उत्तराखंड: चुनाव नतीजों से पहले राजनीतिक हलचल तेज़

कैलाश विजयवर्गीय
    • Author, राजेश डोबरियाल
    • पदनाम, देहरादून से, बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित

मतगणना से ठीक पहले उत्तराखंड की राजनीति में भारी उथल-पुथल मची हुई है.

7 मार्च को विधानसभा चुनावों के आखिरी चरण के मतदान के बाद जारी एग्जिट पोल्स के ये संकेत देने के बाद कि कांग्रेस या बीजेपी किसी को भी बहुमत मिल सकता है राजनीतिक सरगर्मियां तेज़ हो गई हैं.

जोड़-तोड़ में माहिर माने जाने वाले बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय के देहरादून में डेरा डालने के बाद विधायकों की खरीद-फ़रोख़्त को लेकर भी चर्चाएं तेज़ हैं.

हालांकि चंद घंटों में तस्वीर साफ़ हो जाने वाली है.

भितरघात

उत्तराखंड की राजनीति में 2012 और 2016 दो बहुत महत्वपूर्ण साल हैं जिनमें हुए राजनीतिक घटनाक्रम प्रदेश की राजनीति में हमेशा याद किए जाते रहेंगे.

2012 में तीसरी विधानसभा के लिए हुए चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस में टक्कर का मुकाबला था.

70 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस 32 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी और बीजेपी 31 सीटें जीतकर पीछे रह गई थी.

रमेश पोखरियाल निशंक

इसके बाद कांग्रेस ने निर्दलीयों और अन्य के सहयोग से सरकार बनाई थी जो 2016 में तगड़े झटके के बावजूद 2017 तक चली.

2012 के चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी खुद चुनाव हार गए थे. इसके लिए भितरघात को ज़िम्मेदारी ठहराया गया था.

अगर खंडूरी चुनाव जीत जाते तो बीजेपी दोबारा सरकार बनाने की स्थिति में होती. पांचवीं विधानसभा के लिए 2022 में हुए चुनाव में भी बीजेपी में भितरघात की बातें सुनाई दी हैं.

14 फरवरी को मतगणना के बाद जब राजनीतिक दल अपने प्रदर्शन का आकलन कर रहे थे तब बीजेपी के कई नेताओं ने भितरघात की बात कही.

हरिद्वार की लक्सर विधासभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार संजय गुप्ता ने तो पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक पर ही भितरघात का आरोप लगा दिया और कहा कि उन्हें हराने के लिए काम किया गया.

उत्तराखंड बीजेपी के अध्यक्ष मदन कौशिक
इमेज कैप्शन, उत्तराखंड बीजेपी के अध्यक्ष मदन कौशिक

इसके बाद हरभजन सिंह चीमा, कैलाश गहतोड़ी और कैबिनेट मंत्री बिशन सिंह चुफाल ने भी पार्टी में भितरघात को लेकर आरोप लगाए.

मतदान से पहले 'अबकी बार 60 पार', का नारा लगाने वाले बीजेपी नेता बाद में संख्या बल को लेकर किसी भी दावे से बचते रहे. लेकिन 7 मार्च को आए एग्ज़िट पोल्स ने तो नई ही तस्वीर पेश कर दी.

वरिष्ठ पत्रकार दिनेश जुयाल कहते हैं कि बीजेपी के अपने इंटर्नल सर्वे में भी पार्टी को जीत मिलती नज़र नहीं आ रही है.

एग्ज़िट पोल्स में जो तस्वीर पेश की गई है वह फ़ेस सेविंग के लिए है या पर्सेप्शन बनाने के लिए. बीजेपी पर्सेप्शन पॉलिटिक्स की माहिर है.

जुयाल कहते हैं कि हॉर्स ट्रेडिंग के माहिर कैलाश विजयवर्गीय को मैदान में उतारने और राज्य में जोड़-तोड़ के खिलाड़ी पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को सक्रिय करने की वजह यही है.

हरीश रावत

साल 2016 और तोड़-फोड़ की राजनीति

उत्तराखंड की राजनीति में जो दूसरा सबसे बड़ा घटनाक्रम है वह 2016 को कांग्रेस सरकार गिराने का घटनाक्रम है.

केदारनाथ आपदा में घोटाले के आरोपों के बाद 2014 में विजय बहुगुणा को हटाकर कांग्रेस ने हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाया था.

साल 2016 में विजय बहुगुणा ने पलटवार किया और 9 विधायकों को तोड़कर कांग्रेस सरकार गिरवा दी. हालांकि बेहद नाटकीय घटनाक्रम के बाद हरीश रावत सरकार बहाल हो गई.

साल 2016 के इस घटनाक्रम में भी कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका बताई जाती है.

कांग्रेस उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने बीबीसी हिंदी को बताया, "विजयवर्गीय 2016 में भी बैग लेकर आए थे. इस बार भी वह जहाज़ में बैग लेकर आए हैं, लेकिन कांग्रेस के लोग बिकने वाले नहीं हैं. जो बिकने वाला माल था वह पहले ही चला गया था."

अगर 2012 जैसी स्थिति आती है, तो कांग्रेस की सरकार बनाने की क्या तैयारी है?

धस्माना कहते हैं कि साल 2012 जैसी स्थिति नहीं आएगी, कांग्रेस पूर्ण बहुमत से सरकार बनाएगी और 2016 की स्थिति से निपटने के लिए पार्टी एकजुटता बनाए हुए है. किसी भी सूरत में पार्टी के सभी विधायक एकजुट रहेंगे.

लेकिन अभी बीजेपी की नज़र निर्दलीयों और अन्य छोटे दलों पर है.

वीडियो कैप्शन, उत्तराखंड : निष्पक्ष चुनाव कराना कितना चुनौतीपूर्ण ?

खरीद-फ़रोख़्त की चर्चाएं

मतगणना से दो दिन पहले निर्दलीय चुनाव लड़े दो प्रत्याशियों की मुख्यमंत्री धामी और पूर्व मुख्यमंत्री निशंक से मिलने की चर्चाएं गरम हैं, इनमें से एक ने तो इस मुलाकात की पुष्टि भी स्थानीय पत्रकारों को की है.

इसी तरह हरिद्वार से बीएसपी उम्मीदवार मोहम्मद शहज़ाद को तो यह सफ़ाई देनी पड़ी है कि अगर सरकार बनाने के लिए उनके समर्थन की ज़रूरत पड़ी तो इस बारे में फ़ैसला पार्टी सुप्रीमो मायावती करेंगी. पत्रकारों को दिए बयान में शहज़ाद ने कहा, "ऑफ़र पर मैं नहीं बिकूंगा, मैं बिकने वाली आइटम नहीं हूं."

दिनेश जुयाल कहते हैं कि इस तरह के बयान, निशंक का सक्रिय होना और कैलाश विजयवर्गीय का आना... यह सब घटनाक्रम दिखा रहा है कि उत्तराखंड में हॉर्स ट्रेडिंग की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं.

वह कहते हैं कि चार-पांच से ऐसे प्रत्याशी हैं जिनकी घेराबंदी शुरू हो चुकी है. अगर किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिलता है तो ये विधायक सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निबाह सकते हैं.

जुयाल कहते हैं कि बीजेपी किसी भी सूरत में सरकार बनाना चाहती है. चूंकि उसे यह आशंका है कि चुनाव परिणाम उसके ख़िलाफ़ जा सकते हैं इसलिए वह पहले सक्रिय हो गई है.

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