आर्टेमिस-2 के यात्री धरती से चार लाख किलोमीटर दूर पहुंचे, वहां से उन्होंने क्या-क्या देखा?

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आर्टेमिस-2 के अंतरिक्ष यात्री चांद के बिल्कुल क़रीब पहुंचने और अपने स्पेसक्राफ़्ट से पूर्ण सूर्यग्रहण देखने के बाद अब पृथ्वी की ओर लौट रहे हैं.
इस मून मिशन में शामिल अंतरिक्ष यात्री धरती पर शनिवार सुबह करीब साढ़े पांच बजे (भारतीय समयानुसार) लौटेंगे.
मिशन पर गए अंतरिक्ष यात्री कमांडर रीड वाइज़मैन ने कहा कि इस मिशन में शामिल ओरायन स्पेसक्राफ़्ट के चालक दल ने 'ऐसे नज़ारे देखे, जिन्हें आज तक किसी इंसान ने कभी नहीं देखा.'
वहीं एक और अंतरिक्ष यात्री पायलट विक्टर ग्लोवर ने कहा कि उन्होंने जो देखा, उसे बयान करने के लिए 'शब्द ही नहीं हैं.'
अपनी इस यात्रा के दौरान ये स्पेसक्रॉफ़्ट पृथ्वी से 2,52,756 मील (4,06,771 किलोमीटर) तक पहुंच गया. ये अंतरिक्ष में इंसानों की तय की गई अब तक की सबसे ज़्यादा दूरी है.
चांद के पीछे पहुंचने के बाद अंतरिक्ष यात्रियों का नासा से संपर्क टूट गया था.
संपर्क क़रीब 40 मिनट तक टूटा रहा. हालाँकि इसकी संभावना पहले ही जता दी गई थी.
जब संपर्क दोबारा स्थापित हुआ तो मिशन विशेषज्ञ क्रिस्टीना कोच ने अंतरिक्षयान से सन्नाटा तोड़ते हुए कहा, "पृथ्वी से फिर से आवाज़ सुनना बहुत शानदार है."
ट्रंप ने की अंतरिक्ष यात्रियों से बात

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी अंतरिक्ष यात्रियों से बात की.
उन्होंने कहा, "आप लोगों ने इतिहास रच दिया है और पूरे अमेरिका को गर्व महसूस कराया है."
उन्होंने अंतरिक्ष यात्रियों को व्हाइट हाउस आने का निमंत्रण भी दिया.
अंतरिक्ष यात्री शुक्रवार को ईस्टर्न अमेरिकी टाइम के मुताबिक़ रात 8:07 बजे ( भारतीय समय के मुताबिक़ शनिवार सुबह 5 बजकर 37 मिनट) धरती पर लौटेंगे. उनके अमेरिका के पश्चिमी तट के पास प्रशांत महासागर में स्प्लैशडाउन (गिरने) करने की उम्मीद है.
कितने सुरक्षित हैं अंतरिक्ष यात्री

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नासा के रिटायर्ड अंतरिक्ष यात्री टेरी वर्ट्स कहते हैं कि शटल के चालक दल को चांद की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का इस्तेमाल करते हुए उसकी परिक्रमा करनी पड़ी. टेरी वर्ट्स अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के कमांडर रह चुके हैं.
उन्होंने कहा, "वे अंतरिक्ष में बहुत दूर हैं, अगर उनकी ज़िंदगी पर कोई ख़तरा मंडराता है तो उन्हें बचाने का कोई रास्ता नहीं है. वहां उन्हें बेहद तेज़ रेडिएशन (विकिरण) का सामना करना पड़ रहा है, जो पृथ्वी पर मौजूद ही नहीं है और उस पतली एल्युमिनियम परत के कुछ मिलीमीटर बाहर ही उनके लिए तुरंत मौत मंडरा रही है."
वो आगे कहते हैं, "पूरा 10 दिन का मिशन सुरक्षित तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन आज कुछ ख़ास नहीं हुआ. आज बस इतना हुआ कि ये कैप्सूल चांद के पास से गुज़रा."
टेरी वर्ट्स के मुताबिक़ उन्होंने चांद के गुरुत्वाकर्षण के ज़रिए अपनी उड़ान की दिशा को लगभग 180 डिग्री मोड़ लिया ताकि उनका स्पेसक्रॉफ़्ट उन्हें वापस पृथ्वी की ओर ले आए.
उन्होंने मज़ाकिया लहज़े में कहा, "सर आइज़ैक न्यूटन यहां कमान संभाले हुए हैं- अब गुरुत्वाकर्षण ही कैप्सूल को दिशा दे रहा है."
बीबीसी की साइंस एडिटर रेबेका मोरेल ने इस मिशन के बारे में नासा की विज्ञान प्रमुख डॉ. निकोला फॉक्स से बात की.
उन्होंने कहा कि मिशन कंट्रोल में साइंस टीम के लिए यह दिन शानदार तो था लेकिन बेहद व्यस्त भी रहा.
अंतरिक्ष यात्रियों ने मिशन के इस हिस्से की तैयारी में कई साल लगाए हैं.
उन्होंने नासा की टीम के साथ मिलकर लूनर साइंस का गहराई से अध्ययन किया.
फॉक्स ने कहा कि क्रू ने इस दौरान बेहतरीन काम किया और चंद्रमा से जुड़े कई बेहद अहम इनपुट दिए.
एक सौर वैज्ञानिक होने के नाते वह ख़ास तौर पर ग्रहण को लेकर बेहद उत्साहित थीं.
उन्होंने कहा कि उन्होंने ऐसे कई खगोलीय घटनाक्रम देखे हैं, लेकिन इस बार दिखा यह नज़ारा पृथ्वी से देखे गए किसी भी ग्रहण से बिल्कुल अलग था."
मिशन के बारे में ख़ास बातें

आर्टेमिस-2 मिशन के रॉकेट ने फ़्लोरिडा के केप कैनावेरल स्थित केनेडी स्पेस सेंटर से 1 अप्रैल 2026 को उड़ान भरी थी.
इस मिशन में तीन अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री रीड वाइज़मैन, क्रिस्टीना कोच, विक्टर ग्लोवर और कनाडाई अंतरिक्ष यात्री जेरेमी हेनसेन शामिल हैं.
नासा के आर्टेमिस कार्यक्रम में कई सालों की मेहनत लगी है, हज़ारों लोग इससे जुड़े रहे हैं और अब तक इस पर क़रीब 93 अरब डॉलर ख़र्च हो चुके हैं.
50 साल से भी पहले, अमेरिका के अपोलो मिशनों ने इतिहास रचा था, जब पहली बार इंसान ने चंद्रमा की सतह पर क़दम रखा था.
चांद की ज़मीन देखने में भले ही सूखी, धूल भरी और बंजर लगती हो, लेकिन हक़ीक़त इससे बिल्कुल अलग है.
नेचुरल हिस्ट्री म्यूज़ियम की ग्रह वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर सारा रसेल कहती हैं, "चांद में वही तत्व मौजूद हैं जो हमें धरती पर मिलते हैं."
"मिसाल के तौर पर रेयर अर्थ एलिमेंट्स (दुर्लभ धातुएं), जो धरती पर बहुत कम पाए जाते हैं, चांद के कुछ हिस्सों में शायद इतनी मात्रा में मौजूद हों कि उन्हें निकाला जा सके."
इनमें लोहे और टाइटेनियम जैसी धातुएं भी हैं, और हीलियम भी- जिसका इस्तेमाल सुपरकंडक्टर से लेकर मेडिकल उपकरणों तक, कई चीज़ों में होता है.
लेकिन जिस संसाधन ने सबसे ज़्यादा ध्यान खींचा है, वह सबसे हैरान करने वाला भी है- पानी.
रसेल कहती हैं, "चांद के कुछ खनिजों में पानी फंसा हुआ है, और ध्रुवों पर भी पानी की अच्छी ख़ासी मात्रा मौजूद है."
वह कहती हैं कि वहां ऐसे गड्ढे हैं जो हमेशा छाया में रहते हैं, जहां बर्फ़ जमा हो सकती है.
अगर आप चांद पर रहना चाहते हैं, तो पानी तक पहुंचना बेहद ज़रूरी है. यह न सिर्फ़ पीने के काम आता है, बल्कि इसे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़कर अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सांस लेने की हवा तैयार की जा सकती है, और यहां तक कि अंतरिक्ष यानों के लिए ईंधन भी बनाया जा सकता है.
नासा की नज़र अब मंगल ग्रह पर टिकी है और वह 2030 के दशक तक इंसानों को वहां भेजना चाहता है. लेकिन उसे जिन तकनीकी चुनौतियों से पार पाना है, उन्हें देखते हुए यह समयसीमा काफ़ी महत्वाकांक्षी कही जा सकती है.
लेकिन कहीं न कहीं से शुरुआत तो करनी ही होती है, और अमेरिका ने तय किया है कि वह शुरुआत चांद से करेगा. इसी कड़ी में आर्टेमिस-2 मिशन बेहद अहम है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित




































