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गोवा: पार्टी और उम्मीदवारों की बाढ़
भारत के सबसे छोटे राज्यों में एक गोवा 4 फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटा है लेकिन प्रदेश की जनता एक अभूतपूर्व दुविधा का सामना कर रही है.
औसतन 27000 मतदाताओं वाली 40 विधानसभा सीटों के लिए ढेर सारी राजनीतिक पार्टियां और निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में हैं और लोगों के पास चुनने के लिए विकल्पों की भरमार है.
हालांकि इसी वजह से उम्मीदवारों के बीच मुक़ाबला सख्त है. आखिरी वक्त में लोगों का रुख़ बदलना भी अहम भूमिका निभाएगा.
चुनाव के नतीजा ऐसे भी हो सकते हैं जिसकी भविष्यवाणी शायद कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं करना चाहेगी.
घोषणा पत्र
अस्थिर सरकारें, बिखरते गठबंधन और मुख्यमंत्री के कई दावेदार गोवा के लिए ये सब कोई बहुत पुरानी बात नहीं है और उसे देखते हुए इस बार भी इसकी उम्मीद की जा रही है.
हालांकि पिछला दशक राज्य के उतार चढ़ाव वाले राजनीतिक इतिहास के लिहाज से अपवाद रहा है.
1987 के बाद से राज्य का दर्जा पाने की वजह से जो अस्थिरता रही, उससे अलग पिछले दशक में कुछ स्थिर सरकारों और कार्यकाल पूरा करने वाले गठबंधनों का दौर रहा.
लेकिन इस बार मुक़ाबला चौतरफ़ा है और इतना ही नहीं किसी ख़ास चुनावी घोषणा पत्र की गैरमौजूदगी ने भी बहुत सी विचारधाराओं और धारणाओं को खेल में उतार दिया है.
बड़ा गठबंधन
36 सीटों पर लड़ रही सत्ताधारी पार्टी बीजेपी ने अपना प्रचार विजय संकल्प के रूप में शुरू किया है जिसका आधार है बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे से जुड़े काम और कुछ लोकलुभावन वादे.
बीजेपी के सामने एक अप्रत्याशित चुनौती महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी) की तरफ से आ गई है, जो कभी उसका सहयोगी रही थी.
इसके साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गोवा में पूर्व संघचालक ने गोवा सुरक्षा मंच के नाम से नई पार्टी बनाई है और एमजीपी, शिवसेना के साथ मिल कर बड़ा गठबंधन तैयार किया है.
प्रचार अभियान
ये गुट बीजेपी की 'अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण' की नीति का विरोध कर रहा है जिसके तहत अंग्रेजी माध्यम के प्राइमरी स्कूलों को मिलने वाली ग्रांट उन स्कूलों को भी दी जा रही है, जहां पढ़ाई का माध्यम विवादित है. इसी मुद्दे ने 2014 में बीजेपी को जीत दिलाई थी.
बीजेपी के भीतर भी गुटबाजी है क्योंकि रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर खुद प्रचार अभियान पर नज़र रख रहे हैं और कहा जा रहा है कि नया मुख्यमंत्री दिल्ली से आ रहा है.
इस कारण बीजेपी सांसद और केंद्रीय आयुष मंत्री श्रीपाद नाइक बहुत खुश नहीं है और दूसरी तरफ मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर भी असहज हैं.
पार्टी उम्मीदवार
2014 की हार के बाद खुद को फिर से जिंदा करने की कोशिश में जुटी कांग्रेस भी पूर्व सहयोगी दल एनसीपी के अलग होने से मुश्किलों में है. एऩसीपी ने 17 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है.
इसके अलावा पार्टी उम्मीदवारों को लेकर अपनी चिरपरिचत उलझन से भी जूझ रही है, जहां केंद्रीय नेतृत्व, अनुभवी नेताओं और नए चेहरों में से चुनाव करना है. पार्टी ने 36 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करने के अलावा चार सीटें गोवा फॉरवर्ड पार्टी को दी हैं.
इसके अलावा कांग्रेस के साथ आपसी समझ के तहत गोवा सूरज पार्टी 7, गोवा विकास पार्टी 6, और यूनाइटेड गोअंस पार्टी 2, कुछ निर्दलीय उम्मीदवार भी मैदान में हैं.
गोवा के चुनाव में अकेली आम आदमी पार्टी ही ऐसी है जिसने सभी 40 सीटों पर उम्मीदार खड़े किए हैं.
सबसे ज्यादा वोट
दिल्ली के चुनाव में कुछ साल पहले मिली शानदार सफलता को दोहराने की उम्मीद कर रही 'आप' ने बीजेपी के "भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने में नाकामी" को भुनाने की फिराक में है.
'आप' ने गोवा के लिए पूर्व नौकरशाह एल्विस गोम्स को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है. पिछले साल एक सर्वे में 'आप' को सबसे ज्यादा प्रतिशत वोट मिलने की बात कही गई थी और इसी से पार्टी पूरे जोश में है लेकिन हाल के एक सर्वे ने पार्टी के लिए उम्मीदों को मिला जुला रहने की भविष्यवाणी की है.
हालांकि ज़मीनी स्तर पर लोगों को एकजुट करने में पार्टी ने चुपचाप काम किया है और ऐसी धारणा बन रही है कि नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं हालांकि दो साल पहले दिल्ली में जो हुआ था उसकी उम्मीद नहीं है.
दक्षिण गोवा
ढेर सारे चेहरों के अलावा आपस में उलझते बहुत से मुद्दों और एक दूसरे को काटती घोषणाओं ने भी इस चुनाव को अप्रत्याशित बना दिया है.
हालांकि प्रत्यक्ष रूप से उत्तर और दक्षिण गोवा के बीच स्वाभाविक धार्मिक संकेतों के साथ बंटी जंग की रेखा दिख रही है, जिसमें उत्तरी गोवा के लिए मोपा एयरपोर्ट और पढ़ाई के माध्यम को लेकर उठा विवाद शामिल है. दूसरी ओर दक्षिणी गोवा के कैथलिक मतदाताओं को लामबंद करने की कोशिश हो रही है.
लेकिन असल जंग तो बूथ और वॉर्ड पंचायतों के इलाकों में दिखेगी जहां लोगों की धारणाएं रातों-रात बदल जाती है और सारी भविष्यवाणियां धरी की धरी रह जाएंगी.
आखिरकार गोवा अस्थिरताओं और अचंभों के मामले में कोई नया नहीं है.
( लेखक राहुल त्रिपाठी गोवा यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान पढ़ाते हैं.)
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