कि उन्होंने देखा कि लोग मदद के लिए पुकार रहे हैं.

100 ज़िंदगियां बचाईं

अन्य लोगों की मदद से उन्होंने बेमिना के करीब 100 लोगों की जान बचाई, बाढ़ प्रभावितों को खाना और कपड़े बांटे.

लगभग पूरा दिन लोगों को नाव से सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने के बाद वे शाम को बहन हलीमा के घर गए और हलीमा और उसके दो छोटे नवजातों को नाव में बिठाया.

अभी नाव घर से कुछ ही दूर चली थी कि बाढ़ का पानी नाव में घुसने लगा. नाव में शौकत, राशिद, हलीमा और उसके परिवार समेत लगभग 11 लोग मौजूद थे.

हलीमा की दो जुड़वा बच्चियां, राशिद और शौकत की डूबने से मौत हो गई.

बांदीपुरा के रहने वाले गुलाम जीलानी उस घटना को याद करते हुए बताते हैं कि वह दोनों की मौत के चश्मदीद हैं. वो मानते हैं कि वो शौकत और राशिद की मदद की वजह से आज ज़िंदा हैं.

शौकत के घर से कुछ दूर है एक पक्का मकान. ये मकान राशिद का है.

इस घर के एक कमरे के कोने पर दीवार का सहारा लेकर बैठी एक बूढ़ी महिला मेहर बेगम अपने बेटे राशिद की कहानी बयाँ करती हैं.

सरकार से मदद नहीं

शौकत का परिवार

मेहर कहती हैं, "जब शौकत और राशिद डूबे तो अशतांगू के लोगों ने उन्हें तलाशने का पूरा-पूरा प्रयास किया. बिना किसी सरकारी मदद के लोगों ने बेमिना के हर इलाक़े में उन्हें तलाशा. पाँचवें दिन उन दोनों के शव मिले."

शौकत और राशिद अशतांगू गांव में क़ब्रें खोदने का काम करते थे. स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना लोगों की जान बचाई.

लेकिन अब उनके परिवार की पूछ करने वाला कोई नहीं है. न तो सरकार ने और न ही किसी संगठन ने इन परिवारों को किसी तरह की मदद की है.

बचाव कर्मी

ऐसी ही एक घटना में ज़ारबारवां पहाड़ी में रहने वाले चोपान परिवार के सबसे बड़े बेटे आदिल श्रीनगर के राजबाग इलाके में बाढ़ प्रभावितों की मदद के लिए आगे आए.

हालाँकि उनकी माँ शमीमा उन्हें घर पर ही रुके रहने का दबाव डाल रही थी. बचाव कार्य के दौरान आदिल की नाव भी डूब गई और इस दौरान उसकी मौत हो गई.

'वो भी तो माँ जैसी'

शमीमा कहती हैं, “मैंने उससे पूछा था कि जब प्रशासन कुछ नहीं कर रहा तो वह क्यों अपनी ज़िंदगी ख़तरे में डाल रहा है.”

आदिल का जवाब था, “पानी में फंसी हुई महिलाएँ क्या हमारी माँ की तरह नहीं हैं.”

शमीमा कहती हैं, “आपके लिए भारतीय सेना के लिए लड़ रहा कोई सैनिक शहीद होगा, लेकिन मेरे लिए मेरा बेटा असल शहीद है जिसने दूसरों की जान बचाते हुए अपनी जान दी.”

राज्य के मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद के राजनीतिक सलाहकार वहीद उर रहमान पारा कहते हैं कि सरकार ने बाढ़ के दौरान बचाव और राहत कार्य करने वालों की पहचान कर ली है और उन्हें सम्मानित करने की भी योजना है.

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