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राजस्थान में दलित गंगाराम ने ख़ुदकुशी की या ज़िंदा जलाए गए: ग्राउंड रिपोर्ट
राजस्थान के भीलवाड़ा ज़िले में एक दलित व्यक्ति को कथित रूप से ज़िन्दा जला दिया गया है. दलित संगठनों की मांग है कि घटना की जाँच कर तुरंत न्याय मिले.
पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है, लेकिन पांच दिन बाद भी गुत्थी अब तक नहीं सुलझ पाई है.
पुलिस का कहना है कि अभी वो संदिग्ध लोगों से पूछताछ कर रही है.
मामला भीलवाड़ा के बिजोलिया थाना क्षेत्र का है जहां 60 साल के गंगाराम सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के एक नेता की पत्थर खनन कंपनी में बागवानी का काम करते थे.
क्या था मामला?
बिजोलिया, मोगरवासा खनन क्षेत्र में शुक्रवार की सुबह जिसने भी वो मंजर देखा, वो सिहर गया. खनन कंपनी के दफ़्तर के सामने एक निर्जन स्थान पर गंगाराम का शव धू-धू कर जल रहा था.
जब पुलिस मौके पर पहुंची तो गंगाराम का शरीर टायरों के ढेर के बीच था और उसमें आग लगी हुई थी. उसका शरीर तारों की रस्सी की मदद से टायरों के साथ बांधा गया था.
बिजोलिया के थानाधिकारी बलदेव राम ने बीबीसी को बताया कि सभी कोणों से घटना की जाँच की जा रही है. पुलिस कहती है उस इलाक़े में कुछ संदिग्ध लोगों को रोक कर पूछताछ भी की जा रही है.
चिट्ठी के कारण सस्पेंस बढ़ा
गंगाराम का पुश्तैनी गांव खनन कंपनी से करीब एक सौ किलोमीटर दूर उम्मेदनगर में है, लेकिन उन्होंने अपनी ज़िंदगी का ज्यादातर वक़्त इसी पत्थर खदान वाले इलाके में गुज़ारा है. वो कंपनी में काम करते थे और बीच-बीच में अपने परिवार से मिलने अपने गांव जाते थे.
गंगाराम के शव के पास से मिली एक चिठ्ठी ने इस गुत्थी को और भी पेचीदा कर दिया है.
इस चिठ्ठी को शुरू में सुसाइड नोट के रूप में लिया गया था मगर गंगाराम के परिजन कहते है गंगाराम अनपढ़ थे.
गंगाराम के भतीजे मदन ने बीबीसी से कहा, "वो तो पढ़े लिखे नहीं थे. और फिर चिठ्ठी में बेटी की शादी को लेकर परेशानी का ज़िक्र है लेकिन गंगाराम ने तो शादी भी नहीं की थी."
इस चिट्ठी के बारे में थानाधिकारी बलदेव राम कहते हैं, "चिठ्ठी की हक़ीक़त की भी जाँच की जा रही है."
गंगाराम के बारे में मदन बताते हैं, "वो बहुत मिलनसार थे. कभी किसी से कोई शिकायत नहीं की, रंजिश भी नहीं है. फिर ऐसा क्या क्या गुनाह किया उन्होंने कि उन्हें इस बेदर्दी से जला कर मार दिया गया."
पत्थरों के बीच खड़ा था गंगाराम का बगीचा
खनन कंपनी का लम्बा चौड़ा परिसर मशीनी उपकरणों की आवाज़ से गूंजता है. ये जगह ज़मीन से खोद कर निकाले गए पत्थरों की कटाई करने वाले मज़दूरों की आवाजाही से गुलज़ार रहता है. इसी मशीनी इलाके के एक हिस्से को गंगाराम ने एक बगिया में बदल दिया था.
यहं काम करने वाले मज़दूर बताते हैं कि बगीचे में लगे फूलों के पौधे और यहां की हरियाली गंगाराम के हाथों की देन है.
वो कहते हैं, "अब उसके न रहने से फूलों के पौधे मरने लगे है और बगिया भी सूख रही है."
खनन कंपनी ने गंगाराम के परिजनों को एक लाख रुपये की सहायता देकर अपना पल्ला झाड़ लिया है. मौक़े पर मिले कम्पनी के एक आला अधिकारी ने घटना पर गहरा अफ़सोस जताया लेकिन आधिकारिक तौर पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.
यह इलाका कांस्या ग्राम पंचायत के अधीन आता है. गांव के सरपंच सीताराम कहते है इस घटना से हर कोई सहम गया है.
वे कहते हैं, "इस इलाके में लोग पत्थर तोड़ते रहे हैं मगर अब लोग यही पूछ रहे है कि आख़िर ऐसा कौन पत्थर दिल आदमी था जिसने इस घटना को अंजाम दिया."
गंगाराम के गांव का हाल
गंगाराम के पुश्तैनी गांव उम्मेदनगर में चेहरों पर उदासी है और मातम पसरा है. इस छोटे-से गांव में जब आंसुओ से भीगी आवाज़ में रह-रह कर रुलाई फूटती है तो माहौल और भी ग़मगीन हो जाता है.
गंगाराम के परिजन गांव में एक कच्चे घर में बसेरा करते है. वहां दिन भर गांव के लोग परिजनों को सांत्वना देने के लिए आते रहते दिखते हैं.
यूँ तो भीलवाड़ा जिले में जातिगत भेदभाव की जड़ें गहरी हैं मगर इस घटना ने उम्मेदनगर में इस भेद को एक तरह से पाट दिया है.
घटना की जानकारी मिलते ही गांव में राजपूत समाज के लोग मदद को पहुंचे और परिजनों को हिम्मत दी.
उम्मेदनगर के भैरों सिंह उन लोगों में से थे जो घटनास्थल पर पहुंचे थे.
वे कहते है, "जब हम मौक़े पर पहुंचे तो गंगाराम का शव अधजला था. उसमें से तेज़ लपटें उठ रही थी. पुलिस ने लपटें बुझाईं और जाँच शुरू की. पुलिस ने जाँच का भरोसा दिलाया है."
इधर घर के भीतर से रोने-बिलखने की तेज़ आवाजें सुनाई देती हैं. बाहर गंगाराम की तस्वीर के इर्द गिर्द लोग जमा हैं.
उम्मेदनगर के शंकर सिंह कहते है, "गंगाराम लोगों से अच्छे से मिलते-जुलते थे. जिस तरह से उनकी हत्या की गई है, उससे लोग बहुत दुखी हुए है और जाँच की मांग कर रहे है."
वे कहते है, "न्याय नहीं मिला तो गांव के लोग आंदोलन पर उतरेंगे."
इस घटना ने गंगाराम के बड़े भाई नारायण को परेशान कर दिया है. वे कहते हैं, "गंगाराम ने परिवार को मज़बूती से संभाला था. वो परिवार का संबल था. वो मेरे लिए भाई भी था और बेटा भी. इस हादसे ने मेरी दुनिया ही उजाड़ दी."
वहीं नज़दीक में गंगाराम की बहन छांव थी जो लगातार भाई को याद कर रो रही थी.
जातिगत भेदभाव की गहरीजड़ें
भीलवाड़ा में दलित अधिकारों पर काम करने वाले कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी कहते हैं भीलवाड़ा राज्य के उन ज़िलों में शुमार है जहां दलितों पर अत्याचार की घटनाएं सबसे अधिक होती हैं.
वे कहते हैं, "इस घटना के बाद सत्तारूढ़ कांग्रेस या फिर प्रतिपक्ष में बैठी बीजेपी- किसी पार्टी से कोई भी नेता परिवार के आंसू पोंछने नहीं पहुंचा. यहाँ तक कि बहुजन समाज पार्टी ने भी चुप्पी नहीं तोड़ी."
मेघवंशी पूछते हैं, "आखिर ऐसा क्यों है. भीलवाड़ा में हिन्दू संगठन काफी सक्रिय रहते हैं, लेकिन इन संगठनों ने भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है."
वहीं कांस्या के सरपंच सीताराम कहते हैं, "गंगाराम अपना काफ़ी वक़्त उस क्षेत्र में धर्मिक स्थल पर भी गुज़ारता था. उसे प्राय श्रदालुओं की सेवा करते भी देख सकते थे. ऐसे में उनकी हत्या ने लोगो को चिंतित कर दिया है."
भीलवाड़े के इस इलाक़े की बात करें तो ये इलाक़ा कुदरत की दौलत से मालामाल है. यहां चारों तरफ़ पत्थर की खदानें है जहां हर समय पत्थर ढोते वाहनों और मज़दूरों की आवाजाही रहती है.
इलाक़े के लोग कहते हैं कि 'यह हैरत की बात है कि घटना हुई तो किसी का उस पर ध्यान नहीं गया.'
"कभी उसने बेजान पत्थरों के बीच बगीचा बनाया था. लेकिन उसकी मौत के बाद अब उसके परिवार की ज़िंदगी का गुलिस्तां उजड़ गया."
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