जब राजीव गांधी ने दिया था सोमनाथ चटर्जी को सुप्रीम कोर्ट जज बनने का ऑफ़र

सोमनाथ चटर्जी
    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 4 मिनट

ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि विपक्ष के बड़े नेता को सरकार की तरफ़ से सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने की पेशकश की गई हो. लेकिन एक बार ऐसा हुआ है जब राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते क़ानून मंत्री शिव शंकर ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखर नेता सोमनाथ चटर्जी से कहा कि सरकार उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाना चाहती है.

सोमनाथ ने उस प्रस्ताव को हँसी में उड़ा दिया, क्योंकि वो समझे कि शायद शिवशंकर उनसे मज़ाक कर रहे हैं. लेकिन जब शिव शंकर ने वो पेशकश दोहराई तो सोमनाथ चटर्जी को कहना पड़ा कि वो उस पद में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है.

सोमनाथ चटर्जी

राजीव की पेशकश पर हैरान थे चटर्जी

बाद में उन्होंने अपने आत्मकथा, 'कीपिंग द फ़ेथ' में लिखा, ' मुझे अभी तक पता नहीं कि राजीव क्यों मुझे इस पद पर देखना चाहते थे, क्योंकि मेरी इस विषय पर कभी उनसे कोई बात नहीं हुई. शायद उनको मेरे क़ानून के ज्ञान पर बहुत भरोसा हो और शायद ये भी हो सकता है कि वो संसद में मुझसे पिंड छुड़ाना चाहते हों, क्योंकि सदन में उनकी सरकार का मुझसे बड़ा आलोचक शायद उस समय कोई नहीं था. बहरहाल मुझे अपने इस फ़ैसले पर कभी कोई अफ़सोस नहीं हुआ.'

लेकिन जब वर्ष 2004 में उनके पास पार्टी के बड़े नेता हरिकिशन सिंह सुरजीत का फ़ोन आया कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी ने लोकसभा अध्यक्ष के रूप में उनकी सेवाएं मांगी हैं तो वो मना नहीं कर सके. एक बार पहले भी विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान मधु दंडवते ने उन्हें लोकसभा का स्पीकर बनाने का सुझाव दिया था, लेकिन तब उनकी पार्टी ने उसे स्वीकार नहीं किया था.

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लेकिन इस बार मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो ने उनके स्पीकर बनने पर मुहर लगा दी. वो ऐसे समय में लोकसभा के अध्यक्ष बने जब भारत की राजनीति विभाजित थी और गठबंधन सरकार का ज़माना था.

मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने उन पर पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाया जबकि पहले जिस शख़्स को अपना भाषण संक्षिप्त करने के लिए कहा वो थे वासुदेब आचार्य जो कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लोकसभा सदस्य थे.

दिलचस्प बात ये भी थी कि उनके फ़ैसले के ख़िलाफ़ सबसे पहले वॉकआउट मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों ने ही किया था. ताउम्र कम्युनिस्ट राजनीति से जुड़े रहे सोमनाथ चटर्जी के पिता निर्मल चंद्र चटर्जी कोलकाता के नामी वक़ील थे और पश्चिम बंगाल हिंदू महासभा के अध्यक्ष थे और इसी के टिकट पर उन्होंने 1951 और 1957 का संसदीय चुनाव लड़ा था.

सोमनाथ चटर्जी

सोमनाथ चटर्जी पहली बार 1971 में जादवपुर लोकसभा क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुने गए. उस समय लोकसभा के सबसे प्रखर नेताओं में से एक ज्योतिर्मोय बसु ने उन्हें लोकसभा में भाषण देने के गुर सिखाए.

इसके बाद वो सन 2004 तक सिर्फ़ एक बार को छोड़ कर हर बार लोकसभा के सदस्य बने. सिर्फ़ 1984 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा जब कांग्रेस की ममता बनर्जी ने उन्हें लोकसभा चुनाव में पराजित किया.

वर्ष 2008 में जब अमरीका से परमाणु समझौते का मुद्दा बना कर उनकी पार्टी यूपीए सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया और उसके ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाई तो उसने उनसे लोकसभा अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देने के लिए कहा जिसे उन्होंने नहीं माना.

उनका तर्क था कि लोकसभा अध्यक्ष बनने के बाद कोई व्यक्ति पार्टी का सदस्य नहीं रह जाता है. वो इसलिए उसके आदेशों को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं. उनकी पार्टी ने उनके इस तर्क को नहीं माना और उन्हें पार्टी का आदेश न मानने के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया गया.

सोमनाथ चटर्जी

बाद में सोमनाथ ने कहा कि उनके माता-पिता के देहांत के बाद ये उनके जीवन का सबसे दुखी क्षण था, लेकिन इसके लिए उन्होंने कभी अफ़सोस नहीं प्रकट किया. ये पहला मौक़ा नहीं था जब उनकी सीपीएम नेतृत्व से ठनी हो. 1992 में भी पार्टी ने उन्हें सैफ़ुद्दीन चौधरी के साथ कारण बताओ नोटिस जारी किया था.

उन पर आरोप था कि वो कांग्रेस पार्टी के नेताओं से मिलजुल रहे हैं जबकि उस समय पार्टी की नीति भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस से बराबर की दूरी बनाए रखने की थी.

संसद में 500 से ज़्यादा भाषण

सोमनाथ चटर्जी को राजनीति में लाने का श्रेय ज्योति बसु को दिया जा सकता है. 80 के दशक में उन्होंने दो बार सोमनाथ चटर्जी को अपनी कैबिनेट में लेने की कोशिश की लेकिन सोमनाथ को तब तक भारतीय संसद में उनकी पारी इतनी रास आ चुकी थी कि वो इसके लिए राज़ी नहीं हुए.

सोमनाथ चटर्जी

1996 में जब ज्योति बसु को भारत के प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव आया तो वो पार्टी के उन नेताओं में से थे, जिन्होंने इसका समर्थन किया, लेकिन पार्टी इसके लिए राज़ी नहीं हुई. 1971 से 2009 के बीच सोमनाथ चटर्जी ने संसद में 500 से अधिक भाषण दिए. 1996 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद के पुरस्कार से नवाज़ा गया.

सोमनाथ चटर्जी को उनकी ईमानदारी के लिए भी हमेशा याद रखा जाएगा. वर्ष 2004 में जब वो लोकसभा स्पीकर बनने के बाद लोकसभा अध्यक्ष के सरकारी निवास 20 अकबर रोड में रहने के लिए आए तो उन्हें ये जान कर धक्का लगा कि उनके निवास पर लोगों को चाय पिलाने, बिस्कुट खिलाने, फ़िनाइल और साबुन का बिल लोकसभा सचिवालय की ओर से दिया जाता है, तो उन्होंने उस पर रोक लगवा दी.

उन्होंने कहा, ''मैं समझता हूँ कि मैं अपने बाथरूम का बिल भर सकता हूँ और अपने मेहमानों को एक कप चाय पिलाने की क्षमता अभी मुझमें है.''

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