जंतर-मंतर प्रोटेस्ट: सीजेपी के प्रदर्शन में बीबीसी के संवाददाताओं ने क्या देखा?

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दिल्ली में शनिवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग के समर्थन में प्रदर्शन के दौरान दिनभर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच खींचतान चलती रही.
सुबह से ही जंतर-मंतर और आसपास के इलाक़ों में भारी बैरिकेडिंग थी. बड़ी संख्या में पुलिस और सुरक्षा बल तैनात थे. सीजेपी ने लोगों को प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर पर आने की अपील की थी.
प्रदर्शन में शामिल होने के लिए पहुंच रहे लोगों को हिरासत में लिया जा रहा था. कई जगहों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच खींचातानी भी हुई.
प्रदर्शन में शामिल होने मुंबई से दिल्ली आए कॉकरोच जनता पार्टी के फ़ाउंडर अभिजीत दीपके और उनके साथी सौरव दास और आशुतोष रांका को एयरपोर्ट से ही हिरासत में ले लिया गया. वहीं, हिरासत में लिए गए कुछ प्रदर्शनकारी पुलिस बस का इमरजेंसी गेट खोलकर भागने में कामयाब रहे.
दोपहर में मशहूर अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज भी जंतर-मंतर के पास पहुंचे, लेकिन पुलिस ने उन्हें वहां धरने पर नहीं बैठने दिया.
दिनभर की कार्रवाई के बावजूद शाम तक कनॉट प्लेस और जंतर-मंतर के आसपास प्रदर्शनकारी दिखाई देते रहे. वे छोटे-छोटे समूहों में पहुंच रहे थे और पुलिस के आने पर वहां से हट जा रहे थे.
लेकिन इस प्रदर्शन का असर सिर्फ़ प्रदर्शनकारियों तक सीमित नहीं रहा.
अस्पतालों से लौट रहे बुज़ुर्गों, महिलाओं और बच्चों को घर जाने के लिए बसें और ऑटो नहीं मिल रहे थे.
रेलवे स्टेशन पर यात्री अपनी ट्रेनों के बारे में जानकारी मिलने का इंतज़ार कर रहे थे. मोबाइल इंटरनेट पर पाबंदी के कारण ऐप से कैब बुक करने और यूपीआई से भुगतान करने में भी परेशानी हो रही थी.
तो पूरे दिन दिल्ली में क्या हुआ? पुलिस की कार्रवाई के बावजूद प्रदर्शनकारी कहां-कहां पहुंचे? और इस प्रदर्शन का आम लोगों पर क्या असर पड़ा?
बीबीसी के पांच संवाददाताओं ने दिल्ली के अलग-अलग इलाक़ों में जाकर हालात का जायज़ा लिया. उन्होंने जो देखा और जिन लोगों से बात की, उनकी रिपोर्ट के आधार पर पढ़िए दिनभर का हाल.
सुबह से ही जंतर-मंतर के आसपास भारी बैरिकेडिंग

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बीबीसी संवाददाता विष्णुकांत तिवारी सुबह साढ़े छह बजे जंतर-मंतर के लिए निकले थे. उन्हें पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन तक पहुंचने में ही लगभग दो घंटे लग गए.
यह पुलिस स्टेशन जंतर-मंतर के आसपास ही है. वहाँ हज़ारों की संख्या में पुलिस और सुरक्षाबल मौजूद थे.
इसके बाद वह कनॉट प्लेस के इलाक़े में पहुंचे. इंद्रपुरी, रीगल सिनेमा और आसपास के इलाक़ों में उन्होंने दिनभर रिपोर्टिंग की.
विष्णुकांत बताते हैं कि सीजेपी ने प्रदर्शन का आह्वान किया था, लेकिन लोगों के लिए प्रदर्शन स्थल तक पहुंचना मुश्किल हो रहा था.
सुबह लगभग 11 से 12 बजे के बीच प्रदर्शनकारी छोटे-छोटे समूहों में पहुंचने लगे. इनमें कई समूह आठ से दस लोगों के थे.
उस समय तक इलाक़े में हज़ारों सुरक्षाकर्मी तैनात थे.
विष्णुकांत के मुताबिक़, जैसे ही प्रदर्शनकारी पहुंचते, पुलिस उन्हें एक-एक करके बसों में भरकर हिरासत में लेती और इलाक़े से बाहर ले जाती.
इस दौरान कई बार खींचातानी हुई. कुछ लोगों को जबरन उठाकर भी ले जाया गया.
विष्णुकांत ने वहां मौजूद लोगों से बातचीत भी की.
उनके मुताबिक़, कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि सीजेपी के प्रदर्शन के विरोध में एक दूसरा समूह भी प्रदर्शन कर रहा था, लेकिन पुलिस उस समूह के ख़िलाफ़ किसी तरह की कार्रवाई नहीं कर रही थी.
वहीं, सीजेपी के प्रदर्शन के समर्थन में पहुंचने वाले लोगों को हिरासत में लेकर बसों से बाहर ले जाया जा रहा था.
हालांकि, दिन बढ़ने के साथ हालात कुछ बदले.
सुबह के मुक़ाबले बाद में प्रदर्शनकारी कनॉट प्लेस के इलाक़े में थोड़ी ज़्यादा संख्या में पहुंचने लगे. अलग-अलग हिस्सों में उनके समूह दिखाई देने लगे.
सड़कों पर कैसा रहा प्रदर्शन

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बीबीसी संवाददाता दिलनवाज़ पाशा ने सुबह से ही दिल्ली में जगह-जगह बैरिकेड्स, पुलिस की दौड़ती गाड़ियां और लोगों को हिरासत में लिए जाने के दृश्य देखे.
सुबह साढ़े दस बजे अभिजीत, सौरव दास और आशुतोष रांका को विमान से ही हिरासत में ले लिया गया.
दिलनवाज़ उस समय एयरपोर्ट पर मौजूद थे.
वहां इन लोगों के कई साथी कार्यकर्ता भी पहुंचे हुए थे. हिरासत में लिए जाने की ख़बर मिलने के बाद वे सभी उदास दिखाई दिए.
इसके बाद दोपहर करीब डेढ़ बजे नेहा बोरा सैकड़ों कार्यकर्ताओं के साथ आईएनए मार्केट से सफ़दरजंग की तरफ़ बढ़ीं.
उन्होंने करीब एक घंटे तक प्रदर्शन किया. इसके बाद उन्हें भी हिरासत में ले लिया गया.
बीबीसी से बातचीत में नेहा बोरा ने कहा कि वह दोबारा सड़कों पर दिखाई देंगीं.
दिलनवाज़ इसके बाद सेंट्रल दिल्ली के राजीव चौक आउटर सर्कल पहुंचे.
वह बताते हैं कि वहां तक पहुंचने के लिए उन्हें छह-सात बैरिकेड्स पार करने पड़े. कई जगह प्रेस कार्ड और क्रेंडेशियल दिखाने पड़े.
आम लोगों को उस इलाक़े में पहुंचने नहीं दिया जा रहा था.
इसके बावजूद दूसरी तरफ़ सैकड़ों प्रदर्शनकारी नारेबाज़ी कर रहे थे. दिलनवाज़ ने वहां भी कई लोगों को हिरासत में लिए जाते देखा.
उनके मुताबिक़, 10 अक्टूबर को चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ हो रहे प्रदर्शन में शामिल होने वाले अधिकतर लोगों को हिरासत में ले लिया गया था.
हालांकि, दिल्ली पुलिस ने कुल कितने लोगों को हिरासत में लिया, इसकी कोई आधिकारिक जानकारी उस समय तक बीबीसी के पास नहीं थी.
इस दौरान कई पत्रकारों और कंटेंट क्रिएटर्स को भी हिरासत में लिया गया.
इमरजेंसी एग्ज़िट खोलकर भाग निकले

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बीबीसी संवाददाता राघवेंद्र राव सुबह आठ बजे के आसपास जंतर-मंतर से कुछ दूरी पर पहुंच गए थे.
उन्होंने बताया कि सुबह के शुरुआती तीन-चार घंटे शांतिपूर्वक बीते.
इसकी एक बड़ी वजह जंतर-मंतर की तरफ़ आने वाली सड़कों पर भारी बैरिकेडिंग थी. इसके कारण प्रदर्शनकारी वहां तक नहीं पहुंच पा रहे थे.
राघवेंद्र राव कनॉट प्लेस के आउटर सर्कल में मौजूद थे.
उनके मुताबिक़, सुबह से ही वहां लोगों की धरपकड़ जारी थी. पुलिस समय-समय पर इक्का-दुक्का प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले रही थी.
लेकिन बाद में प्रदर्शनकारियों के एक बड़े समूह ने प्रदर्शन करने की कोशिश की.
वे पास की सड़क पर कुछ देर के लिए धरने पर बैठ गए.
हालांकि, यह धरना ज़्यादा देर तक नहीं चला.
पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की और प्रदर्शनकारियों को बसों में भरकर वहां से ले जाने की कोशिश की.
इसी दौरान एक और घटना हुई.
जिस बस में कई प्रदर्शनकारियों को ले जाया जा रहा था, उसका पिछला इमरजेंसी एग्ज़िट खोलकर कई प्रदर्शनकारी बस से उतर गए और भागने में कामयाब रहे.
मशहूर अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज को धरने पर बैठने नहीं दिया
दोपहर में मशहूर अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज जंतर-मंतर के दूसरे एंट्री पॉइंट के पास पहुंचे.
उनके हाथ में एक पोस्टर था.
इस पर चुनाव आयोग, ज्ञानेश कुमार और एसआईआर की प्रक्रिया के बारे में कुछ नारे लिखे थे.
ज्यां द्रेज इस पोस्टर को लहराना चाहते थे और वहां धरने पर बैठना चाहते थे.
लेकिन पुलिस ने उन्हें वहां बैठने नहीं दिया.
राघवेंद्र राव के मुताबिक़, सात-आठ पुलिसकर्मियों ने उन्हें वहां से उठाकर एक बस में बैठाया.
उनके साथ मौजूद कुछ महिला एक्टिविस्ट और प्रदर्शनकारियों को भी उस समय वहां से हटा दिया गया.
दोपहर तक सीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को हिरासत में लिए जाने के बाद यह आशंका जताई जा रही थी कि शायद अब प्रदर्शनकारी वहां नहीं पहुंचेंगे.
लेकिन शाम तक ऐसा होता दिखाई नहीं दिया.
शाम के लगभग साढ़े पांच बजे भी प्रदर्शनकारी कनॉट प्लेस के आसपास मौजूद थे.
राघवेंद्र राव के मुताबिक़, लोग कुछ देर के लिए आते, प्रदर्शन करते और जैसे ही उन्हें लगता कि पुलिस उन्हें पकड़ने आ रही है, वे वहां से भाग जाते.
यात्री परेशान, ट्रेनों की जानकारी का इंतज़ार

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प्रदर्शन और सुरक्षा व्यवस्था का असर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भी दिखाई दिया.
बीबीसी संवाददाता सिद्धनाथ गनु सुबह करीब दस बजे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचे.
वहां कई लोग अपनी ट्रेनों का इंतज़ार कर रहे थे. कुछ यात्री यह जानने की कोशिश कर रहे थे कि उनकी ट्रेन चलेगी भी या नहीं.
सिद्धनाथ के मुताबिक़, उस समय तक स्टेशन के सूचना बोर्ड पर लगभग दस से बारह ट्रेनों के रद्द होने की जानकारी आ चुकी थी.
लेकिन कई दूसरी ट्रेनों के बारे में कोई सूचना नहीं मिल रही थी.
स्टेशन पर उनकी मुलाक़ात बिहार से आए एक युवक से हुई.
यह युवक सुबह पांच बजे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गया था. उसे वहां से करोल बाग जाना था, जो स्टेशन से काफ़ी नज़दीक है.
लेकिन उसे वहां जाने के लिए कोई साधन नहीं मिल रहा था.
ऑटो चालकों का कहना था कि आगे बैरिकेडिंग है, इसलिए वे नहीं जा सकते.
वहीं, कैब चालक बहुत कम दूरी के लिए भी काफ़ी ज़्यादा पैसे मांग रहे थे.
मोबाइल इंटरनेट पर पाबंदी के कारण ऐप के ज़रिए कैब बुक करना भी संभव नहीं हो पा रहा था.
सिद्धनाथ ने स्टेशन के बाहर कुछ ऐसे बाइक राइडर्स भी देखे, जो आमतौर पर ऐप आधारित सेवाओं के ज़रिए सवारी ले जाते हैं.
ये राइडर्स स्टेशन के आसपास चक्कर लगा रहे थे और लोगों से पूछ रहे थे कि उन्हें कहां जाना है.
वे यात्रियों को किराया बता रहे थे और कई लोग उनसे मोलभाव कर रहे थे.
स्टेशन पर सिद्धनाथ की मुलाक़ात एक ऐसे परिवार से भी हुई, जिसे बिहार जाना था.
उनकी ट्रेन आने में अभी चार घंटे बाक़ी थे.
परिवार ने बताया कि रास्ते में भीड़ मिलने की आशंका के कारण वे समय से पहले स्टेशन पहुंच गए थे.
लेकिन स्टेशन पहुंचने के बाद उन्हें यह पता नहीं चल पा रहा था कि उनकी ट्रेन चलेगी भी या नहीं.
कुछ यात्री हावड़ा एक्सप्रेस का इंतज़ार कर रहे थे.
उन्होंने भी बताया कि ऐप पर कोई अपडेट नहीं मिल रहा था. ट्रेन रद्द हुई है, देरी से चलेगी या समय पर आएगी, इसकी जानकारी नहीं थी.
सिद्धनाथ के मुताबिक़, सुबह तक आई मीडिया रिपोर्टों में बताया गया था कि नई दिल्ली और निज़ामुद्दीन स्टेशनों से जुड़ी दो सौ से ज़्यादा ट्रेनें रद्द हो चुकी थीं.
उन्होंने ख़ुद स्टेशन के सूचना बोर्ड पर दर्जनों ट्रेनों के रद्द होने की जानकारी देखी.
स्टेशन पर बड़ी संख्या में यात्री इस असमंजस में बैठे थे कि उनकी आगे की यात्रा का क्या होगा.
बुजुर्ग और छोटे दुकानदार परेशान

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बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित ने साथी पत्रकार दीपक जसरोटिया के साथ नोएडा से जंतर-मंतर तक के सफ़र के दौरान लोगों को हो रही परेशानियों को देखा.
जुगल बताते हैं कि प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस के बर्ताव की तस्वीरें तो सामने आईं, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम की एक दूसरी कहानी आम लोगों की परेशानियों की भी है.
सफ़र के दौरान उन्होंने देखा कि अस्पतालों से बुज़ुर्ग, महिलाएं और बच्चे बाहर आ रहे थे, लेकिन उनके पास घर जाने का कोई साधन नहीं था.
न ऑटो मिल रहे थे और न ही बसें.
जुगल की मुलाक़ात बस स्टॉप पर कुछ वरिष्ठ नागरिकों से हुई.
उन्होंने बताया कि वे डेढ़ घंटे से बस का इंतज़ार कर रहे थे, लेकिन कोई बस नहीं आ रही थी.
इन लोगों को आशंका थी कि आगे उन्हें लगभग दस से बारह किलोमीटर पैदल चलना पड़ सकता है.
कुछ बुज़ुर्ग ऐसे भी थे जिन्हें ऑटो नहीं मिल रहे थे.
जुगल पुरोहित और दीपक जसरोटिया को रास्ते में ऐसे कई लोग मिले.
इस दौरान छोटे दुकानदारों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा.
जुगल के मुताबिक़, कुछ दुकानदारों ने अपनी दुकानें खोल रखी थीं.
उनके पास ग्राहक भी आ रहे थे, हालांकि उनकी संख्या कम थी. लेकिन एक दूसरी परेशानी भी थी.
ग्राहकों के पास नक़द पैसे नहीं थे. अब बहुत से लोगों को नक़द रखने की आदत नहीं रही है.
वहीं, जंतर-मंतर और आसपास के इलाक़ों में मोबाइल इंटरनेट बंद होने के कारण यूपीआई से भुगतान नहीं हो पा रहा था.
दुकानदारों ने बताया कि उन्होंने दुकानें तो खोली थीं, लेकिन पहले ही ग्राहक कम आ रहे थे और जो आ भी रहे थे, वे भुगतान नहीं कर पा रहे थे.
जुगल का कहना है कि ये सिर्फ़ कुछ ऐसी परेशानियां थीं जिन्हें वे अपने सफ़र के दौरान देख पाए.
उनके मुताबिक़, सामान्य लोगों को इससे अलग भी कई तरह की परेशानियां हुई होंगी, जिन्हें वे पूरी तरह दर्ज नहीं कर पाए.
जुगल ने यह सवाल भी उठाया कि प्रदर्शन के कारण आम लोगों को जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ा, उन्हें दूर करने के लिए सरकार के पास क्या रणनीति और क्या जवाब है.
शाम तक जारी रहा प्रदर्शन, लेकिन जंतर-मंतर पहुंचना मुश्किल

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सुबह से शाम तक बीबीसी के संवाददाताओं ने दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में जो देखा, उससे प्रदर्शन और पुलिस की कार्रवाई की कई तस्वीरें सामने आईं.
सुबह जंतर-मंतर की ओर जाने वाली सड़कों पर भारी बैरिकेडिंग के कारण प्रदर्शनकारियों का वहां पहुंचना मुश्किल था.
कुछ लोगों को एयरपोर्ट से हिरासत में लिया गया. आईएनए मार्केट से सफ़दरजंग की ओर बढ़े प्रदर्शनकारियों को भी हिरासत में लिया गया.
कनॉट प्लेस में छोटे-छोटे समूहों में पहुंचने वाले प्रदर्शनकारियों को पुलिस बसों में बैठाकर ले जाती रही.
लेकिन इन कार्रवाइयों के बावजूद प्रदर्शन पूरी तरह बंद नहीं हुआ.
कुछ प्रदर्शनकारी बस का इमरजेंसी एग्ज़िट खोलकर भाग निकले. कुछ ने सड़क पर बैठकर धरना देने की कोशिश की.
शाम के लगभग साढ़े पांच बजे तक कनॉट प्लेस के आसपास प्रदर्शनकारी दिखाई दे रहे थे.
इस तरह पुलिस जंतर-मंतर के आसपास प्रदर्शनकारियों की पहुंच रोकने और उन्हें हिरासत में लेने की कार्रवाई करती रही, जबकि प्रदर्शनकारी अलग-अलग समूहों में पहुंचकर अपना विरोध दर्ज कराने की कोशिश करते रहे.
इस बीच आम लोगों को आवाजाही, रेल यात्रा और डिजिटल भुगतान में मुश्किलों का सामना करना पड़ा.
दिल्ली पुलिस ने कुल कितने लोगों को हिरासत में लिया, इसकी आधिकारिक जानकारी बीबीसी को उस समय तक नहीं मिल पाई थी.
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