You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
गुजरात के उस डॉक्टर की कहानी जो महिला से पुरुष बन गए
"इस समाज में आप किसी से प्यार और सहानुभूति के दो शब्द मांगिए तो आपको नफ़रत मिलती है. इसलिए मैंने महिला से पुरुष बनने का फ़ैसला लिया. मैं पुरुष तो बन गया हूं लेकिन अब मुझे कोई स्वीकार नहीं कर रहा है."
यह कहना है भावेश भाई (बदला हुआ नाम) का. एक सरकारी अस्पताल के डॉक्टर भावेश भाई महिला से पुरुष बनने के बाद सामाजिक लड़ाई लड़ रहे हैं.
उनके मुताबिक़, लोग अब उन्हें पुरुष के बदले ट्रांसजेंडर के तौर पर स्वीकार कर रहे हैं. ऐसे में पुरुष के तौर पर मान्यता हासिल करने के लिए भावेश भाई ने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है.
उन्होंने बीबीसी गुजराती से कहा, "कोरोना महामारी के बाद हालात में सुधार दिख रहा है. अब मैं सरकारी नौकरी छोड़कर पढ़ाई करने के लिए विदेश जाऊंगा."
बचपन में मालूम नहीं था
भावेश भाई का जन्म गुजरात के खेड़ा ज़िले के एक छोटे से गांव में हुआ था. तीन भाइयों के संयुक्त परिवार में कुल नौ बच्चे थे, पांच बेटे और चार बेटियां. बचपन में भावेश भाई को लड़कों से दोस्ती पसंद थी, लेकिन उन्हें ये मालूम नहीं था कि उनका शरीर तो लड़की का है लेकिन मानसिक तौर पर लड़कों वाला व्यवहार कर रहे हैं.
भावेश भाई बताते हैं, "छोटे से गांव के स्कूल में पढ़ता था. दसवीं कक्षा तक तो मुझे मालूम ही नहीं था कि मैं लड़की हूं या लड़का हूं. मेरे बाल बेहद लंबे थे. लेकिन मुझे जेंडर को लेकर समझ नहीं थी. हालांकि समय के साथ इसमें बदलाव आया."
उन्होंने बताया, "लड़कियों को पसंद ज़रूर करता था लेकिन मुझे उनके साथ घूमने फिरने या फ़ैशन के बारे में बात करने की दिलचस्पी नहीं होती थी. मेरा व्यवहार लड़कियों वाला नहीं था. इसलिए लोग मुझसे नाराज़ रहने लगे थे. मेरे कज़िन और चाची मुझे कहने लगीं थीं कि लड़कियों के तरह व्यवहार करना सीखो. लेकिन मेरे दिमाग़ में उलझन थी कि कुछ सही नहीं है."
वो बताते हैं, "मुझे तब पता नहीं चला कि क्या चल रहा है. लोग मुझसे नाराज़ रहते थे, मुझसे दूरी बरतने लगे. मैं भी सबकुछ छोड़कर पढ़ाई में जुट गया और पहली रैंक से पास हुआ. फिर मैंने परिवार की इच्छा के मुताबिक़ मेडिकल कॉलेज में दाख़िला लिया."
नामांकन के बाद की मुश्किलें
मेडिकल कॉलेज में नामांकन के बाद भावेश भाई के लिए असली मुश्किलें शुरू हुईं.
उन्होंने बताया, "वहां मेरी मुश्किलें शुरू हुईं. मेरे सभी दस्तावेज़ में मेरा जेंडर फ़ीमेल लिखा हुआ था. सरकारी कॉलेज के प्रावधानों के मुताबिक़, मुझे गर्ल्स हॉस्टल में रहना था. चूंकि मैं अब मेडिसिन की पढ़ाई कर रहा था, तो मुझे पता चल गया था कि मेरे अंदर किस तरह का बदलाव हो रहा है."
वो बताते हैं, "हॉस्टल में मुझे काफी अकेलापन महसूस होता था. मैंने हार्मोन ट्रीटमेंट लेना शुरू कर दिया. मेरे शरीर में धीरे धीरे बदलाव आने लगे. मेरा हॉस्टल में रहना मुश्किल होता जा रहा था. धीरे धीरे मेरी दाढ़ी और मूंछें भी आ गयी थीं. मैंने लड़कों के हॉस्टल में रहने के लिए विद्रोह कर दिया. इसके बाद लड़कियां मुझसे दूर रहने लगीं जबकि लड़के मुझे स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए."
इसी दौरान भावेश भाई ने दिल्ली के सामाजिक संस्था से संपर्क किया और उसके बाद उन्हें लड़कों के हॉस्टल में रहने की अनुमति मिली.
उन्होंने बताया, "मिडिल क्लास परिवार से होने के कारण मेरी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी. लेकिन मैं ये महसूस करने लगा था कि मेरा शरीर तो लड़की का है लेकिन मेरी आत्मा पुरुष जैसी है, मुझे पुरुष के शरीर में होना चाहिए. कॉलेज में पढ़ने वाली एक लड़की मुझे समझने लगी थी. उसने मुझसे कहा कि लड़कियों जैसे कपड़े पहनती हो तो भी कोई बात नहीं है. उसने मेरी काफी मदद की."
शादी को लेकर चिंता
भावेश भाई ने बताया, "एक दिन मैं अपने पिता के साथ मनोचिकित्सक के पास गया. पिता मुझसे काफी प्यार करते हैं लेकिन उन्हें समाज का डर था. वे शादी के मामले को लेकर उलझन में थे. उन्हें लग रहा था कि पुरुष बनने पर मेरे साथ शादी कौन करेगा? बुढ़ापे में कौन मेरा साथ देगा?"
"मैं उनसे यही कह रहा था कि क्या गारंटी है कि मेरे पति की मौत मुझसे पहले नहीं हो जाएगी? बुढ़ापे में बच्चे देखभाल करेंगे, इसकी क्या गारंटी है? मेरे पिता इन तर्कों से सहमत हो गए."
भावेश भाई ने बताया, "मेरे पिता ने तब कहा कि बेटा हमारा गर्व बढ़ाओ. यह मेरे लिए काफी था. मैंने सर्जरी करा ली. मैं लड़की से लड़का बन गया. जब मेरी सर्जरी हुई तो नर्स ने मेरे चेहरे पर कोई भाव नहीं देखा."
"नर्स ने मुझसे पूछा कि लोग तो काफी उत्साहित हो जाते हैं. लेकिन आप शांत बने हुए हैं. तब मैंने कहा कि मुझे वास्तविक शरीर मिल गया है. अब मैं शांति महसूस कर रहा हूं. जो मैं चाहता था वह मिल गया. मैंने किसी के लिए ये सर्जरी नहीं कराई, मैंने यह इसलिए कराया क्योंकि मैं ख़ुद से प्यार करता था."
न्याय पाने के लिए हाईकोर्ट की शरण
सर्जरी के बाद भावेश भाई की दूसरी लड़ाई शुरू हुई. वह आगे की पढ़ाई के लिए विदेश जाना चाहते हैं. इसके लिए उन्हें जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल-कॉलेज की डिग्रियों के प्रमाण पत्र और पासपोर्ट में बदलाव कराना होगा. उन्हें अपना जेंडर फ़ीमेल से मेल कराना होगा.
लेकिन सरकारी दफ़्तरों में कोई कुछ भी बदलने को तैयार नहीं था. बहुत कोशिशों के बाद भावेश भाई को ट्रांसजेंडर का प्रमाण पत्र मिला.
इसके बाद उन्होंने गुजरात हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया.
भावेश भाई के वकील अमित चौधरी ने बीबीसी गुजराती को बताया, "हमलोगों ने संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 की धारा 14,15 और 2012 के मुताबिक़ हाईकोर्ट में आवेदन दिया."
भावेश भाई को बचपन से ही जेंडर डायस्फोरिया था, ऐसे मामले में सरकारी अस्पताल का प्रमाण पत्र सबसे ज़रूरी होता है.
आवेदन में यह भी कहा गया कि भावेश भाई पर कोई आपराधिक मामला नहीं है, वे विदेश जाकर अपनी पढ़ाई करना चाहते हैं, ऐसे में उनके पासपोर्ट और स्कूल-कॉलेज के प्रमाण पत्रों में जेंडर को फ़ीमेल से बदलकर मेल करने की अनुमति दी जाए.
इसके बाद जस्टिस एजे देसाई ने बदलाव के लिए आदेश दे दिए.
भावनगर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर महिपत सिंह चावड़ा ने कहा, "जब हमें भावेश के जेंडर डायस्फोरिया का पता चला तो हमने उसे लड़कों के हॉस्टल में दाख़िला दे दिया. अब हम हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक़ बदलाव कर रहे हैं."
लंबी लड़ाई के बाद जीत हासिल करने के बाद भावेश भाई ने बीबीसी गुजराती से कहा, "एक समय था जब मैं आत्महत्या करने की सोचने लगा था लेकिन फिर मैंने संघर्ष करने का फ़ैसला लिया. हाईकोर्ट जाने से पहले मैंने विदेश में पढ़ाई करने के लिए स्कॉलरशिप हासिल की. अदालत के आदेश के बाद मैं सीधे विदेश जा सकता था. लेकिन मैं सरकारी अस्पताल की ड्यूटी पर हूं और मरीज़ों की सेवा कर रहा हूं. कोरोना के ख़त्म होने के बाद मैं अपनी पढ़ाई करने के लिए विदेश जाऊंगा."
अब भावेश भाई खुद को पूरी तरह से मुक्त महसूस कर रहे हैं, उन्होंने कहा, "अब मैं सामाजिक बंधनों से मुक्त महसूस कर रहा हूं."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)