ब्लॉग: 'मैं सबरीमला वाले भगवान से क्यों ग़ुस्सा हूं'

सबरीमला
    • Author, कृतिका कन्नन
    • पदनाम, संवाददाता, बीबीसी तमिल सेवा
  • प्रकाशित

मैं 17 साल की थी, जब मुझे पहली बार उस भगवान पर गुस्सा आया था, जिसे मैंने जीवनभर पूजा था.

सबरीमला के भगवान अयप्पा से गुस्से की वजह थी- भेदभाव, जो मेरे साथ हुआ था.

हमारे परिवार के पुरुष सदस्य सबरीमला तीर्थ के लिए उपवास पर थे और मुझे परिवार के एक सदस्य के यहां रहने को कहा गया था, क्योंकि उस समय मेरी माहवारी चल रही थी.

माहवारी के दौरान महिलाओं को अपवित्र माना जाता है और जो पुरुष उपवास पर होते हैं, उन्हें ऐसी महिलाओं से दूर रहने को कहा जाता है.

उनकी आवाज़ पुरुष श्रद्धालुओं के कानों तक न पहुंचे, इसका ख्याल रखने को कहा जाता है. अपेक्षित होता है कि वे उनके सामने न आएं और न ही उनसे बात करने की कोशिश करें.

मेरी मां ने ये सब मुझसे करने को कहा था. मैं इसी माहौल में बड़ी हुई और मेरे साथ कई और महिलाएं भी इन बातों का ख्याल रखती रही हैं.

सबरीमला

48 दिनों के नियम

उनका कहना है कि अगर माहवारी में महिलाएं ऐसे पुरुषों के सामने आती हैं तो उनका व्रत टूट जाता है.

मेरे पिताजी भगवान अयप्पा के भक्त हैं और वो 48 दिनों तक हर धार्मिक नियमों का पालन करते हुए उपवास पर रहते हैं.

इसका मतलब यह है कि इस दौरान पुरुष भक्त न सिनेमा देखते हैं और न ही टीवी. वो शराब, सेक्स, मांसाहारी भोजन, इन सब से दूर रहते हैं.

वो दिन में दो बार नहाते हैं, पूजा करते हैं और साधारण भोजन करते हैं.

सबरीमला

रिवाज के नाम पर छुआछूत जैसा व्यवहार

सिर्फ़ सबरीमला तीर्थ के दौरान ही महिलाओं को इस तरह के भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता है, बल्कि अन्य धार्मिक मौकों पर भी उन्हें ऐसे भेदभाव झेलने पड़ते हैं.

मैं इसी तरह के माहौल वाले घर में बड़ी हुई और मैंने देखा है कि माहवारी के दौरान महिलाएं एक कोने में अछूत की तरह बैठी रहती हैं.

उन्हें कुछ भी छूने की मनाही होती है और दूसरे भी उन्हें न छुएं, इसका ख्याल रखने को कहा जाता है.

मैंने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई, इससे लड़ने की कोशिश की पर मैं अपने ही घर में परंपरा के आगे हार गई. मुझे रिवाज के नाम इस छुआछूत का सामना करना पड़ा.

लेकिन जब मैं अपनी नौकरी के लिए घर से बाहर गई, वहां मैंने अपनी दुनिया बसाई, वहां मेरे नियम चलते थे.

जिस छुआछूत को मैंने सहा था, मेरी इस दुनिया में उस छुआछूत की कोई जगह नहीं थी. मेरे मां-बाप ने मेरे इस विद्रोह को नज़रअंदाज कर दिया था.

सबरीमला

वो डरावनी रात

तो लौटते हैं उम्र के उसी 17वें पड़ाव पर जहां मुझे ये भेदभाव झेलने पड़े थे. इस दौरान मुझे परिवार के एक सदस्य के घर रहना पड़ा था.

वहां रहना भी मेरे लिए सुकून भरा नहीं था. वहां मुझे कुछ भी छूने की मनाही थी और दूसरे भी मुझे नहीं छूते थे.

और यही वजह है कि मुझे इन परंपराओं से चिढ़ है और गुस्सा भी.

तीन साल बाद भी मेरे साथ कुछ ऐसा ही हुआ. मुझे दूसरे घर पर रहना पड़ा था. मैं जिस इलाक़े में रह रही थी, उसे मैं बहुत नहीं जानती थी.

एक दिन मैंने एक ऑटो किराए पर लिया. उसके ड्राइवर को यह अंदाजा लग गया कि मैं उस इलाक़े में अनजान हूं और उसने इसका फायदा उठाने की कोशिश की.

वो मुझे एक सुनसान इलाक़े में ले जाने लगा. मैंने उसे ऑटो रोकने को कहा. मैं उस पर चिल्लाई भी. मुझे आज भी याद है कि मैं किस तरह ऑटो से उतरकर रौशनी की तरफ भागी थी.

स्थानीय लोगों की मदद से मैं किसी तरह अपने परिवार के घर पहुंची थी. वहां पहुंचने के बाद मैं काफी रोई थी. यह दूसरी दफा था जब मुझे भगवान पर गुस्सा आ रहा था.

आप कह कहते हैं कि ऐसा एक लड़की के साथ होना आम है, इसमें भगवान को क्यों दोष देना, पर मैं आपसे यह कहना चाहती हूं कि मैं उस भगवान की वजह से घर से बाहर रहने को मजबूर थी.

सबरीमला

जब मैं सबरीमला गई थी

सबरीमला में बच्चियों को ले जाना भी मुश्किल भरा काम होता है. जब मैं दस साल की थी, तब मैं वहां गई थी.

मेरी कम उम्र की वजह से मुझे 48 दिनों का उपवास रखने को नहीं कहा गया था. सबरीमला जाने से पहले में दस दिनों के उपवास पर थी.

मैं अपने पिताजी और चाचाजी के साथ सबरीमला मंदिर गई थी. सबरीमला का मंदिर जंगलों के बीच है.

जंगलों के बीच की वो खूबसूरत यात्रा मुझे आज भी याद है. यात्रा के अंत में मैंने भगवान के दर्शन भी किए थे.

वहां से लौटने के बाद मैंने अपनी यात्रा के बारे में अपने दोस्तों को बहुत कुछ बताया था. मुझे वो पल भी याद है जब मेरे पिताजी गर्व से लोगों को कहते थे कि वो मुझे सबरीमला की यात्रा पर ले गए.

जब मेरे साथ भगवान के नाम पर भेदभाव हुए, तब मेरे मन में कई सवाल उठे. अगर भगवान मर्द और औरत को समान मानते हैं तो फिर औरतों को इस तरह का भेदभाव क्यों सहना पड़ता है?

उसे अपना घर क्यों छोड़ना पड़ता है?

सबरीमला

क्या होगा अंजाम

ऑटो वाली घटना के अगले साल मैं अपने भाई से यह कहते हुए लड़ी थी कि वो अपने व्रत के दौरान कोई दूसरा घर देख लें, क्योंकि मैं माहवारी के दौरान घर छोड़ कर नहीं जाने वाली.

भेदभाव को ख़त्म करने वाला सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला ऑटो वाली घटना के कुछ साल बाद आया है. इस फ़ैसले के बाद 10 से 50 साल की महिलाएं अब मंदिर जा सकेंगी.

इस फ़ैसले पर महिलाओं की राय बंटी हुई हैं. कुछ इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रही हैं. बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार को मंदिर के पास स्थिति क्या थी, यह सभी टीवी चैनलों पर दिन भर चल रहा है.

अब समझ में नहीं आ रहा है कि कौन सही है और कौन ग़लत. फ़ैसले का क्या अंजाम होगा, यह भी वर्तमान स्थिति को देखते हुए स्पष्ट नहीं दिख रहा है.

आने वाला वक़्त बताएगा कि धार्मिक परंपराओं के नाम पर महिलाओं के साथ ये भेदभाव रुकेगा या फिर चलता रहेगा.

Presentational grey line
Presentational grey line

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)