सिख दंगे, कश्मीर हिंसा...तस्वीरों में क़ैद दर्द

फोटो प्रदर्शनी
    • Author, प्रीति मान
    • पदनाम, फ़ोटो पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

खोज स्टूडियो ने हाल में मल्टीमीडिया कार्यों की प्रदर्शनी का आयोजन किया जिसमें देश-विदेश के कलाकारों ने "नेमलेस हियर फॉर एवेरमोर" शीर्षक से दुनिया में हो रही सामूहिक पीड़ा को तस्वीरों के माध्यम से लोगों तक पहुँचाने की कोशिश की.

चाहे 1984 के सिख दंगे हों, बस्तर के जंगलों की नक्सली हिंसा, कश्मीर हिंसा, अफ़ग़ानिस्तान की वर्तमान स्थिति या 1960 के दशक का इंडोनेशिया का कम्युनिस्ट विरोधी युद्ध, इन सभी मानवीय पीड़ाओं को छवियों, वीडियो इंस्टालेशन व कहानी के माध्यम से लोगों तक पहुँचाया गया.

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ये घटनाएँ उन छवियों की तरह है, जिनका दर्द बीते समय से मिटा पाना कठिन ही नहीं नामुमकिन है.

उस दौर की असहनीय पीड़ा को दर्शक तक पहुँचाना और कला के माध्यम से एक नई भाषा के साथ समस्याओं का समाधान करना हिंसा के प्रति विरोध दर्शाना प्रदर्शनी का उद्देश्य था.

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डिजायर मशीन कलेक्टिव, गौरी गिल, जोशुआ ओपेनहैमेर, रुपिनी विरलानी व लीओन तान, मरीन हुगोनिअर, नवजोत अल्ताफ़, सीन स्नीडर, सोनिया जब्बार, वाइल शौकी ने फ़िल्म, फोटोग्राफी व मल्टीमीडिया इंस्टालेशन के ज़रिए अपनी बात ज़ाहिर की.

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गौरी गिल दिल्ली की फोटोग्राफर हैं. गौरी की फोटोग्राफी प्रदर्शनी "जिस तन लगे सोई जाने" (जिसका अर्थ है कि जिसका दर्द है वो ही जानता है) 1984 के पंजाब दंगों में पीड़ित लोगों के दर्द को दिखाती है.

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पर ये शायद हम जैसे लोगों के लिए भी है जो उस ख़तरनाक मंजर के चश्मदीद गवाह तो नहीं है, पर उस दर्द और हादसे को बरसों से सुनते आए हैं.

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जोशुआ ओपेनहैमेर की फ़िल्म 'द एक्ट ऑफ़ किलिंग' एक अपराधी की यादों, कल्पनाओं को दर्शाती है, आपराधिक मनोवृति किस तरह बड़े आतंक को शह देती है, ये इस फ़िल्म में दर्शाया गया है.

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सोनल जैन व मृगांका मधुकेलिया ने 'नॉइज़ लाइफ़ टू' नाम से फोटोग्राफी एवं वीडियो इन्स्टालेशन के ज़रिए औपनिवेशिक अदालती कार्यवाही व राज्य द्वारा की गई एन्थ्रोपोलॉजिकल अपराधिक जाँच को दिखाने की कोशिश की, जो कुछ हद तक असम के इतिहास से जुड़ी है.

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हादसे लम्बे समय तक अपना असर छोड़ जाते हैं. उस वक़्त में जो लोग उस दर्द और पीड़ा से गुजरते हैं, ये सिर्फ वो ही जान या समझ सकते हैं.

पर इस प्रदर्शनी के माध्यम से उस तकलीफ़ और पीड़ा को दर्शक महसूस भी करता है और समझता भी है.

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इसके अलावा, 'क्राइसिस एंड द अनमेकिंग ऑफ़ सेंस' नाम से विचार गोष्ठी का भी आयोजन किया गया, जिसमें कलाकारों ने विश्वव्यापी आतंक और हिंसा पर अपने विचार रखे.

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