इंसेफेलाइटिस : 36 साल, 15000 मौतें

भारतीय बच्चा
    • Author, कुमार हर्ष
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए, गोरखपुर से
  • प्रकाशित

गोरखपुर शहर में रुस्तमपुर इलाक़े के रहने वाले आसिफ़ मंजूर साल के छह महीने बस स्टेशन पर रुमाल, टॉर्च और पर्स जैसे सामानों की फेरी लगाते हैं, मगर जून के बाद वो ये काम बंद कर देते हैं.

अपनी तक़रीबन खटारा हो चुकी पुरानी कमांडर जीप लेकर वे यहां के बीआरडी मेडिकल कॉलेज चले जाते हैं.

वहां अगले छह महीन तक वह एक ऐसा काम करते हैं, जो बकौल उनके 'सुनने में बुरा मगर सबाब (पुण्य) का है.'

आसिफ़ उन लाशों को वाजिब किराए पर उनके घरों तक पहुंचाते हैं, जो जानलेवा इनसेफ़ेलाइटिस से जान गवां चुके होते हैं. ज़्यादातर शव बच्चों के होते हैं.

आसिफ़ और उन जैसे तमाम लोगों के लिए जुलाई से दिसंबर तक का वक्त ऐसी त्रासदियों से रूबरू होने और उसमें अपनी तरफ़ से मदद करने का होता है.

ऐसा वक़्त जो मानो पिछले 32 साल से यहां खूंटा गाड़ कर बैठ गया है.

बीमारी बड़ी, इंतज़ाम कम

इंसेफ़ेलाइटिस मरीज़, गोरखपुर

जापानी इनसेफ़ेलाइटिस (जेई) या दिमागी बुखार पिछले 36 साल में 15,000 से ज्यादा मासूमों की जान ले चुका है.

गोरखपुर का बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज हर साल, गोरखपुर के नज़दीक ही नहीं बल्कि बिहार और नेपाल से आने वाले मरीजों से बुरी तरह भर जाता है.

अक्सर 208 बिस्तरों वाले इनसेफ़ेलाइटिस वॉर्ड में एक बेड पर तीन से चार बच्चों को लिटाना पड़ता है.

इस साल मौसम में जिस तरह के उतार-चढ़ाव दिख रहे हैं उसमें विशेषज्ञों को बीमारी के और अधिक ख़तरनाक़ हो जाने की आशंका है.

बीते साल 650 से ज्यादा मौतें हुई थीं और इस साल जनवरी से अब तक 47 लोग जान गंवा चुके हैं.

साल 1978 के बाद से हर साल जुलाई से लेकर दिसंबर तक मौत का तांडव रचने वाली यह बीमारी एक मादा मच्छर क्यूलेक्स ट्राइटिनीओरिंकस के काटने से होती है.

इसमें दिमाग के बाहरी आवरण यानी इन्सेफ़ेलान में सूजन हो जाती है.

एक और दुश्मन

इंसेफ़ेलाइटिस गोरखपुर

रोगी में तेज़ बुखार, झटके, कुछ भी निगलने में कठिनाई जैसे लक्षण नज़र आने लगते हैं और यदि समुचित इलाज़ न हो सके तो तीन से सात दिन में मौत हो जाती है.

साल 2006 तक तो इस रोग से हुई मौतों का ज़िम्मेदार अकेले मच्छरों को ही माना जाता था, लेकिन बाद में हुए परीक्षणों से पता चला कि सभी मामले दिमागी बुखार के नहीं थे.

कई मामलों में वहां जलजनित एंटेरो वायरस की मौजूदगी पाई गई. वैज्ञानिकों ने इसे एईएस यानि एक्यूट इनसेफ़ेलाइटिस सिंड्रोम का नाम दिया.

बीते कुछ सालों में दिमागी बुख़ार के मामलों में तो कमी आई है, लेकिन एईएस के मामले तेज़ी से बढ़े हैं और इसके लक्षण भी दिमागी बुख़ार जैसे ही होते हैं.

साल 2005 तक इस बारे में सरकारों या स्वास्थ्य संगठनों का रवैया ख़ासी लापरवाही भरा था, लेकिन उस साल मौतों का आंकड़ा एक हज़ार से भी ज़्यादा हो जाने और राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ख़बर आने के बाद सरकारों को सक्रियता दिखानी पड़ी.

पहेली बना वायरस

वायरस

साल 2006 में पहली बार टीकाकरण कार्यक्रम शुरू हुआ और 2009 में पुणे स्थित नेशनल वायरोलॉजी लैब की एक इकाई गोरखपुर में स्थापित हुई, ताकि रोग की वजहों की सही पहचान की जा सके.

टेस्ट किट उपलब्ध होने के चलते दिमागी बुख़ार की पहचान अब मुश्किल नहीं रही, लेकिन इन एंटेरो वायरस की प्रकृति और प्रभाव की पहचान करने की टेस्ट किट अभी विकसित नहीं हो सकी है.

अमरीका के अटलांटा स्थित नए बैक्टीरिया और वायरस की खोज करने वाले संगठन सीडीसी (सेंट्रल डिजीज कंट्रोल) के वैज्ञानिक भी इन वायरसों का पता लगाने के लिए 2007, 2009 और 2012 में मेडिकल कॉलेज का दौरा कर चुके हैं.

'ख़तरा कम हुआ'

डॉ. केपी कुशवाहा
इमेज कैप्शन, गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य प्रोफ़ेसर केपी कुशवाहा.

मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य प्रोफ़ेसर केपी कुशवाहा दो दशक से ज्यादा समय से बतौर बाल रोग विशेषज्ञ इस महामारी पर नज़र रखते रहे हैं.

वो इस बात पर संतोष जताते हैं कि बीते दिनों साफ़ सफाई, शौचालय और शुद्ध पेयजल को लेकर जागरूकता और सरकारी सक्रियता बढ़ने से ख़तरा कम हुआ है.

लेकिन वो कहते हैं कि गांवों में अब भी मरीजों को सही वक्त पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाती, जिससे मौतों का आंकड़ा बढ़ जाता है.

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