उत्तराखंड: कौन बनेगा मुख्य मंत्री?

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उत्तराखंड विधानसभा चुनावों में पूर्ण बहुमत हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी को मुख्यमंत्री का नाम तय करने में दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा है.
आधा दर्जन नामों पर चर्चा चल रही है. पार्टी के दो पर्यवेक्षक विधायक दल की बैठक करवाने देहरादून पहुंच रहे हैं. इस बैठक के बाद ही पार्टी नेतृत्व अपनी पसंद के नाम पर मुहर लगाएगा.
सर्वमान्य चेहरा?

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उत्तराखंड का मुख्यमंत्री तय करने के पहले क्या जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों के अलावा प्रशासनिक अनुभव का भी ध्यान रखा जाएगा? फ़िलहाल, बीजेपी नेता इस सवाल से बच रहे हैं.
रानीखेत सीट से चुनाव हार गए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और चुनाव संचालन समिति के प्रमुख, अजय भट्ट ने बीबीसी से कहा, "मुख्यमंत्री कोई बने, सरकार तो भाजपा की ही होगी. विकास का इंजन दूने गति से काम करेगा. विकास के तमाम रुके हुए काम पूरे होंगे."
लेकिन पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल सर्वमान्य चेहरे के चयन का है. वह आदमी ऐसा हो जो पांच साल तक बग़ैर किसी विवाद के सरकार चला सके.
दावेदारों की भरमार

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मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में सतपाल महाराज, दो पूर्व मुख्य मंत्री भगतसिंह कोश्यारी और रमेश पोखरियाल निशंक, पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व मंत्री त्रिवेंद्र रावत हैं.
इसके अलावा पार्टी प्रवक्ता अनिल बलूनी, प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट और पूर्व विधानसभा स्पीकर प्रकाश पंत भी दौड़ में शामिल हैं.
इनमें से कुछ नेताओं के बारे में उनके प्रशंसकों ने सोशल मीडिया पर अभियान छेड़ रखा है.

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प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता देवेंद्र भसीन कहते हैं, "भाजपा एक जनतांत्रिक पार्टी है, सबको अपनी बात रखने का अधिकार है. जब निर्णय हो जाता है, उसको सब मानते हैं."
समझा जाता है कि प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह अपना मन बना चुके हैं.
कयास लगाया जा रहा है कि पिछली बार की तरह कोई नया और अनपेक्षित उम्मीदवार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर जा बैठेगा.
उठापटक के 16 साल

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भारतीय जनता पार्टी ने नवंबर 2000 में जब उत्तराखंड में अंतरिम सरकार बनाई थी, नित्यानंद स्वामी मुख्यमंत्री बनाए गए थे.
भगत सिंह कोश्यारी और रमेश पोखरियाल निशंक खेमों ने इसका ज़बरदस्त विरोध किया था. राज्य के पहले विधानसभा चुनावों से कुछ ही महीने पहले स्वामी को अपनी कुर्सी, कोश्यारी को सौंपनी पड़ी थी.
इसके बाद 2007 में भी भाजपा की सरकार बनी, जनरल बीसी खंडूरी मुख्यमंत्री बनाए गए थे.
रमेश पोखरियाल निशंक ने दो साल के अंदर ही उन्हें चलता कर दिया और खुद वह कुर्सी ले ली.
खंडूरी ने 2012 में ऐन चुनाव से पहले पलटवार किया और कुर्सी पर फिर से काबिज़ हुए.
यह सिलसिला 2012 में कांग्रेस ने भी दोहराया और विजय बहुगुणा के बाद हरीश रावत मुख्यमंत्री बने.
इस तरह, सिर्फ़ कांग्रेस के नारायण दत्त तिवारी ही पांच साल का कार्यकाल पूरा कर सके थे.
































