दिल्ली में प्रदर्शन पर कार्रवाई को लेकर विशेष सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

- Author, विनीत भल्ला
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को एक सुनवाई में कहा कि क़ानून के मुताबिक़ शहर में लोगों की निर्बाध आवाजाही की अनुमति होगी. साथ ही, क़ानून में निर्धारित प्रक्रिया के अलावा किसी को हिरासत में नहीं लिया जाएगा.
जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की दो-सदस्यीय बेंच ने कहा कि बीएनएसएस की धारा 163 लागू होने वाले क्षेत्र के बाहर लोगों को एकत्र होने का अधिकार होगा.
कोर्ट ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आस पास के इलाक़े में धारा 163 के लागू होने की चेतावनी वाले बोर्ड को तुरंत हटा लिया जाए ताकि न्याय पाने के लिए लोगों की पहुंच को सुनिश्चित किया जा सके.
दिल्ली में शनिवार को हुए प्रदर्शनों का नेतृत्व कॉकरोच जनता पार्टी और वामपंथी छात्र संगठनों के कार्यकर्ताओं ने किया था.
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों से मंगलवार तक अनुपालन रिपोर्ट और हिरासत में लिए गए लोगों का विवरण मांगा है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

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सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ये अहम बातें कहीं -
- मेट्रो और रेल सामान्य रूप से चलें, जब तक कि क़ानून के तहत इन्हें रोकना ज़रूरी न हो
- क़ानून-व्यवस्था, यातायात और अनुच्छेद 19(2) के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए बैरिकेड लगाने की व्यवस्था की समीक्षा की जाए
- क़ानून के तहत इंटरनेट सर्विस बाधित नहीं की जाएगी
- क़ानून की ओर से निर्धारित प्रक्रिया के अलावा किसी को हिरासत में नहीं लिया जाएगा
- बीएनएसएस की धारा 163 लागू होने वाले क्षेत्र के बाहर लोगों को एकत्र होने का अधिकार होगा
- सुप्रीम कोर्ट या किसी अन्य अदालत में न्याय पाने के लिए व्यक्तिगत रूप से पहुंचने से किसी को नहीं रोका जाएगा
लाइव लॉ के अनुसार, सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ऑफ़ इंडिया तुषार मेहता ने कोर्ट में कहा, "कल रात 10 बजे से मेट्रो रेल सेवा पूरी तरह चालू है और सभी स्टेशन खुले हैं. ट्रेनें सामान्य रूप से चल रही हैं और इंटरनेट कनेक्शन भी बहाल कर दिया गया है."
बहस के दौरान याचिकाकर्ताओं की दलील

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राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के सांसद मनोज झा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि पुलिस ट्रेनों से लोगों को उठा रही थी. जंतर-मंतर से 4 किलोमीटर के दायरे से बाहर मौजूद लोगों को भी हिरासत में लिया जा रहा था.
उन्होंने यह भी कहा, "इलाके में इंटरनेट सेवा बंद थी. इसके अलावा, अदालत के आदेश के बावजूद 45 मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए थे."
वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने अदालत को बताया कि प्रदर्शन के दौरान कल उनके साथ भी पुलिस ने दुर्व्यवहार किया.
उन्होंने कहा, "सवाल सिर्फ़ वकीलों का नहीं है. वकील होने के नाते हमें कोई विशेष अधिकार नहीं मिले हैं. कल शहर में हालात बेहद दमनकारी थे. किसी व्यक्ति को वहां खड़े रहने तक की अनुमति नहीं थी. मुझे हिरासत में लेने के बाद चलती बस में फेंक दिया गया. यह नागरिकों के प्रदर्शन करने के अधिकार का मामला है. कल मुझे लगा कि हम पुलिस राज से बस एक कदम दूर थे. कृपया राजधानी में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के नागरिकों के अधिकार को बहाल करें. कल इस अधिकार को ख़त्म कर दिया गया."
वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने कहा, "हालात ऐसे हैं कि वकील शहर में स्वतंत्र रूप से घूम भी नहीं सकते. उन्होंने कहा कि तस्वीरें खुद ही पूरी स्थिति बयां करती हैं."
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कई वीडियो का हवाला देते हुए कहा कि उनके बोलने के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट के बाहर बीएनएस की धारा 163 लागू थी.
उन्होंने कहा, "यह चौंकाने वाला है. जिस तरह की हिंसा की जा रही है, उसमें यह सवाल ही नहीं है कि कार्रवाई उचित अनुपात में थी या नहीं. सबसे पहले यह देखना ज़रूरी है कि इसकी ज़रूरत थी भी या नहीं. निहत्थे बच्चों को पीटना और उन्हें पैर से मारना. उनके साथ बेवजह धक्का-मुक्की करना. हमें कई वीडियो मिल रहे हैं. ये लोग इसे बहादुरी के तमगे की तरह दिखा रहे हैं. इस घटना ने हम सभी के भीतर कई तरह की भावनाएं पैदा की हैं. यह मामला हमारे दरवाजे तक आ पहुंचा है."
उन्होंने मांग की कि लोगों की आवाजाही पूरी तरह बहाल की जाए, सभी बैरिकेड हटाए जाएं और मेट्रो स्टेशनों को फिर से खोलने का निर्देश दिया जाए.
उन्होंने कहा, "उनका मानना है कि 47 मेट्रो स्टेशन बंद रखना ठीक है. उन्होंने ट्रेनों की व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं किया. इस मामले में ज़िम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होनी चाहिए. बिना नेम बैज वाले पुलिसकर्मियों को इसकी अनुमति नहीं दी जानी चाहिए थी. मैंने पहले भी यह मुद्दा उठाया था और मामला समिति के पास गया है. जो लोग ज़िम्मेदार हैं, उन्हें जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए."
वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने कहा कि न्याय तक पहुंच का मतलब वकीलों तक पहुंच भी है. अगर वकीलों को अपना काम करने से रोका जाता है, तो इससे सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट की गरिमा प्रभावित होती है.
हेगड़े ने कहा, "सॉलिसिटर जनरल बार के नेता हैं. उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर वकील अपने मुवक्किल तक पहुंच सके और पुलिस थानों में उसे क़ानूनी सहायता दे सके. कल पुलिस थानों में वकीलों को पीटा गया. पुलिसकर्मियों ने वकीलों को एफ़आईआर दर्ज करने की धमकी दी."
एक महिला वकील ने अदालत को बताया कि वह करीब 150 अन्य वकीलों के साथ शांतिपूर्वक पैदल चल रही थीं. इसी दौरान उनमें से चार को हिरासत में लेकर पुलिस की वैन में बैठा दिया गया.
उन्होंने कहा कि एक महिला पुलिसकर्मी उन्हें धक्का दे रही थी और उनके साथ धक्का-मुक्की कर रही थी. उन्हें एक पल के लिए भी रुकने नहीं दिया गया.
महिला वकील ने कहा, "पुलिसकर्मियों ने नेम बैज नहीं लगाए थे. अगर हिंसा हुई होती, तो कार्रवाई की जा सकती थी. लेकिन हम शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे थे."
वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने कहा कि इस मामले में चिंता नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़ी है. उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों के पक्ष में है.
तृणमूल कांग्रेस की सांसद ने दायर की है याचिका

अदालत ने रविवार की विशेष सुनवाई के लिए दो मामले सूचीबद्ध किए.
पहला मामला बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका का है. यह एक क़ानूनी प्रक्रिया है, जिसके तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अदालत के सामने पेश करने और उसकी हिरासत की वैधता की जांच करने का अनुरोध किया जाता है.
तृणमूल कांग्रेस की सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने यह याचिका दायर की थी.
इसमें विपक्ष के कई नेताओं को एहतियातन हिरासत में लेने को चुनौती दी गई है. इनमें चार पूर्व मुख्यमंत्री शामिल हैं.
ये हैं पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री माणिक सरकार.
याचिका में कहा गया है कि पुलिस शांतिपूर्ण प्रदर्शन के मौलिक अधिकार को दबाने के लिए नेताओं को उनके आवास से मनमाने ढंग से हिरासत में नहीं ले सकती.
बहस के दौरान गुरुस्वामी ने कोर्ट में कहा, "करीब 7,000 लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरें सामने आई हैं, लेकिन राज्य सरकार कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं दे रही है."
उन्होंने कहा, "पूरी दिल्ली में 45 हिरासत केंद्र बनाए जाने की ख़बर है. विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिया गया. सांसदों को उनके घरों में बैरिकेड लगाकर रोक दिया गया. यह उचित नहीं है."
"संविधान के अनुच्छेद 358 में कहा गया है कि आपातकाल लागू होने पर अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाले अधिकारों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है. क्या राज्य सरकार यह कह रही है कि देश में अघोषित आपातकाल लागू है?"
दूसरा मामला अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दायर अदालत की अवमानना याचिका है. अवमानना याचिकाएं तब दायर की जाती हैं, जब अधिकारियों पर अदालत के आदेश की अवहेलना करने का आरोप लगाया जाता है.
त्रिपाठी का आरोप है कि दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष समेत अन्य अधिकारियों ने शनिवार को सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का उल्लंघन किया, जिसमें सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह बंद करने पर स्पष्ट रूप से रोक लगाई गई थी.
त्रिपाठी का आरोप है कि इस आदेश के बावजूद प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए 45 मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश द्वार बंद कर दिए गए.

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एक याचिका राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के सांसद मनोज झा ने भी दायर की थी. उन्होंने अदालत से शनिवार को पुलिस की कार्रवाई को अवैध घोषित करने की मांग की थी.
दूसरी याचिका अधिवक्ता अमन प्रसाद की ओर से दायर अवमानना याचिका थी, जिसमें दिल्ली पुलिस पर बिना भेदभाव के लोगों पर हिंसा करने का आरोप लगाया गया है.
प्रसाद की याचिका में आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने अनिवार्य नेम टैग नहीं पहने थे, निहत्थे नागरिकों की पिटाई की और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया.
याचिका में विशेष रूप से एक महिला को बालों से पकड़कर घसीटने और हिरासत में ले जाने के लिए बस में डालने की घटना का उल्लेख किया गया है.
इसमें रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को गैरक़ानूनी रूप से हिरासत में लेने की घटनाओं का भी जिक्र किया गया है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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