You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
भारत आने के दो साल बाद भी गीता को है अपने परिवार का इंतज़ार
साल 2015 में पाकिस्तान से भारत वापस आई गीता अब भी अपने परिवार से मिलने का इंतज़ार कर रही हैं.
गीता आज से ठीक दो साल पहले 26 अक्टूबर 2015 को अपने परिवार की तलाश में भारत आईं थीं. लेकिन इंदौर में मूक-बधिरों के लिए चलाई जा रही एक स्थानीय ग़ैर-सरकारी संस्था का आवासीय परिसर दो सालों से उनका ठिकाना है.
परिवार को खोजने के सारे प्रयास अब तक कामयाब नही हो पाए हैं. इस दौरान दो बार वह अपने आवासीय परिसर से ग़ायब भी हो चुकी हैं.
इंदौर में मूक-बधिर सहायता केन्द्र चलाने वाले ज्ञानेन्द्र पुरोहित का कहना है कि कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि जल्द से जल्द गीता को उसका परिवार मिल जाए.
परिवार न मिलने से गीता परेशान
गीता की स्थिति पर वो कहते हैं कि आमतौर पर इस तरह से विचलित होने वाले मूक-बधिर बच्चों की स्थिति को काबू में करना ज़रूरी है वरना वो किसी भी स्तर तक जा सकते हैं.
हालांकि, यह फोटो के ज़रिए भी देखा जा सकता है कि गीता जब भारत आई थीं, तब और अब की स्थिति में काफ़ी बदलाव आ गया है.
इसी महीने अब्दुल सत्तार ईधी फाउंडेशन के फ़ैसल ईधी ने सुषमा स्वराज को एक ख़त लिखा है.
इसमें वो लिखते हैं, ''गीता के परिवार को ढूंढने के लिए ज्ञानेन्द्र पुरोहित की मदद लें. पुरोहित को इस तरह के काम करने का अनुभव है. जब गीता पाकिस्तान में थी, तब पुरोहित ही गीता से साइन लैंग्वेज में वीडियो से बात करते थे.''
हालांकि भारत आने के बाद पुरोहित की मुलाक़ात गीता से अब तक नहीं हो पाई है.
बताया जा रहा है कि परिवार नहीं मिलने की वजह से वो परेशान रहती हैं और उसी की वजह से उन्होंने वहां से निकलने का प्रयास किया है.
गीता को लाना था डिप्लोमेसी?
गीता के मामले पर इंदौर में जनहित याचिका दाखिल करने वाले जितेन्द्र सिंह का आरोप है कि सरकार गीता को उनके परिवार से मिलाने के लिए समुचित प्रयास नहीं कर रही है. वो उसे लेकर आ तो गए लेकिन उन्होंने इंदौर शहर में उसे छोड़ दिया है.
हालांकि, उनकी जनहित याचिका इस आधार पर ख़ारिज कर दी गई कि गीता को डिप्लोमेसी के तहत भारत लाया गया है और सरकार के इस मामले में कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करेगा.
वहीं गीता जिस संस्था में रह रही हैं, उसकी संचालिका मोनिका पंजाबी ने इस मामले में बात करने से इनकार कर दिया. उनका कहना है कि बात करने के लिए मनाही है.
इंदौर एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट रुचिका चौहान ने बताया, "गीता इंदौर में काफी अच्छे से रह रही हैं. जिस जगह वो रह रही हैं, वहां पर उसके काफी मित्र भी हैं. वो सिलाई कढ़ाई भी कर रही हैं और मूक-बधिरों के इंस्ट्रक्टर के ज़रिए उसने पढ़ाई भी शुरू कर दी है."
हालांकि गीता के ग़ायब हो जाने के मामलें में उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.
अब्दुल सत्तार ईधी फ़ाउंडेशन के मैनेजिंग ट्रस्टी फ़ैसल ईधी ने बीबीसी को बताया, "भारत जैसे बड़े मुल्क में उसके परिवार को ढूंढ पाना आसान नहीं है. मुझे लगता है कि सरकार पूरे प्रयास कर रही है और जल्द ही वो उसे उसके परिवार तक पहुंचाने में कामयाब होंगे."
हालांकि, बहुत से लोग यह मानते हैं कि सरकार ने गीता को लाकर राजनीतिक फायदा जो उठाना था वो उठा लिया और उसके बाद उसके परिवार को ढूंढने का गंभीर प्रयास नहीं किया जा रहा है.
2003 में लाहौर में मिली थी गीता
इसी महीने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने घोषणा की है कि जो भी गीता के परिवार को खोजने में मदद करेगा, सरकार उसे एक लाख रुपये इनाम के तौर पर देगी.
10 साल से अधिक वक़्त तक पाकिस्तान में रही गीता न तो बोल सकती हैं और न ही सुन सकती हैं.
गीता साल 2003-04 में पाकिस्तानी बॉर्डर गार्ड्स को लाहौर के पास मिली थीं. वो उसे अब्दुल सत्तार ईधी के यतीमख़ाने ले गए. तब गीता की उम्र क़रीब 11 साल बताई जाती थी. पाकिस्तान की बॉर्डर अथॉरिटी ने इस बच्ची को ईधी फ़ाउंडेशन को सौंपा था.
27 अक्तूबर को झारखंड से एक परिवार गीता से मिलने इंदौर आ रहा है. हो सकता है कि ये परिवार गीता का परिवार हो
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)