फ़िल्म रिव्यू: कितनी ख़ूबसूरत है 'अगली'?

'अगली'
    • Author, मयंक शेखर
    • पदनाम, फिल्म समीक्षक
  • प्रकाशित

फ़िल्म: अगली

निर्देशक: अनुराग कश्यप

कलाकार: राहुल भट्ट, रोनित रॉय, तेजस्विनी कोल्हापुरे

रेटिंग: ***

'अगली' की शुरुआत से ही कहानी एक बदसूरत मोड़ ले लेती है जब एक छोटी बच्ची का अपहरण हो जाता है.

उसका पिता उसे थोड़ी देर के लिए भीड़ भाड़ वाले इलाके में कार में छोड़कर जाता है.

उसी दौरान लड़की को अगवा कर लिया जाता है.

बच्ची का पिता एक संघर्षरत बॉलीवुड कलाकार है. उसका तलाक हो चुका है.

'अगली'

बच्ची, उसकी पूर्व पत्नी के साथ रहती है, जो मूलत: ड्रग्स पर निर्भर रहने वाली, नींद के लिए तरसती, हताश निराश गृहिणी (तेजस्विनी कोल्हापुरे) है.

उसका मौजूदा पति एक बड़ा पुलिस अधिकारी है जिसके चेहरे पर स्थाई रूप से चिड़चिड़ापन विद्यमान रहता है.

वो पता नहीं किस बात का ग़ुस्सा मन में पाले हुए है. रोनित रॉय ने ये किरदार अदा किया है.

ज़बरदस्त अभिनय

'अगली'

वैसे मैं रोनित रॉय को ज़्यादा नहीं जानता. लेकिन अगर उनके अंदर थोड़ी सी भी हास्य क्षमता मौजूद है तो मैं कहूंगा कि फ़िल्म दर फ़िल्म एक जैसे ये ग़ुस्से वाले किरदार (उड़ान, मिडनाइट्स चिल्ड्रन, 2 स्टेट्स) देकर फ़िल्मकार उनके साथ भरपूर नाइंसाफ़ी कर रहे हैं.

लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं है कि 'अगली' में उनके अभिनय में कुछ खोट है.

उन्होंने अपना रोल बखूबी निभाया. बल्कि मैं तो कहूंगा कि उनका अभिनय बेदाग रहा.

फ़िल्म में पुलिसिया दुनिया का काला चेहरा दिखाया गया है.

हालांकि मौक़ा पड़ने पर यही पुलिस ज़बरदस्त कुशलता का भी परिचय देती है लेकिन ये निर्भर करता है कि अपराधी कौन है और पीड़ित कौन.

बारीक रिसर्च

'अगली'

कहानी का मूल प्लॉट है बच्ची का अपहरण जिसके लिए अनुराग ने मुंबई पुलिस की कार्यशैली का इतनी बारीकी से अध्ययन किया है कि उतने में किसी और वृहद प्लॉट (जैसे 26/11 हमले के बाद हुई पुलिस कार्रवाई) पर भी फ़िल्म बन सकती थी.

'अगली', अनुराग कश्यप की जानदार फ़िल्म गैंग्स ऑफ़ वासेपुर के बाद और महत्तवाकांक्षी पीरियड ड्रामा 'बॉम्बे वैलवेट' से पहले आई फ़िल्म है.

'अगली' लंबे समय से अनुराग कश्यप की अगली फ़िल्म बनी हुई है और साल 2013 के कान फ़िल्म समारोह में प्रदर्शित होकर तालियां बटोर चुकी है.

कसी फ़िल्म

'अगली'

ये बड़ी डार्क फ़िल्म है लेकिन बोझिल और खींची गई कतई नहीं.

ये पुलिस के अलावा ग्लैमर जगत का भी काला चेहरा दिखाती है.

फ़िल्म में राहुल भट्ट (ये वो राहुल भट्ट नहीं जो महेश भट्ट साहब के बेटे हैं और डेविड हेडली के दोस्त रहे) ने एक संघर्षशील कलाकार का रोल बड़ी संवेदनशीलता और आत्मविश्वास से निभाया है.

कास्टिंग एजेंट के रोल में विनीत कुमार सिंह और बीट कांस्टेबल के रोल में गिरीश कुलकर्णी ने भी अपनी छाप छोड़ी है.

छोटी बच्ची के अपहरण के पीछे कोई भी हो सकता है. शक की सुई एक से दूसरे की ओर घूमती रहती है.

निराशाजनक क्लाईमेक्स

'अगली'

लेकिन फ़िल्म का क्लाईमेक्स बड़ा सुस्त है.

फ़िल्म शुरुआत में जो अपनी पकड़ बनाती है और कहानी में जो कसावट है वो क्लाईमेक्स से ग़ायब है.

लेकिन फिर भी फ़िल्म ज़्यादातर हिस्से में दर्शकों को बांधे रखती है.

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