बिहार चुनाव: 1951 से लेकर 2015 तक कैसे रहे नतीजे

बिहार चुनाव
    • Author, कमलेश मठेनी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे मंगलवार को आ रहे हैं जिसके बाद ही पता चलेगा कि बिहार में सत्ता की बागडोर किसके हाथ में जाएगी. इन नतीजों से पहले चलिए हम जानते हैं कि बिहार में पिछले चुनावों का इतिहास क्या रहा है. बिहार की जनता ने कब, कौन-सी पार्टी को राज्य की ज़िम्मेदारी सौंपी है.

1951 से बिहार में विधानसभा चुनाव की शुरुआत हुई थी. इसके बाद से 2020 तक बिहार में 17 बार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. साल 2005 की फ़रवरी में हुए चुनाव में सरकार नहीं बन पाने के कारण अक्टूबर में फिर से चुनाव आयोजित करने पड़े थे.

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लालू प्रसाद यादव के साथ नीतीश कुमार

2015 विधानसभा चुनाव

पहले बात करते हैं अक्टूबर-नवंबर 2015 में हुए पिछले विधानसभा चुनावों की. ये चुनाव पांच चरणों में पूरा हुआ था.

इन चुनावों में सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड (जदयू), राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस, जनता दल, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, इंडियन नेशनल लोक दल और समाजवादी जनता पार्टी (राष्ट्रीय) ने महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा था.

वहीं, भारतीय जनता पार्टी ने लोक जनशक्ति पार्टी, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के साथ चुनावी मैदान में क़दम रखा था.

2015 का चुनाव कुल 243 सीटों पर हुआ था जिसमें जीतने के लिए 122 सीटों की ज़रूरत थी.

इन चुनावों में लालू यादव की राजद और नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जेडी(यू) ने 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा था. कांग्रेस ने 41 और भाजपा ने 157 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे.

चुनाव के नतीजे आने पर राजद 80 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. इसके बाद जदयू को 71 सीटें और भाजपा को 53 सीटें मिली थीं. इन चुनावों में कांग्रेस को 27 सीटें मिली थीं.

इन चुनाव में महागठबंधन की सरकार बनी और नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया गया. हालांकि, 2017 में जेडी(यू) महागठबंधन से अलग हो गई और नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई.

वीडियो कैप्शन, बिहार चुनाव और नीतीश कुमार के बारे में क्या बोले तेजस्वी?
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2010 विधानसभा चुनाव

साल 2010 में हुआ विधानसभा चुनाव को छह चरणों में बांटा गया था. 243 सीटों पर हुए इन चुनावों में नीतीश कुमार की जदयू सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी.

इन चुनावों में एनडीए गठबंधन में जदयू और भाजपा ने मिलकर चुनाव लड़ा था और उनके सामने राजद और लोक जनशक्ति पार्टी का गठबंधन था.

इन चुनावों में जनता दल यूनाइटेड ने 141 में से 115 सीटें और बीजेपी ने 102 में से 91 सीटें जीती थीं.

वहीं, राजद ने 168 सीटों पर चुनाव लड़कर 22 सीटें जीती थीं. लोजपा 75 सीटों में से तीन सीटें लेकर आई थीं. कांग्रेस ने पूरी 243 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन उसे सिर्फ़ चार सीटें ही मिली थीं. इसके बाद से कांग्रेस ने महागठबंधन में ही चुनाव लड़ा है.

इन चुनाव में बिहार की बड़ी पार्टी माने जाने वाली राजद का प्रदर्शन बहुत खराब रहा था जो फरवरी 2005 के चुनावों की 75 सीटों के मुक़ाबले सिमटकर 22 सीटों पर आ गई थी. 2010 में एनडीए की सरकार बनी और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बनाए गए.

वीडियो कैप्शन, नीतीश कुमार ने बिहार चुनाव को बताया अपना आखिरी चुनाव
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2005 में हुए दो बार चुनाव

साल 2005 में ऐसा पहली बार हुआ था जब बिहार में एक ही साल के अंदर दो बार विधानसभा चुनाव कराने पड़े.

साल 2003 में जनता दल के शरद यादव गुट, लोक शक्ति पार्टी और जॉर्ज फर्नांडिस और नीतीश कुमार की समता पार्टी ने मिलकर जनता दल (यूनाइटेड) का गठन किया था.

तब लालू यादव के करीबी रहे नीतीश कुमार ने उन्हें विधानसभा चुनावों में बड़ी चुनौती दी.

फरवरी 2005 में हुए इन चुनावों में राबड़ी देवी के नेतृत्व में राजद ने 215 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसमें से उसे 75 सीटें मिल पाईं.

वहीं, जदयू ने 138 सीटों पर चुनाव लड़ 55 सीटें जीतीं और भाजपा 103 में से 37 सीटें लेकर आई. कभी बिहार में एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस इन चुनावों में 84 में से 10 सीटें ही जीत पाई थी.

इन चुनावों में 122 सीटों का स्पष्ट बहुमत ना मिल पाने के कारण कोई भी सरकार नहीं बन पाई और कुछ महीनों के राष्ट्रपति शासन के बाद अक्टूबर-नवंबर में फिर से विधानसभा चुनाव हुए.

दूसरे विधानसभा चुनावों में जदयू 88 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. जदयू ने 139 सीटों पर चुनाव लड़ा था. भाजपा ने 102 में से 55 सीटें हासिल की थीं.

वहीं, राजद ने 175 सीटों पर चुनाव लड़कर 54 सीटें जीतीं, लोजपा को 203 में से 10 सीटें मिलीं और कांग्रेस 51 में से नौ सीटें ही जीत पाई. साल 2000 में ही लोजपा का गठन हुआ था.

इन चुनावों में नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी.

नीतीश कुमार
इमेज कैप्शन, नीतीश कुमार
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साल 2000 में एकीकृत बिहार में चुनाव

इन चुनावों से पहले बिहार में काफ़ी उथल-पुथल हुई थी. लालू यादव ने राबड़ी देवी को अपनी जगह बिहार का मुख्यमंत्री बनाया था और 1997 में लगभग तीन हफ़्तों का राष्ट्रपति शासन भी लगा था.

इसके बाद मार्च 2000 में विधानसभा चुनाव हुए.

ये वो समय जब बिहार से अलग करके झारखंड राज्य नहीं बनाया गया था. साल 2000 के नवंबर में झारखंड का गठन हुआ था.

तब बिहार में 324 सीटें हुआ करती थीं और जीतने के लिए 162 सीटों की ज़रूरत होती थी.

इन चुनावों में राजद ने 293 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे 124 सीटें मिली थीं.

वहीं, भाजपा को 168 में से 67 सीटें हासिल हुई थीं. इसके अलावा समता पार्टी को 120 में से 34 और कांग्रेस को 324 में से 23 सीटें हासिल हुई थीं.

2000 के चुनाव में राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनी थीं.

राबड़ी देवी
इमेज कैप्शन, राबड़ी देवी
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1995 का विधानसभा चुनाव

ये वो चुनाव थे जब ना तो बिहार में आरजेडी थी और ना जेडीयू. हालांकि, 1994 में नीतीश कुमार ज़रूर समता पार्टी बनाकर लालू यादव से अलग हो गए थे.

तब लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में जनता दल ने 264 सीटों पर बिहार चुनाव लड़ा और वो 167 सीटें जीतने में सफल हुई.

भाजपा ने 315 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए लेकिन सिर्फ़ 41 सीटें ही जीत पाई. कांग्रेस 320 सीटों पर चुनाव लड़कर 29 सीटें ही जीत पाई.

उस समय भी बिहार में 324 सीटों के लिए चुनाव लड़ा गया था. तब झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) भी बिहार से ही चुनाव लड़ती थी.

जेएमएम ने चुनावों में 63 में से 10 सीटें जीती थीं और समता पार्टी को 310 में से सात सीटें मिली थीं.

इन चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी के साथ लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने.

लेकिन, साल 1997 में चारा घोटाले में फंसने के कारण लालू यादव को बिहार के मुख्यमंत्री के पद से हटना पड़ा और उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाया.

उनके इस फैसले की काफ़ी आलोचना हुई और पार्टी में फूट भी पड़ गई. 1997 में ही राष्ट्रीय जनता दल का भी गठन हुआ.

राबड़ी देवी
इमेज कैप्शन, राबड़ी देवी
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1990 विधानसभा चुनाव

इन चुनावों में 1988 में कई दलों के विलय से बने जनता दल ने पहली बार बिहार चुनाव लड़ा था.

जनता पार्टी 276 सीटों पर चुनाव लड़कर 122 सीटें जीतें और सबसे बड़ी पार्टी बनकर खड़ी हुई. हालांकि, बहुमत का आँकड़ा 162 सीटें था.

वही, कांग्रेस को 323 सीटों में से 71 सीटें और भाजपा को 237 सीटों में से 39 सीटों हासिल हुईं.

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया ने 109 सीटों पर चुनाव लड़कर 23 सीटें जीती थीं. जेएमएम 82 में से 19 सीटें जीत पाई थी.

तब बिहार में लालू यादव के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी थी. इन चुनावों के बाद ही बिहार में एक ही कार्यकाल में कई मुख्यमंत्री बनने का दौर ख़त्म हुआ.

लालू प्रसाद यादव
इमेज कैप्शन, लालू प्रसाद यादव
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1985 विधानसभा चुनाव

इन चुनावों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. उसे 323 में से 196 सीटें मिली थीं जो बहुमत से कहीं ज़्यादा थीं.

इन्हीं चुनावों के बाद बिहार में एक ही कार्यकाल में चार मुख्यमंत्री बने थे.

इन चुनावों में लोक दल को 261 में से 46 और भाजपा को 234 में से 16 सीटें मिली थीं.

उस समय जनता पार्टी भी चुनावी मैदान में थी जो बाद में जनता दल में शामिल हो गई. जनता पार्टी को 229 में से 13 सीटें मिली थीं.

इन चुनावों में 1985 से 1988 तक बिंदेश्वरी दुबे बिहार के मुख्यमंत्री रहे. उनके बाद लगभग एक साल भागवत झा आज़ाद, फिर कुछ महीनों के लिए सत्येंद्र नारायण सिन्हा और जगन्नाथ मिश्र बिहार के मुख्यमंत्री बने थे.

सत्येंद्र नारायण सिन्हा
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1980 का विधानसभा चुनाव

इन चुनावों में कांग्रेस (इंदिरा) को 311 में से 169 सीटें मिली थीं और कांग्रेस (यू) को 185 में से 14 सीटें मिली थीं.

तब भाजपा ने 246 में से 21 सीटें जीती थीं और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया ने 135 में से 23 सीटें हासिल की थीं.

जनता पार्टी (एससी) को तब 254 में से 42 सीटें मिली थीं.

इस कार्यकाल में भी लगभग चार महीने राष्ट्रपति शासन लागू रहा है. उसके बाद करीब तीन साल के लिए जगन्नाथ मिश्र और एक साल के लिए चंद्रशेखर सिंह बिहार के मुख्यमंत्री बने थे.

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रामसुंदर दास
इमेज कैप्शन, रामसुंदर दास

1977 विधानसभा चुनाव

इन चुनावों में जनता पार्टी ने बिहार की 311 सीटों पर चुनाव लड़ा और 214 सीटों पर जीत हासिल की.

कांग्रेस को इन चुनावों में 286 में से 57 सीटें ही मिली थीं. वहीं, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया ने 73 में से 21 सीटें हासिल की थीं.

बिहार में जनता पार्टी की सरकार बनी. पहले लगभग दो महीने राष्ट्रपति शासन लागू रहा.

उसके बाद लगभग एक साल के लिए 1979 तक कर्पूरी ठाकुर और फिर 1980 तक रामसुंदर दास बिहार के मुख्यमंत्री बने.

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जगन्नाथ मिश्रा
इमेज कैप्शन, जगन्नाथ मिश्रा तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे. तीनों बार जब भी वे मुख्यमंत्री बने, उस समय कांग्रेस पार्टी कड़ी चुनौतियों का सामना कर रही थी

1972 विधानसभा चुनाव

इन चुनावों में कांग्रेस की जीत हुई थी और उसे 259 में से 167 सीटें मिली थीं. वहीं, कांग्रेस (ओ) 272 में से 30 सीटें ही मिल पाई थीं.

इसके अलावा भारतीय जन संघ को 270 में से 25 सीटें हासिल हुई थीं. तब संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) को 256 सीटों पर चुनाव लड़कर 33 सीटें मिली थीं.

इस कार्यकाल में भी लगभग दो महीने राष्ट्रपति शासन लगा रहा और उसके बाद एक या दो साल के लिए केदार पांडे, अब्दुल गफ़ूर और जगन्नाथ मिश्र बिहार के मुख्यमंत्री रहे.

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भोला पासवान शास्त्री
इमेज कैप्शन, भोला पासवान शास्त्री को आग देने वाले उनके भतीजे विरंची पासवान अब बूढ़े हो चुके हैं

1969 विधानसभा चुनाव

इस चुनाव में भी इंडियन नेशनल कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. हालांकि, उसे पूर्ण बहुमत नहीं मिला था.

उस समय बिहार में 318 सीटों के लिए विधानसभा चुनाव हुआ था और जीत के लिए 160 सीटों की ज़रूरत थी.

कांग्रेस को 318 में से 118 सीटें मिलीं और भारतीय जनसंघ को 303 में से 34 सीटें हासिल हुईं.

इस चुनाव में एसएसपी को 191 में से 52 और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया को 162 में से 25 सीटें मिली हैं.

इस कार्यकाल में भी राष्ट्रपति शासन के बाद दारोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर और भोला पासवान शास्त्री कुछ-कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री बने.

कर्पूरी ठाकुर
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1967 विधानसभा चुनाव

कांग्रेस को 318 में से 128, एसएसपी को 199 में से 68 और जन क्रांति दल को 60 में से 13 सीटें मिली थीं.

इन तीनों से थोड़े-थोड़े समय तक कुल चार मुख्यमंत्री रहे थे.

इन चुनावों में भारतीय जनसंघ ने 271 में से 26 सीटें हासिल की थीं.

भारतीय जनसंघ
इमेज कैप्शन, 2008 की इस तस्वीर में भारतीय जनसंघ से जुड़ी पुस्तक का विमोचन करते बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह और वैंकैया नायडू
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1951, 1957 और 1962 के चुनाव

आज़ादी के बाद पहली बार हुए 1951 के चुनाव में कई पार्टियों ने भाग लिया लेकिन कांग्रेस ही उस समय सबसे बड़ी पार्टी थी.

इन चुनाव में कांग्रेस को 322 में से 239 सीटें मिली थीं.

1957 के चुनाव में भी कांग्रेस ही सबसे बड़ी पार्टी बनी. उसे 312 में से 210 सीटें मिली थीं.

1962 के चुनाव में कांग्रेस को 318 में से 185 सीटों के साथ बहुमत हासिल हुआ था. उसके बाद स्वतंत्र पार्टी को सबसे ज़्यादा 259 में से 50 सीटें मिली थीं.

श्री कृष्ण सिन्हा बिहार के पहले मुख्यमंत्री बने थे.

श्री कृष्ण सिन्हा
इमेज कैप्शन, साल 2016 में भारत सरकार ने बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिन्हा की याद में एक डाक टिकट रिलीज़ किया था

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