कैसी है मलाला पर बनी फ़िल्म ?

    • Author, मयंक शेखर
    • पदनाम, फ़िल्म समीक्षक
  • प्रकाशित

फिल्म : ही नेम्ड मी मलाला

निर्देशक: डेविस गूगनहाइम

कलाकार: मलाला यूसुफ़ज़ई, ज़ियाउद्दीन यूसुफ़ज़ई

रेटिंग: ****

ही नेम्ड मी मलाला

डेविस गूगनहाइम की निर्देशित फिल्म "ही नेम्ड मी मलाला" को इस साल की सबसे महत्वपूर्ण फिल्म कहना गलत नहीं होगा.

ये महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं है कि मलाला यूसुफ़ज़ई की जीवनी पर बनी फिल्म में उनके पिता हीरो बनकर उभरते हैं. इस बात से मुझे गीतकार और लेखक जावेद अख़्तर की वो बात याद आती है जिसमें उन्होंने कहा था कि आप अपने पिता से कितनी भी नफ़रत करें, उनकी बातों से इत्तेफ़ाक़ न रखें, आप ये कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे कि वो बेवकूफ़ हैं.

कोई व्यक्ति कितना भी कट्टर हो, सच बात तो ये है कि वो अपने पिता का ही अक़्स होता है. ये सीख भी उसे अपने पिता से ही विरासत में मिलती है.

पिता ज़ियाउद्दीन के साथ मलाला

18 साल की मलाला के पिता ज़ियाउद्दीन एक शिक्षक के बेटे हैं. उन्होंने पाकिस्तान के स्वात घाटी में एक छोटा सा स्कूल खोला जिससे मलाला को काफी प्रेरणा मिली. एक लड़की होने के बावजूद उसे पढ़ने-लिखने का पूरा मौका दिया गया. स्वात घाटी पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से महज़ 100 मील दूरी पर स्थित है. दोनों के बीच एक पहाड़ है. स्वात घाटी एक आदर्श उदाहरण है कि कैसे कट्टरता धीरे से समाज में अपने पैर पसारती और फिर अपनी पैठ बढ़ाती है.

साल 2007 तक स्वात घाटी पाकिस्तान के किसी दूसरे इलाके की ही तरह था. यही वो समय था जब तालिबान ने पहली बार यहां दस्तक दी.

"रेडियो मुल्लाह" के नाम से मशहूर, मुल्ला फ़ैज़लुल्ला के नेतृत्व में तालिबान ने यहां अपना कैंप लगाया. उन्होंने महिलाओं से सीधे संपर्क साधा और उनकी अज्ञानता और अशिक्षा का फायदा उठाते हुए उनके दिमाग में कट्टर विचार डाले.

मुझे लगता है कि रेडियो प्रसारण में फ़ैज़लुल्ला उन लोगों का नाम सार्वजनिक रूप से लेते थे जो इस्लाम के उनके नज़रिए से अलग राय रखते थे. हालांकि मैं नहीं मानता कि ये लोग इस्लाम विरोधी थे बल्कि ये वो लोग थे जो फ़ैज़लुल्ला की बातों से इत्तेफ़ाक नहीं रखते थे. स्वात के लोग फ़ैज़लुल्ला के रेडियो प्रसारण का बेसब्री से इंतज़ार करते और साथ ही इंतज़ार करते उन लोगों के नामों के सार्वजनिक होने का जिन्हें फिर जनता के सामने अपमानित किया जाता था.

इसकी तुलना लोगों के किसी व्यक्ति को पीट-पीटकर मार डालने जैसी घटना से की जा सकती है, शायद उससे भी ज्यादा घिनौनी.

यहां से लोगों को सज़ा देने की प्रक्रिया शुरू हुई. मलाला के पिता ज़ियाउद्दीन का मानना है कि कट्टरता के ख़िलाफ़ चुप्प रहना भी अपने आप में एक गुनाह है.

मलाला पर बनी फिल्म के निर्देशक

डेविस गूगनहाइम की बेहतरीन डॉक्यूमेंटरी एनिमेशन, कुछ पुरानी फुटेज और साक्षातकारों को मिलाकर बनाई गई है जिससे हम मलाला को और करीब से जान सकें.

तालिबान के ख़िलाफ़ पहली बार मलाला ने अपने ब्लॉग्स के ज़रिए आवाज़ उठाई जो वो फोन के ज़रिए बीबीसी पत्रकार को लिखवाती थी. मलाला के ब्लॉग को गुल मकाई के नाम से छापा जाता था.

ये वही दौर था जब उस इलाके में लड़कियों के स्कूलों पर बम फेंके जाते थे. एक समय ऐसा आया जब मलाला अपनी बात खुलकर कहने के लिए बाहर आई. फिर क्या था, तालिबानियों ने स्कूल बस में घुसकर बस पर हमला किया. तालिबान ने सोचा कि वो अब मर चुकी है. पाश्चात्य चिकित्सा और आधुनिक तकनीक से उन्हें नई ज़िन्दगी वरदान में मिली.

नोबल पुरस्कार विजेता मलाला, अब जिन्ना, नुसरत फतेह अली, इमरान खान के बाद सबसे प्रसिद्ध पाकिस्तानी बन गई. वो किसी भी दूसरे टीनेजर की ही तरह है. ये देखकर बहुत अच्छा लगाता है कि कैसे इतनी शौहरत और प्रसिद्धि के बाद भी वो किसी आम लड़की की ही तरह पेश आती है.

मलाला एक ज़िंदादिल लड़की

फिल्म से एक ऐसी लड़की की तस्वीर उभरकर सामने आती है जो बेहद ज़िन्दादिल है और कई बार तो काफी हंसी मज़ाक भी करती है.

क्या कोई ये देखकर कह सकता है कि ये वही लड़की है जो कट्टरता के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाती है और आज दुनिया में शांति की प्रतीक बन गई है- ठीक उसी तरह अमरीका में रंगभेद के ख़िलाफ़ रोज़ा पार्कस या भारत में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के लिए निर्भया एक प्रतीक बन गई है.

लेकिन कई शहरी पाकिस्तानी मलाला को महज़ लोकप्रियता पाने की इच्छा रखने वाली लड़की के तौर पर देखते हैं.

मलाला कहती हैं कि वो पूरी दुनिया को अपनी कहानी बता रही हैं- इसलिए नहीं कि वो अनोखी है, बल्कि इसलिए कि ये कहानी अनोखी नहीं है.

उत्तेजित दर्शकों के सामने मलाला कहती है कि एक बच्चा, एक शिक्षक, एक किताब, एक कलम इस दुनिया को बदलने की ताकत रखती है. मैं मानता हूं कि एक अकेला व्यक्ति भी ऐसा कर सकता है.

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