हिम्मत है तो मस्तीज़ादे झेलें

मस्तीज़ादे
    • Author, मयंक शेखर
    • पदनाम, फ़िल्म समीक्षक
  • प्रकाशित

फ़िल्मः मस्तीज़ादे

निर्देशकः मिलाप ज़ावेरी

अभिनेताः सनी लिओनी, तुषार, वीर दास

रेटिंग-*

अगर मैं ग़लत नहीं हूं तो ये लगातार दूसरी बार है कि सनी लिओनी फ़िल्म में एक टिकट के एवज में दोहरी भूमिका निभा रही हैं( इससे पहले वो 'एक पहेली लीला' में डबल रोल में थीं).

इस फिल्म में सनी लिओनी जुड़वां बहनों के किरदार में हैं. उनकी मां, जिसका नाम सीमा था, अति कामुक महिला थी. उनके पिता एक अभिनेता हैं, जिन्होंने हमेशा एक सैनिक का किरदार ही निभाया है. वो ये मानते हैं कि वे अब भी सीमा, यानी सरहद की हिफ़ाज़त कर रहे हैं, लेकिन "सीमा में सब घुस जाते थे."

असरानी
इमेज कैप्शन, असरानी एक अर्से के बाद इस फिल्म में नज़र आए हैं

असरानी, जिन्हें काफ़ी अर्से से फ़िल्मों में नहीं देखा गया है, वो इस किरदार में हैं जिसका नाम है,यू आर अशित(ट).

जुड़वां सनी लिओनी बहनें सेक्स एडिक्ट लोगों के लिए पुनर्वास केंद्र चलाती हैं. इस फिल्म का एक प्रचार वाक्य है, 'सिक्का हिलेगा आज'. दरअसल इसमें उस सिक्के का ज़िक्र है जो ये बहनें अपने सेक्स एडिक्ट मरीज़ों की जांघ पर रखती हैं और उनके सामने अर्धनग्न होकर नाचती हैं. अगर सिक्का गिर जाता है, उछलता है या दूर जाकर गिरता है, तो इसका मतलब है कि मरीज़ को भी मदद की ज़रूरत है. हम्म्म्.

मस्तीज़ादे

तुषार कपूर और वीर दास लाइलाज सेक्स एडिक्ट हैं. मज़ाक दरअसल उनका बनाया गया है. फिल्म बेशक सनी लिओनी पर है. उन्हीं से तो उम्मीद है कि उनकी बदौलत ही सारी चवन्नियां फिल्महॉल तक आएंगी. इसमें कोई हैरानी की बात नहीं.

वो शायद दुनिया की पहली ऐसी पॉर्न स्टार हैं जो हमारे मुख्यधारा के सिनेमा में नायिका की भूमिका स्वीकार कर ली गई हैं. इससे हमारे बारे में क्या पता चलता है? कुछ भी नहीं. सिवाय इसके कि अगर वो वाकई पंजाब से आई होतीं( वो पूरी तरह से कनाडा की हैं, उनका परिवार भारत से है), और अपने असल नाम, करनजीत वोहरा का इस्तेमाल किया होता, तो दर्शकों की प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग होती.

सनी लिओनी
इमेज कैप्शन, सनी लिओनी

लेकिन, वो वाकई 'हॉट' हैं, सीएनएन-आईबीएन के एंकर भूपेंद्र चौबे चाहें ये ना मानें, और इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि प्रसून पांडे उनके पिछले व्यवसाय को पसंद नहीं करते.

फ़िल्म में सेक्स का तड़का उन्हीं की बदौलत है. लेकिन मुझे लगा था कि ये फिल्म सेक्स कॉमेडी है. तो फिर कॉमेडी का क्या? फिल्म में सिर्फ लेना, देना, डालना, हिलाना, घुसाना, खड़ा है, बड़ा है, किस्म के शब्द हैं जो बार बार दोहराए गए हैं और जिनसे कुछ कांति शाह फिल्मों के वफादार प्रशंसक शर्मिंदा हो सकते हैं, या शायद नहीं भी.

ये जो है, सो है. या तो हर मिनट(वाकई) आपके सब्र का इम्तिहान लेने के लिए, या फिर सेक्सुअल तौर पर दमित इच्छाओं वाले उन लोगों में कुछ उत्तेजना जगाने के लिए जो सेक्स के बारे में सिर्फ हंस सकते हैं क्योंकि उसे गंभीरता से देखना या उसके बारे में बात करना कथित तौर पर निषेध काम है.

मस्तीज़ादे
इमेज कैप्शन, ये फिल्म 'क्या कूल हैं हम 1,2,3' की तर्ज़ पर ही बनाई गई फिल्म है

तो कुल मिला कर आपको मिलती है बहुत खराब तरह से फिल्माई गई, तीसरे दर्ज़े की द्विअर्थी फिल्म. भगवान जानता है कि ऐसी फिल्में हमने इतनी देखी हैं कि उनका हिसाब भी अब याद नहीं. मुझे नहीं पता कि 'मस्तीज़ादे' का 'ग्रांड मस्ती' से कोई लेना-देना है या नहीं, जोकि 'क्या कूल हैं हम' 1, 2 या 3 जैसी ही थी. 'क्या कूल हैं हम 3' पिछले हफ्ते ही रिलीज़ हुई है

लेकिन मैं एक बात जानता हूं. हमारा मौजूदा सेंसर बोर्ड अति पुरातनपंथी है जो हमारे सामूहिक नैतिक विस्तार को निश्चित करता है. और ये उसका हक़ है, क्योंकि हमने इसी तरह का बोर्ड नियुक्त करने वाली सरकार चुनी है. आखिरकार हम यही चाहते थे, तो हमें इसकी इज़्ज़त करनी चाहिए.

मुझे उम्मीद है कि इस तरह की दूसरी फिल्मों की तरह ये फिल्म भी अच्छा कारोबार करेगी, क्योंकि यही तो हम सब भी चाहते हैं. इसी तरह का मनोरंजन जनता चुनती है. सरकार को इसकी इज़्ज़त करनी ही चाहिए.

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