कोरोना से अपनों की मौत के बाद ख़ुद को संभालने के लिए क्या करें?

फ़िल्म 'कंटेजियन' का एक दृश्य
इमेज कैप्शन, फ़िल्म 'कंटेजियन' का एक दृश्य
    • Author, सिन्धुवासिनी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

"बदकिस्मती से वो नहीं रहीं..."

"राइट...क्या मैं जाकर उससे बात कर सकता हूँ?"

"आपकी पत्नी की मौत हो गई है."

"वॉट द हेल! क्या बकवास कर रहे हो? उसे हुआ क्या?"

"देखिए, मैं आपकी हालत समझ सकता हूँ. हमारे यहाँ ग्रीफ़ काउंसलर हैं. वो आपकी मदद करेंगे."

यह साल 2011 में आई हॉलीवुड फ़िल्म 'कंटेजियन' का एक सीन है. फ़िल्म एक अज्ञात संक्रामक बीमारी के बारे में है जो अमेरिका में अचानक फैलने लगी है.

फ़िल्म 'कंटेजियन' का एक दृश्य
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इस सीन में डॉक्टर जब एक शख़्स को उसकी पत्नी की मौत की ख़बर देते हैं तो वो सदमे और ग़ुस्से की वजह से कुछ समझ नहीं पाता और बेकाबू हो जाता है. इसके बाद डॉक्टर उसे 'ग्रीफ़ काउंसलर' के पास भेजते हैं.

ग्रीफ़ काउंसलर एक तरह के मनोवैज्ञानिक (साइकॉलजिस्ट) या पेशेवर थेरेपिस्ट होते हैं जो लोगों को थेरेपी के ज़रिए किसी गंभीर सदमे (जैसे किसी करीबी की मौत) से उबरने में मदद करते हैं.

कोरोना से मौतें

अपनों के जाने के बाद पीछे छूटे लोगों का दर्द

अब फ़िल्म से निकलकर असल दुनिया में आते हैं. पिछले दो साल से अधिक समय से पूरी दुनिया कोरोना महामारी की चपेट में है. दुनिया भर में लाखों लोगों ने कोविड-19 की वजह से अपनों को खो दिया है.

अकेले भारत में कोरोना संक्रमण के कारण तीन लाख से ज़्यादा लोगों की मौत हुई है और ये सिर्फ़ आधिकारिक आँकड़े हैं. मौतों की असली संख्या और भयावह हो सकती है.

इन लाखों लोगों की असमय मौत के बाद पीछे छूट गए हैं वो, जो इनके करीबी थे. इनके परिजन, इनके दोस्त और इनके चाहने वाले. अपनों को यूँ अचानक खोने का ग़म और बेबसी किसी को भी अंदर से खोखला कर सकती है.

ऐसे में रोते-कलपते लोगों को किसी सहारे की ज़रूरत होती है. कोई ऐसा, जो थोड़ी ही देर के लिए लेकिन उनकी हर बात सुने, उन्हें समझाए और प्रियजनों के बिना उनकी ज़िंदगी को थोड़ा कम मुश्किल बनाए.

यहीं पर 'ग्रीफ़ काउंसलर' जैसे मेंटल हेल्थ प्रोफ़ेशनल्स की भूमिका सामने आती है. लेकिन स्वास्थ्य से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं से जूझते भारत में ऐसी चर्चा भी मुश्किल लगती है.

अपनी पत्नी प्रियंका और बच्चों के साथ ललित मित्तल
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'न किसी के सामने रो सकते हैं, न किसी से कुछ कह सकते हैं'

उत्तर प्रदेश के हाथरस में रहने वाले ललित मित्तल से तक़रीबन दो महीने पहले कोरोना वायरस ने उनकी पत्नी प्रियंका को छीन लिया था. प्रियंका सिर्फ़ 36 साल की थीं.

ललित और प्रियंका के दो छोटे बच्चे हैं. प्रियंका के जाने बाद ललित और उनके दोनों बच्चे बिल्कुल अकेले पड़ गए हैं.

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "अब घर में सिर्फ़ हम तीनों हैं. मैं अपना दर्द किसी को समझा नहीं सकता लेकिन बच्चों के सामने मज़बूत बना रहता हूँ. मैं बच्चों को सँभालता हूँ और वो मुझे."

क्या ललित ने अपना दुख किसी से साझा करने की कोशिश की है?

इसके जवाब में उन्होंने कहा, "ये तकलीफ़ इतनी निजी है कि मैं खुलकर किसी से इस बारे में बात भी नहीं कर सकता. मुझे नहीं लगता कि कोई समझ भी पाएगा. मैंने अपने आप को भगवान पर छोड़ दिया है."

अपने पिता के साथ गौतम गुप्ता
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कुछ ऐसी ही कहानी जौनपुर के गौतम गुप्ता की भी है. अप्रैल में गौतम के दादा जी और पिता की मौत महज तीन दिनों के भीतर हो गई थी.

वो कहते हैं, "आप सोचिए कि ज़िंदगी में सबकुछ ठीक चल रहा हो और अचानक एक दिन आपके परिवार को दो लोग हमेशा के लिए आपको छोड़कर चले जाएं. मेरे दादाजी और पिताजी परिवार के स्तंभ थे. उनके जाने से हमारे परिवार की नींव हिल गई है."

गौतम कहते हैं, "इस समय मेरे लिए सबसे ज़रूरी है अपनी माँ को संभालना. मैं हर वक़्त यही कोशिश करता हूँ कि वो अकेली न पड़ें. मेरे अंदर बहुत दुख भरा है लेकिन मैं उनके सामने कभी रोता नहीं."

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "परिवार में सबसे बड़ा होने के नाते मेरे सामने मजबूरी यह है कि मैं किसी के सामने कमज़ोर नहीं दिख सकता. न किसी के सामने रो सकता हूँ न किसी से कुछ कह सकता हूँ."

अपने दादा जी के साथ गौतम गुप्ता
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गौतम के मन में यह पछतावा भी है कि उन्होंने अपने दादा जी और पिता को अस्पताल में भर्ती क्यों कराया. उन्हें लगता है कि अगर वो दोनों को घर पर ही आइसोलेशन में रखते तो शायद वो ठीक हो जाते.

वो बताते हैं, "मेरे मन में इसे लेकर बहुत ग्लानि है और मैं ख़ुद को कहीं न कहीं इसका दोषी ठहराता हूँ. मुझे लगता है कि अस्पताल में बदइंतज़ामी और अकेलेपन ने भी मेरे दादा जी और पिता को मार डाला."

गौतम कहते हैं कि ऐसे मुश्किल हालात में अगर कोई पेशेवर से लोगों की मदद मिलती तो शायद चीज़ें थोड़ी आसान हो जातीं.

उन्होंने कहा, "मेरे परिवार को इन मौतों से बहुत सदमा पहुँचा है. ख़ास तौर पर मेरी छोटी बहनों की हालत तो बहुत ख़राब है. ऐसे में अगर कोई काउंसलर उन्हें समझाता-बुझाता तो अच्छा ही होता."

पुनीत अरोड़ा के पिता
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हरियाणा के रेवाड़ी में रहने वाले पुनीत अरोड़ा ने भी इसी साल मई में अपने पिता को खोया है.

वो कहते हैं, "हमारे अपने तो रहे नहीं और अब हमें भी सरकार ने कीड़े-मकोड़ों की तरह छोड़ दिया है. कोई हमारा हाल पूछने वाला नहीं है."

पुनीत कहते हैं कि उनके पास तो दुखी होने और ग़मी मनाने की 'सुविधा' भी नहीं है क्योंकि पिता की दवा के ख़र्च से बहुत कर्ज़ हो गया है और अब जैसे-तैसे उसे चुकाना है.

वो कहते हैं, "सबकुछ अचानक ही हो गया. मैं अपना बिल्कुल भी ख़याल नहीं रख पा रहा हूँ. मैं बस किसी तरह काम-धंधा शुरू करके कर्ज़ा चुकाने की कोशिश कर रहा हूँ."

ललित, गौतम और पुनीत तीनों की बातें सुनकर अच्छी तरह समझा जा सकता है कि इन सभी को मदद की ज़रूरत है. किसी ऐसे की ज़रूरत, जिसके सामने ये कम से कम जी भरकर रो सकें.

यह लिस्ट मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से बातचीत के आधार पर बनाई गई है.
इमेज कैप्शन, यह लिस्ट मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से बातचीत के आधार पर बनाई गई है.

ग्रीफ़ काउंसलिंग और ग्रीफ़ साइकोथेरेपी

डॉक्टर नीतू राणा एक क्लीनिकल साइकॉलजिस्ट हैं और उन्हें 'ग्रीफ़ थेरेपी' और 'ग्रीफ़ काउंसलिंग' में विशेषज्ञता हासिल है.

वो बताती हैं कि किसी के करीबी के गुजरने के बाद उसकी मदद के लिए मेंटल हेल्थ प्रोफ़ेशनल्स दो तरह की प्रक्रिया अपनाते हैं:

1)ग्रीफ़ काउंसलिंग

2)ग्रीफ़ साइकोथेरेपी

डॉक्टर नीतू के मुताबिक़ ग्रीफ़ काउंसलिंग तब की जाती है जब किसी के करीबी के मौत के छह महीने से कम वक़्त हुआ हो और उसे मदद की ज़रूरत हो.

ग्रीफ़ काउंसलिंग में कोई ख़ास तकनीक इस्तेमाल नहीं की जाती. इसमें काउंसलर सिर्फ़ सामने वाले की बात सुनता है. इसे 'इंपैथेटिक लिसनिंग' के नाम से जाना जाता है. इसमें काउंसलर लोगों को एक 'सेफ़ स्पेस' देते हैं जहाँ वो दिल खोलकर अपनी बात कह सकें.

डॉक्टर नीतू कहती हैं कि किसी प्रिय की मौत के बाद दुखी होना नॉर्मल है, ख़ासकर छह महीने तक.

वो कहती हैं, "इस दौरान अपनों को खोने वाला शख़्स रोता है, परेशान होता है, उसे सपने आते हैं, नींद नहीं आती और भूख कम लगती है. ये सब नॉर्मल ग्रीविंग प्रोसेस का हिस्सा है."

लेकिन अगर छह महीने के बाद भी कोई व्यक्ति सामान्य होने की राह पर नहीं बढ़ पाता और लगातार 'ग्रीविंग पीरियड' में रहता है तो यह मामला क्लीनिकल बन जाता है. मनोविज्ञान की भाषा में इस अवस्था को 'कॉम्पिलकेटे ग्रीफ़' कहा जाता है और इसके लिए 'ग्रीफ़ साइकोथेरेपी' की ज़रूरत पड़ती है.

सांकेतिक तस्वीर

डॉक्टर नीतू बताती हैं, "इस प्रक्रिया में हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि ग्रीफ़ का कौन सा हिस्सा है जिसे सामने वाला प्रोसेस नहीं कर पा रहा है और यह कई बातों पर निर्भर करता है."

नीतू राणा इसे उदाहरण के ज़रिए समझाने की कोशिश करती हैं. वो कहती हैं, "मान लीजिए किसी की अचानक मौत हो गई. ऐसे में उसके करीबी मौत जैसी स्थिति के लिए मानसिक रूप से बिल्कुल तैयार नहीं होते और उन्हें गहरा सदमा लगता है."

"या फिर ऐसी स्थिति, जिसमें इंसान किसी की मौत के लिए ख़ुद को ज़िम्मेदार ठहराने लगता है. जैसे- कई बार पेशेंट्स मुझसे कहते हैं कि सुबह मेरा उनसे झगड़ा हुआ था, शायद मैंने ज़्यादा बोल दिया इसलिए ऐसा हुआ. या शायद मैंने उन्हें सॉरी नहीं बोला इसलिए ऐसा हुआ..."

डॉक्टर नीतू कहती हैं कि कोरोना महामारी के दौरान ऐसे कई मामले आए हैं जिनमें लोग अपनों की मौत के लिए ख़ुद के फ़ैसलों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. जैसे- काश मैंने अस्पताल बदल दिया होता, ऑक्सीजन का जल्दी इंतज़ाम कर लिया होता या मेरी वजह से वो भी पॉज़िटिव हो गए.

यानी जब किसी गुज़रने वाले से उसके करीबियों के कई 'अनरिज़ॉल्व्ड मुद्दे' होते हैं वहाँ ग्रीफ़ थेरेपी की ज़रूरत होती है.

डॉक्टर नीतू बताती हैं, "कई बार लोग अपनों को खोने के बात इस तरह की बातें सोचते हैं- अभी आप मुझे छोड़कर कैसे जा सकते हैं? अभी तो हमें इतनी बातें करनी थीं या साथ में इतना वक़्त बिताना था. मुझे अपने साथ लेकर क्यों नहीं गए? वगैरह-वगैरह."

ऐसी स्थिति में साइकॉलजिस्ट लोगों से बात करके उन मुद्दों को सुलझाने की कोशिश करते हैं जहाँ वो अटक गए हैं. ऐसे मामलों में साइकोथेरेपी के लिए कई तरह की तकनीक अपनाई जाती है. मसलन- एंप्टी चेयर टेकनीक और लेटर टेकनीक.

यह लिस्ट मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से बातचीत के आधार पर बनाई गई है.
इमेज कैप्शन, यह लिस्ट मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से बातचीत के आधार पर बनाई गई है.

कैसे काम करती है ग्रीफ़ साइकोथेरेपी?

एंप्टी चेयर टेकनीक में पीड़ित व्यक्ति को एक खाली कुर्सी के सामने बैठा दिया जाता है और कल्पना करने को कहा जाता है कि गुज़र चुका व्यक्ति उसके सामने है. फिर लोगों से कहा जाता कि उनके पास अपने प्रियजनों से आख़िरी बार बात करने का मौक़ा है, वो जो चाहें, कह सकते हैं.

ऐसे ही लेटर तकनीक में लोगों से गुज़र गए लोगों को आख़िरी चिट्ठी लिखने को कहा जाता है.

डॉक्टर नीतू बताती हैं, "जब एंप्टी चेयर और लेटर तकनीक बार-बार दोहराई जाती है तब धीरे-धीरे लोगों के मन की सारी बात निकल जाती है और उनकी हालत में सुधार होने लगता है."

साइकोथेरेपी में अनसुलझी भावनाओं को प्रोसेस करने के लिए एक और तकनीक अपनाई जाती है. इसके लिए लोगों से गुज़र गए लोगों की तस्वीरें, कपड़े और अन्य चीज़ें लाने को कहा जाता है. उनसे गुज़र गए शख़्स के बारे में बात करने को कहा जाता है. उनसे जुड़ी अच्छी और बुरी यादों की चर्चा की जाती है. उनकी तस्वीरों और कपड़ों को छूने, चूमने और गले लगाकर रोने का मौका दिया जाता है.

डॉक्टर नीतू के मुताबिक़ इस प्रक्रिया में पीड़ित व्यक्ति की अनसुलझी भावनाएं काफ़ी हद तक सुलझ जाती हैं, उसकी शिकायतें कम हो जाती हैं और वो सच्चाई को स्वीकार करने की मानसिक स्थिति में आ जाता है.

सांकेतिक तस्वीर

महामारी के बाद और ज़्यादा बढ़ सकती हैं परेशानियाँ

डॉक्टर नीतू के मुताबिक़ कोरोना से जुड़े मामलों में परेशानी यह है कि लोगों को अपने प्रियजनों को अंतिम बार गले लगाने का मौका भी नहीं मिल रहा है.

वो बताती हैं, "मेरे पास आने वाले लोगों के मन में यह पछतावा रहता है कि उनके अपने आख़िरी वक़्त तक अकेले रहे और अकेले ही इस दुनिया से चले गए. लोग चाहकर भी अपने करीबियों के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पा रहे हैं. ये सब लोगों को लंबे वक़्त तक परेशान कर रहा है."

डॉक्टर नीतू राणा का मानना है कि महामारी के दौर में लोग ठीक से अपनों के जाने का शोक भी नहीं मना पा रहे हैं.

वो कहती हैं, "लोग अभी सदमे में हैं. उनका असली ग्रीविंग प्रोसेस तो अभी शुरू ही नहीं हुआ है. वो अभी ख़ुद को बचाने में, बच्चों को बचाने में और परिवार के अन्य सदस्यों को बचाने में लगे हैं. बहुत से लोगों की नौकरियाँ चली गई हैं, कइयों पर इलाज की वजह से कर्ज़ हो गया है. ऐसे में वो अभी सर्वाइवल मोड में हैं और ठीक से दुखी भी नहीं हो पा रहे हैं."

डॉक्टर नीतू कहती हैं, "मुझे डर है कि जब यह महामारी ख़त्म होगी, दुनिया खुलेगी और सबकुछ सामान्य होगा तब लोगों को अपनों के न होने के अहसास अचानक से बढ़ जाएगा. तब कॉम्प्लिकेटेड ग्रीफ़ और अनरिज़ॉव्ल्ड इमोशंस और तेज़ी से उभर कर सामने आएंगे. मुझे लगता है कि तब लोगों को मानसिक तौर पर और ज़्यादा मदद की ज़ररूत पड़ेगी."

यह लिस्ट मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से बातचीत के आधार पर बनाई गई है.

सर्वाइवर्स गिल्ट: ज़िंदा बचे रहने का पछतावा

अमिता मानी बैंगलोर में बतौर थेरेपिस्ट काम करती हैं और कोरोना की दूसरी लहर के दौरान दिनों उनके पास ग्रीफ़ काउंसलिंग के लिए आने वालों की संख्या काफ़ी बढ़ी है.

वो कहती हैं, "ग्रीफ़ काउंसलिंग या ग्रीफ़ थेरेपी का चलन नया नहीं है. ये अलग बात है कि इस बारे में जागरूकता की कमी रही है."

अमिता मानी के मुताबिक़ ग्रीफ़ थेरेपी अकेले शख़्स की भी होती है और ग्रुप में भी. वो कहती हैं, "शुरुआत में हम लोगों को अकेले काउंसलिंग देते हैं और फिर धीरे-धीरे उन्हें ग्रुप थेरेपी में आने के लिए कहते हैं. ग्रुप थेरेपी एक ऐसे सपोर्ट सिस्टम की तरह काम करती है, जहाँ आप जैसा दुख झेलने वाले और आपको समझने वाले बहुत से लोग हैं."

अमिता मानी कहती हैं कि जब इंसान अपने जैसे कई लोगों को देखता है तो उसे अहसास होता है कि शायद उसका दुख दुनिया में सबसे बड़ा नहीं है.

वो बताती हैं, "ग्रुप थेरेपी में लोग एक-दूसरे का सहारा बनते हैं और एक-दूसरे की दुख से उबरने में मदद करते हैं."

अमिता कहती हैं कि महामारी के दौरान अपनों को खोने वालों में जो सबसे बड़ी परेशानी देखने को मिल रहा है, वो है- सर्वाइवर्स गिल्ट.

सर्वाइवर्स गिल्ट को आसान शब्दों में समझाएं तो यह एक ऐसी अवस्था है जब किसी वजह से बड़ी संख्या में लोग जान गँवा बैठते हैं और ज़िंदा बच गए लोगों के मन में एक तरह की ग्लानि की भावना भर जाती है.

लोग सोचने लगते हैं कि वो ज़िंदा कैसे और क्यों बच गए, उन्हें भी मर जाना जाना चाहिए था.

अमिता बताती हैं, "इन दिनों हमारे सामने सबसे बड़ा काम लोगों को सर्वाइवर्स गिल्ट से बाहर निकालना है. ये इसलिए भी ज़रूरी है कि अगर उनके मन की सभी भावनाएं खुलकर बाहर नहीं आएंगी तो इससे आगे चलकर पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) गंभीर मानसिक परेशानियाँ हो सकती हैं."

वीडियो कैप्शन, कोरोना महामारी की पाबंदियों के बीच मानसिक रोगियों के लिए हालात

ग़रीबी, बेरोज़गारी हिंसा और अब महामारी

मुंबई के प्रतिष्ठित टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ से सोशल वर्क (मेंटल हेल्थ) की पढ़ाई करने वाली प्रतिमा त्रिपाठी ने हाल ही में काउंसलिंग शुरू की है.

प्रतिमा को समाज के आर्थिक-समामजिक रूप से कमज़ोर वर्ग के लोगों के साथ काम करने का अनुभव भी है.

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "सबके लिए ग्रीफ़ (दुख) एक जैसा नहीं होता. देश के एक बड़े तबके की तो ज़िंदगी ही दुख से भरी हुई है. महामारी में हमें ऐसे लोगों का ख़ास ख़याल रखना होगा."

वो कहती हैं, "देश में लोग पहले ही ग़रीबी, बेरोज़गारी, बीमारियों, तरह-तरह की हिंसा और भेदभाव से जूझ रहे हैं. अब महामारी में अपनों की मौत उन पर पहाड़ बनकर टूटी है. ऐसी स्थिति में उन्हें न सिर्फ़ काउंसलिंग या थेरेपी बल्कि दूसरे तरह के सपोर्ट की ज़रूरत भी है. मसलन, आर्थिक और सामाजिक सहयोग."

इस पूरी प्रक्रिया में प्रतिमा एक और महत्वपूर्ण बात की ओर ध्यान दिलाती हैं.

वो कहती हैं, "कोरोना महामारी जैसी भयावह स्थिति में लोगों की परेशानियाँ अकेले सायकाइट्रिस्ट या साइकॉलजिस्ट नहीं संभाल सकते. उन्हें सायकाइट्रिक सोशल वर्कर्स की ज़रूरत है और इसके लिए सामुदायिक स्तर पर काम होना चाहिए."

प्रतिमा कहती हैं कि सायकाइट्रिक सोशल वर्कर्स जिस तरह देश के सुदूर हिस्सों में जाकर अलग-अलग वर्ग के लोगों की मदद कर सकते हैं, मौजूदा हालात में वो साइकॉलजिस्ट और थेरेपिस्ट के लिए मुमकिन नहीं है.

प्रतिमा देश में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता की कमी, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और लोगों की आर्थिक-सामाजिक मजबूरियों की याद भी दिलाती हैं.

वो कहती हैं, "दुख की बात यह है कि हमारे देश में सबके पास दुख मनाने की 'लग्ज़री' भी नहीं है."

प्रतिमा की बातें सुनकर हिंदी के मशहूर लेखक यशपाल की कहानी 'दुख का अधिकार' की याद आती है, जिसमें लेखक कहता है कि 'शोक करने, ग़म मनाने के लिए भी सहूलियत चाहिए और- दुःखी होने का भी एक अधिकार होता है.'

मेंटल हेल्थ हेल्पलाइन

अपनों को खोने वाले की मदद कैसे करें?

इन सबके बीच यह ज़रूरी है जिन लोगों ने अपनों को खोया है, उन्हें अकेला न छोड़ा जाए. डॉक्टर नीतू राणा और अमिता मानी ने लोगों की मदद के लिए कुछ सुझाव दिए, जो इस तरह हैं:

1) लोगों को उनका स्पेस दीजिए. अगर वो शांत हैं और बात नहीं करना चाहते तो बार-बार उन्हें तंग न करें लेकिन उन्हें ये भी जता दें कि जब वो बात करने की स्थिति में होंगे, आप हमेशा उनके लिए उपलब्ध हैं.

2) लोगों को रोने से मत करिए. उन्हें गुज़र गए लोगों की यादों में रहने का वक़्त दीजिए. उनसे 'मज़बूत बनने'और 'ज़िंदगी में आगे बढ़ने' की सलाह मत दीजिए क्योंकि वक़्त के साथ वो अपने आप मूव ऑन करेंगे.

3) उन्हें यह अहसास दिलाइए कि उनका दुख, उनकी भावनाएं और उनकी तकलीफ़ पूरी तरह वाज़िब है और आप हर स्थिति में उनके साथ खड़े हैं.

4) ज़रूरी नहीं है कि आप उनसे कुछ बोलें, बात करें या समझाएं ही. आप चुपचाप उनके पास बैठ सकते हैं, उनके सिर पर हाथ फेर सकते हैं और उन्हें गले लगा सकते हैं. इससे भी उन्हें भावनात्मक संबल मिलेगा.

नोट: कुछ ऐसे भी सायकॉलजिस्ट और सायकाइट्रिस्ट हैं जो ज़रूरतमंदों को बहुत कम फ़ीस या मुफ़्त में सेवाएं देते हैं. ऐसे डॉक्टरों की लिस्ट देखने के लिए यहां क्लिक करें.

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