पूरा सच क्यों नहीं बताया विदेश मंत्रालय ने?

भारत इसराइल झंडे
    • Author, सिद्धार्थ वरदराजन
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

भारतीय विदेश मंत्रालय ने संयुक्त राष्ट्र में इसराइल को मतदान पर सच बताने में थोड़ी कंजूसी कर दी.

उसने कहा कि इसराइल के अंतरराष्ट्रीय कानून उल्लंघन के मामले में महत्वपूर्ण संयुक्त राष्ट्र मतदान से भारत इसलिए अनुपस्थित रहा क्योंकि इस प्रस्ताव में अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय का हवाला दिया गया था जिसका भारत सदस्य नहीं है.

लेकिन सच यह है कि नेतन्याहू के मोदी को किए फ़ोन ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

मतदान

जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) में शुक्रवार को इस असामान्य रणनीति पर एक संक्षिप्त बयान में विदेश मंत्रालय ने कहा, "फ़लस्तीनी हित को समर्थन की भारत की पुरानी नीति में कोई अंतर नहीं आया है."

"इस ख़ास प्रस्ताव में मुद्दा अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) के हवाले का था. भारत ने आईसीसी को स्थापित करने वाले रोम स्टेच्यूट पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं."

नरेंद्र मोदी

"पहले भी, जब भी मानवाधिकार परिषद प्रस्ताव में आईसीसी का सीधे हवाला दिया गया है,(जैसा कि सीरिया और उत्तरी कोरिया के प्रस्ताव के मामले में हुआ) हमारा नज़रिया अनुपस्थित रहने का रहा है. इस प्रस्ताव पर मतदान के मामले में भी हमने इसी सिद्धांत का पालन किया है."

जिस बात का ज़िक्र विदेश मंत्रालय ने अपनी सुविधा से छोड़ दिया वह यह है कि भारत ने दरअसल एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव के हक़ में मतदान किया था जिसमें लीबिया पर "अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय का हवाला था."

भारत ने ऐसा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में किया था, जो कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि सुरक्षा परिषद के पास देशों को आईसीसी के हवाले करने का अधिकारी है चाहे उन्होंने अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार किया हो या नहीं.

मोदी के लिए एम डायल करें

विदेश मंत्रालय ने इस तथ्य का भी ज़िक्र नहीं किया कि इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने यूएनएचआरसी की बैठक में जाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फ़ोन किया था.

उन्होंने आग्रह किया कि भारत ग़ज़ा और वेस्ट बैंक पर इसराइल के अवैध कब्ज़े समेत सभी मुद्दों पर फ़लीस्तीन के समर्थन के अपने पारंपरिक रुख को बदल दे.

नेतन्याहू, ओबामा

इसराइली अख़बार हारेट्ज़ ने ख़बर में लिखा, "(इसराइली) प्रधानमंत्री के कार्यालय के अधिकारियों ने बताया कि पिछले कुछ दिनों में प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने भारतीय प्रमुख, कीन्याई राष्ट्रपति और इथियोपिया के प्रधानमंत्री से बात की और उनसे अनुपस्थित रहने को कहा."

भारत के अनुपस्थित रहने पर अख़बार लिखता है, "यह भारत के नीति में उल्लेखनीय परिवर्तन दिखाता है. पारंपरिक रूप से भारत ने संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं में इसराइल-विरोधी सभी प्रस्तावों पर मतदान किया है. शुक्रवार को भारत की अनुपस्थिति 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुने जाने के बाद से भारत और इसराइल के संबंध गर्माने का एक और संकेत है."

इसराइल पिछले हफ़्ते मुश्किल में था. संयुक्त राष्ट्र जांच आयोग की रिपोर्ट में 2014 की ग़ज़ा जंग के दौरान इसराइली सेना को 1,462 फ़लिस्तीनियों की हत्या का दोषी बताया गया था.

आईसीसी और संयुक्त राष्ट्र में एक पक्षकार फ़लस्तीन ने अदालत से इसराइली सैनिकों और अधिकारियों द्वारा किए गए कथित युद्ध अपराधों की जांच करने का आग्रह किया था.

भारत का महत्व क्यों है

नेतन्याहू

इस मामले में नेतन्याहू का मोदी को फ़ोन करना ही निर्णायक रहा होगा, भारत के इस साल यूएनएचआरसी में मतदान के पैटर्न को देखने से स्पष्ट हो जाता है.

मार्च, 2015 में समाप्त हुए मानवाधिकार परिषद के 28वें सत्र में अधिकृत फ़लीस्तीन क्षेत्र में (जिसमें पूर्वी येरुशलम भी शामिल है) इसराइली आबादी और अधिकृत सीरियाई गोलान की पहाड़ी में मानवाधिकार समस्या पर और फ़लस्तीन लोगों के स्वाधिकार पर प्रस्ताव पारित किए गए थे.

इन तीनों मामलों में भारत ने प्रस्ताव के समर्थन और इसराइल के विरोध में मतदान किया. इस रिकॉर्ड के आधार पर नेतन्याहू को यकीन होना चाहिए था कि भारत तीन जुलाई को ग़ज़ा जंग पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव पर मतदान करेगा.

जहां पहले के प्रस्तावों से ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता था, इसराइल को चिंता थी कि आईसीसी जांच और उसके बाद इसराइल के युद्ध अपराधों के अभियोजन की मांग जोर पकड़ रही है.

यूरोपीय यूनियन के यह स्पष्ट कर देने के बाद कि वह इसराइल के ख़िलाफ़ मतदान करेगा सिर्फ़ अमरीका ही प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान करने जा रहा था, नेतन्याहू ने हर प्रमुख देश को अपने पक्ष में करने की पुरज़ोर कोशिश की.

उनकी रणनीति काम कर गई, लेकिन भारतीय कूटनीतिज्ञों को अपना पैंतरा बदलने के लिए एक भरोसेमंद वजह के लिए तड़पना पड़ रहा है.

इसने ऐसे समय में भारत की अंतरराष्ट्रीय साख को भी कमज़ोर किया जबकि मोदी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए नए सिरे से ज़ोर लगा रहे हैं.

विश्व एक ऐसा स्थायी सदस्य नहीं चाहता जिसके व्यवहार में अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के मुद्दों पर निरंतरता और प्रतिष्ठा हो. वह जगहें पहले ही भर ली गई हैं.

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