डिजिटल इंडियाः यहां कहां मोबाइल नेटवर्क?

डिजिटल इंडिया, भारत, बीबीसी हिन्दी सिरीज़
    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित

'मेक इन इंडिया' के बाद 'डिजिटल इंडिया' नरेंद्र मोदी सरकार का अगला महत्वाकांक्षी अभियान है.

भारत के ढाई लाख गाँवों को इंटरनेट से जोड़ना, सरकारी योजनाओं को गाँव-गाँव तक पहुँचाना इसका लक्ष्य है.

इस अभियान के तहत क्या हो रहा है? मंसूबे कैसे पूरे होंगे? अचड़नें क्या हैं? एक्सपर्ट क्या कह रहे हैं?

डिजिटल इंडिया अभियान के हर पहलू की बारीक़ी से पड़ताल बीबीसी हिंदी की विशेष सिरीज़ की अगली कड़ी.

पढ़ें विस्तार से

सावित्री उसेंडी, छत्तीसगढ़, डिजिटल इंडिया
इमेज कैप्शन, सावित्री उसेंडी अपने सांसद भाई से नेटवर्क न रहने के कारण बात नहीं कर पातीं.

सावित्री उसेंडी मुस्कुराते हुए कहती हैं, “भइया से बात नहीं हो पाती है. गांव में मोबाइल का नेटवर्क ही नहीं है. भइया जब घर आते हैं, तभी बात हो पाती है.”

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कांकेर ज़िले के घोटुलबेड़ा में रहने वाली सावित्री के भइया, विक्रम उसेंडी इस इलाके से भाजपा के सांसद हैं. वे छत्तीसगढ़ सरकार में तीन बार विधायक और मंत्री भी रहे हैं.

लेकिन अंतागढ़-नारायणपुर मुख्य मार्ग पर बसे इस गांव के लोगों से बात करके लगता नहीं है कि सांसद विक्रम उसेंडी का गांव मोदी सरकार के डिजिटल इंडिया का हिस्सा है.

गांव के रिटायर्ड शिक्षक, विक्रम उसेंडी के पिता देव सिंह उसेंडी को लगता है कि दुनिया बदल रही है, लेकिन वो अपने गांव में बिजली की हालत से परेशान हैं.

देव सिंह कहते हैं, “सुबह से बिजली नहीं है. शाम हो गई. धान वाला बैठा है. अब आप बताइए, मोबाइल रहेगा तो भी चार्ज कैसे होगा?”

वो फिर हंसते हुये कहते हैं कि मोबाइल चार्ज हो भी जाए तो बात कैसे होगी?

यहां कहां नेटवर्क?

शंकर वट्टी, अंतागढ़, छत्तीसगढ़
इमेज कैप्शन, शंकर वट्टी को नेटवर्क के लिए गाँव से 4-5 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है.

अंतागढ़ के रास्ते में तारलकट्टा गांव में हमारी मुलाकात मोटरसाइकिल में घूम रहे शंकर वट्टी से हुई. शंकर गांव के एसपी हैं, एसपी यानी सरपंच पति.

जेब में एंड्राएड फ़ोन रखने वाले शंकर कहते हैं, “यहां कहां नेटवर्क? यहां से 4-5 किलोमीटर दूर अंतागढ़ जाता हूं, तब बात होती है. बाकि समय तो पाकिट में पड़ा रहता है.”

गांव के चंदन कुमार आचिले ने पिछले सप्ताह ही नया फ़ोन खरीदा है, ड्यूएल सिम कार्ड वाला. लेकिन अब तक उन्होंने सिम कार्ड नहीं लिया है. अंतागढ़ के बाज़ार में जा कर मेमरी कार्ड लिया और उसमें हिंदी और छत्तीसगढ़ी के गाने डलवा लिए हैं.

कान से इयरफ़ोन का तार निकालते हुये कहते हैं, “बस गाने सुनता हूं और टाइम पास करता हूं. मोबाइल से और क्या करूंगा.”

गाना सुनना है असली मकसद

डिजिटल इंडिया, छत्तीसगढ़
इमेज कैप्शन, गाँव के लोगों को मोबाइल की बैटरी रीचार्ज करवाने के लिए काफ़ी दूर जाना पड़ता है.

इस इलाके में तारलकट्टा, बड़े जोतपुरी, नवा गांव, आमाकड़ा, बोंदानार, बीनापाल, मुरनार, कलपरास जैसे गांव के नामों की एक लंबी सूची है, जहां लगभग हर दूसरे घर में मोबाइल फ़ोन है.

कई घरों में तीन-तीन, चार-चार लेकिन उनमें से अधिकांश का इस्तेमाल गाना सुनने के लिए ही होता है. लेकिन हर गांव में यह सुविधा भी नहीं है.

गोंड़ बीनापाल गांव को ही लें. गांव में कोई 5-6 महीने पहले बिजली का ट्रांसफार्मर खराब हुआ और पूरे गांव की बिजली चली गई. तब से गांव अंधेरे में है.

गांव के हिड़मा अपना मोबाइल 4-5 किलोमीटर दूर अंतागढ़ जा कर चार्ज करवा कर लौटे हैं. मोबाइल की बैटरी ‘फुल’ है लेकिन वे इसे बचा-बचा कर गाने सुनेंगे क्योंकि हर बार बैटरी चार्ज कराने के लिये अंतागढ़ जाना मुश्किल है.

गांव में बिजली नहीं है, मोबाइल का नेटवर्क नहीं है. ऐसे में इंटरनेट और कंप्यूटर की बात करना मुझे बेमानी लगा.

परदेश में दिक्कत

चंदन कुमार, अंतागढ़, छत्तीसगढ़
इमेज कैप्शन, चंदन कुमार मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल गाना सुनने के लिए करते हैं.

इन इलाकों से बड़ी संख्या में आदिवासी नौजवान आंध्र प्रदेश समेत दूसरे राज्यों में काम करने के लिए जाते हैं लेकिन महीनों तक उनकी कोई खोज ख़बर नहीं मिल पाती.

अधिकांश लोग पानी के लिए बोरिंग करने वाली मशीनों में सहायक के तौर पर काम करते हैं, इसलिये वे खुद भी दूर के इलाकों में भटकते रहते हैं.

उन्हें नेटवर्क मिला तो भी वे चाह कर भी अपने नेटवर्कविहीन गांव-घर में फ़ोन नहीं कर पाते.

दूसरी ओर गांव से कोई अंतागढ़ गया और परदेस गए नौजवान को उन्होंने फ़ोन किया तो पता चलता है कि उनका मोबाइल फ़ोन नेटवर्क में नहीं है.

दुख-सुख सुनने-सुनाने की उम्मीद में कई-कई दिन कोशिशें जारी रहती हैं और अधिकतर ये कोशिशें बेकार जाती हैं.

तहसील भी बेहाल

देव सिंह उसेंडी
इमेज कैप्शन, देव सिंह उसेंडी गांव में बिजली की किल्लत से परेशान हैं.

अंतागढ़ तहसील मुख्यालय से केवल 4 किलोमीटर दूर कलगांव में रास्ता जाम था. पता चला कि सड़क पर सीमेंट और छड़ से लदा ट्रैक्टर पलट गया है. दो लोगों की वहीं मौत हो गई है. तीन लोग घायल हैं.

आसपास के लोग मृतकों में से दो पंचराम ध्रुव और सुखियारी ध्रुव की पहचान करते हुए बताते हैं कि ये सरंडी गांव के रहने वाले हैं.

अंतागढ़ का एक नौजवान सरंडी गांव में अपने किसी परिचित को बार-बार फ़ोन लगाने की असफल कोशिश करता है.

फिर जैसे ही उसे याद आता है, वह कहता है, “ओह, वहां तो नेटवर्क ही नहीं रहता. किसी को भेजकर ख़बर देनी होगी.”

अंतागढ़ तहसील कार्यालय की एक महिला कर्मचारी कहती हैं, “हमारे तहसील में भी नेटवर्क आता-जाता रहता है. ज़िला मुख्यालय से अगर कोई ज़रूरी दस्तावेज़ मांगा जाए तो पता चलता है कि हमेशा की तरह इंटरनेट ठप पड़ा हुआ है. फिर कोई आदमी बस में दस्तावेज़ लेकर कांकेर जाता है.”

मुख्यमंत्री के दावे

रमन सिंह, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री
इमेज कैप्शन, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह

इन गाँवों से क़रीब 180 किलोमीटर दूर राजधानी रायपुर में बैठे मुख्यमंत्री रमन सिंह के पास अपने दावे हैं. वे उत्साह के साथ बताते हैं कि छत्तीसगढ़ गूगल हैंगआउट पर जनता से गांव-गांव की जनता से संवाद करने वाला देश का पहला राज्य है.

हालांकि रमन सिंह मानते हैं कि नेटवर्क की कनेक्टिविटी एक बड़ा मुद्दा है.

वो कहते हैं, “बेहतर कनेक्टिविटी न केवल रायपुर में बल्कि दूरस्थ अंचल के हमारे सभी ज़िला मुख्यालय में, ब्लॉक मुख्यालय में हो गई है. अब हमारा बड़ा लक्ष्य है कि ये कनेक्टिविटी हमारे 10 हज़ार पंचायतों तक जाएं.”

लेकिन कोरबा ज़िले के लेमरु इलाके में जंगली हाथियों के आने की सूचना दे रहे श्रवण देवांगन कहते हैं, “मैं 6 किलोमीटर मोटरसाइकिल में गांव से दूर आया हूं, तब जा कर नेटवर्क मिला है. यहां कहीं मोबाइल का नेटवर्क...!”

तभी फ़ोन कट जाता है और हमारी बातचीत अधूरी रह जाती है.

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