मोदी और लालू-नीतीश को मिल गया संदेश?

    • Author, उर्मिलेश
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को बिहार सहित चार राज्यों के उपचुनावों में इस तरह का झटका लगने का अंदेशा नहीं था.

केंद्र में सत्ता के सौ दिन की खुशी मनाने में जुटी पार्टी को मतदाताओं के मानस में ऐसे नाटकीय बदलाव की जरा भी उम्मीद नहीं थी.

लेकिन केंद्र में भारी बहुमत की सरकार चला रही भाजपा को जो झटका लगा है, क्या पार्टी उससे कुछ सीख लेगी?

दूसरी ओर विपक्ष राहत महसूस कर रहा है. बिहार में लालू प्रसाद यादव-नीतीश कुमार के गठबंधन की कामयाबी विपक्ष की राजनीति को कितना भरोसा दे रही है?

क्या उपचुनाव के नतीजों से देश की राजनीति में किसी तरह का बदलाव देखने को मिल सकता है?

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश का आकलन

हालिया उपचुनावों में वोटों की गिनती से पहले तक भाजपा के शीर्ष नेता लोकसभा चुनाव के शानदार नतीजे की पुनरावृत्ति की भविष्यवाणी कर रहे थे. लेकिन बिहार ने उनके अंदाज ही नहीं, उनके आत्मविश्वास को भी हिलाकर रख दिया.

राज्य की दस सीटों में भाजपा गठबंधन को महज चार सीटों पर संतोष करना पड़ा. लोकसभा चुनाव की शानदार कामयाबी से भरपूर आकड़ों की रोशनी में देखें तो बिहार की 10 सीटों में भाजपा को कम से कम 8 सीटों पर जीत दर्ज करनी चाहिए थी.

यानी उपचुनाव में वह न तो अपना सामाजिक समीकरण और न ही अपने शीर्ष नेता नरेंद्र मोदी का ‘सियासी-जादू’ कायम रख सकी.

यही सिलसिला कमोबेश चार राज्यों में जारी देखा गया. बिहार, कर्नाटक, पंजाब और मध्य प्रदेश की कुल 18 में से 10 सीटों पर गैर-भाजपा दलों को कामयाबी मिली, भाजपा-एनडीए को महज 8 सीटें हासिल हुईं.

मंहगाई, भ्रष्टाचार और शांति-व्यवस्था जैसे मसलों पर लोगों को भाजपा से बड़ी उम्मीद थी. वे बहुत जल्द परिणाम देखना चाहते थे. कम से कम उपचुनाव के नतीजों से तो यही लगता है कि लोग भाजपा से थोड़े निराश हैं.

उपचुनाव के नतीजों के अर्थ

उपचुनाव के नतीजे, ख़ासतौर पर बिहार के संदर्भ में यह बात आईने की तरह साफ़ है कि सेक्यूलर सोच से जुड़े दलों का साझा गठबंधन ही तेजी से बढ़ती भाजपा को रोक सकता है.

हिन्दी-पट्टी में कांग्रेस की जगह भाजपा ने ली है. इन सूबों में आजादी के बाद लंबे समय तक सामाजिक-आर्थिक रूप से सबल तबकों-समुदायों का समर्थन कांग्रेस को मिलता रहा.

शासक पार्टी के तौर पर कांग्रेस ने दलित-अल्पसंख्यकों को भी अपने साथ जोड़ा था. लेकिन नब्बे का दशक आते-आते कांग्रेस का यह सामाजिक-राजनीतिक तानाबाना छिन्न-भिन्न हो गया.

भारतीय राष्ट्र-राज्य की बिल्कुल अलग सोच के साथ जनसंघ और बाद की भाजपा ने अपने विस्तार के लिए धर्म-संप्रदाय सहित अनेक गैर-राजनीतिक हथकंडों का इस्तेमाल जारी रखा. साथ में कांग्रेस से बेहतर 'सोशल इंजीनियरिंग' भी की.

आज वह केंद्रीय सत्ता में अपने दम पर आई है और ज़्यादातर राज्यों में अपनी सरकार बनाने का सपना देख रही है. इस उपचुनाव ने सीमित दायरे में ही सही, दोनों पक्षों के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश दिया है.

'राह दिखात बिहार'

भाजपा के लिए संदेश साफ़ है कि वह सिर्फ आर्थिक उन्नयन के शानदार नारों और राष्ट्र-राज्य संबंधी हिन्दुत्ववादी विचारों की आक्रामकता के बल पर पूरे देश में स्वीकार्य नहीं हो सकती. उसे सामाजिक रूप से ज्यादा समरस और समावेशी बनना होगा.

विपक्षी दलों के लिए बड़ा संदेश है कि अतीत के गैर-कांग्रेसवाद के फार्मूले के बदले उन्हें गैर-भाजपावाद की तरफ बढ़ने की जरूरत है. बिहार में लालू प्रसाद यादव के राजद और नीतीश कुमार के जद(यू) के नए गठबंधन के राजनीतिक प्रयोग को जनता के बड़े हिस्से की मंजूरी मिली है.

इससे निश्चय ही अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए दोनों के हौसले बुलंद होंगे. सातवें-आठवें दशक का राजनीतिक मुहावरा है- 'बिहार शोज द वे.' कम से कम देश की दिग्भ्रमित विपक्षी-राजनीति के लिए यह आज भी प्रासंगिक साबित हो रहा है.

इसे सबसे पहले लालू-नीतीश जैसे परस्पर घोर विरोधी दो बिहारी-नेताओं ने आजमाया. लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के साथ ही राजद और जद(यू) के नेताओं-कार्यकर्ताओं में नए समीकरण तलाशने की कोशिश शुरू हो गई.

लोकसभा चुनाव में बिहार की 40 में से 31 सीटों पर 'मोदी-लहर' पर सवार भाजपा और उसके सहयोगियों को कामयाबी मिली. लेकिन चुनावी-आंकड़ों की व्याख्या होने लगी तो राजद-जद(यू) के नेताओं को भविष्य के लिए रास्ता दिखने लगा.

विपक्ष का रास्ता आसान नहीं

उन्हें महसूस हुआ कि लोकसभा चुनाव में ही अगर लालू-नीतीश एक झंडे के साथ आते और उनके समर्थकों में किसी तरह का वोट-विभाजन ना होता तो उन्हें कम से कम 28 सीटें मिलतीं और मोदी की अगुवाई के बावजूद भाजपा गठबंधन को महज 12 सीटें पाकर संतोष करना पड़ता.

यह सही है कि सियासत में दो और दो मिलकर हमेशा चार नहीं बनते पर उपचुनाव के नतीजे बताते हैं कि बिहार में वे जरूर 'चार' बनते.

पूरे देश का परिदृश्य देखें तो गैर-भाजपा विपक्ष के लिए रास्ता इतना आसान भी नहीं है.

बिहार के राजनीतिक प्रयोग को यूपी और बंगाल जैसे दो बड़े सूबे, जहां भाजपा बड़ी ताकत बनकर राज्य की बागड़ोर संभालने की महत्वाकांक्षा के साथ तेजी से उभर रही है, में दोहराना बेहद कठिन है. पर सियासत संभावनाओं का खेल है, यहां कुछ भी असंभव नहीं!

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