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अलीगढ़ में कॉलेज में नमाज़ पढ़ने वाले प्रोफ़ेसर पर छिड़ी बहस
- पढ़ने का समय: 4 मिनट
भारत के मशहूर शहर अलीगढ़ के एक निजी कॉलेज के प्रोफ़ेसर का कैंपस में खुली जगह पर नमाज़ पढ़ने का वीडियो सामने आने के बाद प्रशासन ने उन्हें छुट्टी पर भेज दिया है.
मीडिया में प्रकाशित ख़बरों के अनुसार, अधिकारियों का कहना है कि कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया था जिसमें प्रोफ़ेसर एसके ख़ालिद को श्री वार्ष्णेय कॉलेज के परिसर के अंदर एक पार्क में नमाज़ पढ़ते देखा जा सकता है.
जैसे ही वीडियो वायरल हुआ भारतीय जनता पार्टी और युवा मोर्चा सहित दक्षिणपंथी संगठनों ने प्रोफ़ेसर और कॉलेज के ख़िलाफ़ विरोध करना शुरू कर दिया.
सोशल मीडिया पर भी नमाज़ पढ़ने के ख़िलाफ़ बहस हो रही है और प्रोफ़ेसर को एक महीने की छुट्टी पर भेजे जाने की भी आलोचना हो रही है.
हालांकि, वीडियो को कॉलेज के अधिकारियों के संज्ञान में लाया गया है और एक जांच पैनल का गठन किया गया है.
कॉलेज के प्रिंसिपल एके गुप्ता ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि इस घटना के वक़्त वह छुट्टी पर थे. उन्होंने कहा कि "मैं उस समय छुट्टी पर था, वापस आने पर मैंने पूछताछ की है. प्रोफ़ेसर ने मुझे बताया कि वह जल्दी में थे और एक पार्क में उन्होंने नमाज़ पढ़ी थी. जांच शुरू कर दी गई है. पैनल के निर्णय के अनुसार आवश्यक कार्रवाई की जाएगी."
कार्रवाई पर छिड़ी बहस
अधिकारियों ने बताया कि रविवार को गठित पैनल इस सप्ताह अपनी रिपोर्ट पेश करेगा. गुप्ता ने कहा, कि "जांच कमिटी की मीटिंग में यह तय किया जायेगा कि माफ़ी की ज़रूरत है या नहीं."
अलीगढ़ के दक्षिणपंथी समूहों का कहना है कि कॉलेज परिसर का इस्तेमाल धार्मिक आस्थाओं के लिए नहीं किया जाना चाहिए.
जब बीबीसी ने इस बारे में दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के प्रोफ़ेसर और स्तंभकार अभय कुमार से बात की तो उन्होंने कहा कि 'एक धर्मनिरपेक्ष देश में अल्पसंख्यक समुदाय को इस तरह से निशाना बनाना एक दुखद घटना है.'
उन्होंने कहा कि "यह भारत के संविधान का उल्लंघन है क्योंकि संविधान न केवल सभी धर्मों को उपासना की स्वतंत्रता देता है, बल्कि अपने धर्म का प्रचार करने की भी अनुमति देता है."
उन्होंने कहा, कि "कुछ संप्रदायिक लोग भारत में अल्पसंख्यकों, ख़ासकर मुसलमानों के ख़िलाफ़ हर तरह के हथकंडे अपना रहे हैं और उनकी इस हरकत पर सरकार की ख़ामोशी से उन्हें प्रोत्साहन मिल रहा है. जब भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ख़ुद को एक हिंदू के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं और उनकी प्रार्थना सभा पर किसी को कोई आपत्ति नहीं है, तो दूसरों को ऐसा करने से कैसे रोका जा सकता है?"
स्वीडन में उप्साला यूनिवर्सिटी में कॉन्फ़्लिक्ट स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर अशोक सवाई ने इस घटना के बारे में अपने ट्वीट में लिखा कि "दक्षिणपंथी हिंदू कट्टरता ने सभी हदें पार कर दी हैं."
जबकि अभय कुमार का कहना था कि वह कॉलेज प्रशासन की भी उतनी ही निंदा करेंगे जितनी वह दक्षिणपंथी सांप्रदायिक लोगों की निंदा करते हैं क्योंकि प्रशासन ने सांप्रदायिक लोगों के सामने घुटने टेक दिए.
हरिनी क्लिमर नाम के एक यूज़र ने इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर को शेयर करते हुए लिखा कि ''जहां एक ख़ास समुदाय की यह मांग है कि सब सरस्वती वंदना करें, वहां अलीगढ़ के एक प्रोफ़ेसर को नमाज़ पढ़ने की वजह से छुट्टी पर भेज दिया जाता है और उनके ख़िलाफ़ जांच का आदेश दिया जाता है."
बंटी है लोगों की राय
बहुत से लोगों ने इस पर खेद और आश्चर्य व्यक्त करते हुए लिखा है कि भारत के सरकारी स्कूलों में हिंदू देवी सरस्वती की पूजा आम बात है.
श्याम तिवारी नाम के एक यूज़र ने लिखा, "एबीवीपी के नेता कपिल चौधरी ने गांधी पार्क थाने में भी शिकायत दर्ज कराई है और कहा है कि कॉलेज में नमाज़ पढ़कर इस्लामीकरण किया जा रहा है. अगर आज इनको नहीं रोका तो कल बच्चे क्लास में भी नमाज़ पढ़ेंगे."
अहमद ख़बीर नाम के एक यूज़र ने लिखा, ''कॉलेज परिसर में नमाज़ पढ़ना अपराध है लेकिन कॉलेज के मंदिर में पूजा आरती करना सबके लिए आशीर्वाद है... संविधान का अनुच्छेद 25-28 सभी नागरिकों को अपनी मर्ज़ी के धर्म को अपनाने और उसके प्रचार की स्वतंत्रता का अधिकार देता है.''
बीबीसी ने उर्दू के जाने-माने पत्रकार और बिहार के एक कॉलेज में उर्दू के शिक्षक ज़ैन शम्सी से बात की, उनका कहना है कि मुसलमानों को इसके लिए या तो क़ानूनी लड़ाई लड़नी चाहिए या फिर मुसलमानों के एक प्रतिनिधिमंडल को प्रधानमंत्री से मिलना चाहिए और उन्हें इसके बारे में बताना चाहिए.
उन्होंने कहा, "मुसलमानों के लिए स्थिति गंभीर है, ऐसे में उन्हें सावधानी बरतने की ज़रूरत है. हालाँकि वे शिक्षण संस्थानों को धर्म से दूर रखने की बात करते हैं, लेकिन वे ख़ुद ऐसा करते हैं. दो फ़ीसदी लोग ऐसा करते हैं और सरकार की चुप्पी उन्हें 98 फ़ीसदी बना देती है.
दक्षिणी भारत के कर्नाटक राज्य के शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पहनने का मुद्दा अभी भी वैसा का वैसा ही है, जबकि मुसलमानों को कभी बीफ़ के नाम पर, कभी लव जिहाद के नाम पर, तो कभी केवल मुसलमान होने के संदेह में निशाना बनाया जा रहा है.''
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