आज़ाद भारत में पहला चुनाव और चुनाव आयोग के बनने की कहानी

भारत के पहले आम चुनाव 1952 में वोट डालने वालीं वांगीपुरापू सावित्रीम्मा
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साल 1947 के 14-15 अगस्त की मध्यरात्रि को भारत को आज़ादी मिली. भारत की जनता इस लम्हे का एक लंबे समय से इंतजार कर रही थी. आज़ादी के बाद देश के सामने कई सपनों को साकार करने की चुनौतियां थीं.

सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि किस तरह से आज़ादी के बाद देश का शासन लोकतांत्रिक सरकार के ज़रिए चलाया जाएगा, जो सभी लोगों के हितों के लिए काम करेगी.

ऐसा करना आसान काम नहीं था. जिस तरह से भारत को आज़ादी मिली, शायद ही वैसे कोई दूसरा देश आज़ाद हुआ हो.

भारत आज़ाद तो हुआ, लेकिन बंटवारे के साथ. इस बंटवारे में देश ने अभूतपूर्व हिंसा और विस्थापन का एक दौर देखा. इन मुश्किल हालात में आज़ाद भारत को अपने सपनों को हासिल करने की यात्रा शुरू करनी पड़ी.

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सभी लोगों को वोट देने का अधिकार

आम चुनाव
इमेज कैप्शन, पहले आम चुनाव में वोटिंग के लिए एक बुज़ुर्ग को अपनी पीठ पर लादकर मतदान केंद्र पहुंचाता युवक

भारत ने आज़ाद होने के बाद उस रास्ते को नहीं चुना, जिसे पश्चिमी देशों ने चुना था. पश्चिमी देशों में एक लंबे समय तक कुछ अमीर लोगों के पास ही मतदान का हक़ था और कामगारों और महिलाओं को वोट देने के अधिकार से वंचित रखा गया था.

आज़ाद भारत ने वयस्क मताधिकार के आधार पर आम चुनाव करवाने का फ़ैसला किया.

यह एक अभूतपूर्व फ़ैसला था, जिसकी बदौलत नए भारत की किस्मत तय होनी थी.

आज़ादी से पहले केवल सीमित संख्या में लोगों को वोट देने का अधिकार दिया गया था. उस समय, वोट देने की योग्यताएं इस तरह से तय की गई थीं कि केवल धनी ज़मींदारों और व्यापारियों के पास ही वोट देने का अधिकार था.

आज़ाद होने के दो सालों के भीतर भारत में चुनाव आयोग की स्थापना हुई और मार्च, 1950 में सुकुमार सेन को पहला मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया.

कौन थे सुकुमार सेन?

भारत के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन
इमेज कैप्शन, भारत के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन

अंग्रेज़ी अख़बार द टेलीग्राफ के मुताबिक, सुकुमार का जन्म 2 जनवरी, 1899 में हुआ था. उनके पिता अक्षय कुमार सेन एक नौकरशाह थे.

सेन ने कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज से गणित में ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की और फिर आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए लंदन यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया. यहां उन्हें गणित में गोल्ड मेडल से भी सम्मानित किया गया.

साल 1921 में, सेन ने भारतीय सिविल सेवा जॉइन की. फिर अगले ढाई दशकों तक, सेन ने पूरे भारत में अलग-अलग पदों पर न्यायपालिका में काम किया. साल 1947 में, सेन को पश्चिम बंगाल का मुख्य सचिव नियुक्त किया गया, जहां उनकी मुलाकात वरिष्ठ कांग्रेसी नेता डॉ. बिधान चंद्र रॉय से हुई.

बीसी रॉय ही सुकुमार सेन को भारत के पहले चुनाव आयुक्त के रूप में पदभार संभालने के लिए दिल्ली ले गए थे.

नियुक्त होने के अगले महीने में ही जनप्रतिनिधि कानून संसद में पारित कर दिया गया. जिसके बाद, भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अगले बसंत तक देश में चुनाव कराने की इच्छा ज़ाहिर की.

पहले चुनाव में आई चुनौतियां

पहले आम चुनाव के दौरान वोटिंग
इमेज कैप्शन, पहले आम चुनाव के दौरान काफ़ी चुनौतियों का सामना चुनाव आयोग ने किया
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इतने कम समय में भारत जैसे बड़े देश में चुनाव करवाना एक मुश्किल काम था. भारत में हुए पहले आम चुनाव में करीब 17 करोड़ लोगों ने हिस्सा लिया, जिसमें 85 फ़ीसदी लोग न तो पढ़ सकते थे और न लिख सकते थे. कुल मिलाकर करीब 4500 सीटों के लिए चुनाव हुआ था, जिसमें 499 सीटें लोकसभा की थीं.

सुकुमार सेन के सामने कई तरह की चुनौतियां थीं. जैसे ज़्यादातर अशिक्षित मतदाताओं के लिए पार्टी चिन्ह, मतदानपत्र और मतपेटी किस तरह की बनाई जाए?

साथ ही, चुनाव के लिए मतदान केंद्र का भी चयन करना था. इसके अलावा ईमानदार और सक्षम मतदान अधिकारी की भी नियुक्ति करनी थी.

रामचंद्र गुहा अपनी किताब 'इंडिया आफ़्टर गांधी' में लिखते हैं, "उनके सामने सबसे बड़ी समस्या थी महिला मतदाताओं का नाम मतदाता सूची में जोड़ना. बहुत सी महिलाओं को अपना नाम बताने में झिझक थी. वो अपने आप को किसी की बेटी या किसी की पत्नी कहलाना ज़्यादा पसंद करती थीं."

"सुकुमार सेन ने अपने अधिकारियों को निर्देश दिया कि इस तरह के मतदाताओं का ब्यौरा लिखने की जगह कड़ाई से मतदाता का नाम दर्ज करें."

पश्चिमी देशों में मतदाता पढ़े-लिखे होने के कारण राजनीतिक दलों को नाम से पहचान जाते थे, वहीं भारत में मतदाताओं को समझाने के लिए तस्वीरों का सहारा लिया गया.

हर मतदान केंद्र पर मतपेटियां रखी रहती थीं जिस पर पार्टी का चुनाव चिन्ह बना होता था और मतदाताओं को उसमें अपना वोट डालना पड़ता था.

नकली मतदाताओं से बचने के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने ऐसी स्याही बनाई थी, जिसे मतदाताओं की उंगली में लगा दिया जाता था और यह एक हफ्ते तक मिटती नहीं थी.

दुनिया ने पहले भारतीय चुनाव पर क्या कहा?

1952 के पहले आम चुनाव में प्रचार करते प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू
इमेज कैप्शन, 1952 के पहले आम चुनाव में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ज़ोर-शोर से प्रचार किया

भारत का पहला आम चुनाव, पूरी दुनिया में लोकतंत्र के इतिहास के लिए मील का पत्थर साबित हुआ. इसके बाद यह बात साबित हो गई कि दुनिया में कहीं भी लोकतांत्रिक चुनाव कराए जा सकते हैं.

अंग्रेज़ी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, फरवरी 1952 में, जब मतदान ख़त्म हुआ तो भारत में ब्रिटेन के हाई कमिश्नर आर्चीबाल्ड नी ने एक रिपोर्ट लिखी.

इस रिपोर्ट में उन्होंने कहा, "यह चुनाव संसदीय लोकतंत्र के तौर-तरीकों को समझने के लिए एक परीक्षा थी. जिस पर यह देश अच्छी तरह से खरा उतरा है."

रामचंद्र गुहा अपनी किताब 'इंडिया आफ़्टर गांधी' में लिखते हैं, "एक तुर्की पत्रकार ने कहा कि जनता के सामने एक तरफ विकल्प था कि वो वर्चस्ववादी, सांप्रदायिक, अलगाववादी और निरपेक्षवादियों को चुने तो दूसरी तरफ धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीय एकता, आधुनिकता और बाकी दुनिया के साथ भाईचारे के व्यवहार का विकल्प था."

"जनता ने आधुनिकता और तरक्की को चुनकर अपनी परिपक्वता का परिचय दिया और अराजकता को ख़ारिज कर दिया."

आज़ाद भारत के पहले वोटर

आज़ाद भारत के पहले वोटर श्याम शरन नेगी
इमेज कैप्शन, आज़ाद भारत के पहले वोटर श्याम शरन नेगी

भारत के पहले आम चुनाव का पहला वोट 25 अक्तूबर, 1951 को हिमाचल प्रदेश की चीनी तहसील (अब किन्नोर ज़िला) में डाला गया. यह पहला वोट हिमाचल प्रदेश के किन्नोर ज़िले के रहने वाले श्याम शरन नेगी ने डाला था.

उन्होंने पहले आम चुनाव से पहले ही अपना वोट डाल दिया था क्योंकि सर्दियों में बर्फबारी से उनकी घाटी बाकी दुनिया से कट जाती थी. इससे बचने के लिए अधिकारियों ने यह कदम उठाया था.

देश के दूसरे भागों में जनवरी और फरवरी, 1952 में ही मतदान कराया जा सका.

श्याम शरन नेगी चीनी तहसील (अब किन्नोर ज़िला) में एक स्कूल अध्यापक थे और उन्हें पहले चुनाव के दौरान मतदान कराने की ड्यूटी दी गई थी.

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, उनके बेटे चंदेर प्रकाश कहते हैं, "मेरे पिता ने मतदान कराने वाले अधिकारियों से पहले चीनी (अब किन्नौर) में अपना वोट डालने और फिर अपने मतदान केंद्र पर लौट जाने का अनुरोध किया, जहां उन्हें ड्यूटी सौंपी गई थी."

"उनके इस अनुरोध को अधिकारियों ने स्वीकार कर लिया और इस तरह वे देश के पहले मतदाता बन गए."

2022 में 105 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया.

चुनाव आयोग के बनने का सफ़र

निर्वाचन सदन
इमेज कैप्शन, भारत का चुनाव आयोग एक स्थायी संवैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना 25 जनवरी 1950 को संविधान के मुताबिक की गई थी.

भारत में चुनाव संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक होते हैं. साथ ही, संसद द्वारा बनाए गए कानून भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं. इन कानूनों में जनप्रतिनिधि कानून, 1950 और 1951 महत्वपूर्ण है.

भारत का चुनाव आयोग एक स्थायी संवैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना 25 जनवरी 1950 को संविधान के मुताबिक की गई थी.

आज के समय में चुनाव आयोग में तीन सदस्य होते हैं, एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त.

लेकिन 1950 में जब इसकी स्थापना की गई, तब इसमें केवल मुख्य चुनाव आयुक्त ही इसके एकमात्र सदस्य होते थे. ऐसा 1989 तक चलता रहा.

चुनाव आयोग की वेबसाइट के मुताबिक, पहली बार 16 अक्तूबर 1989 को दो अतिरिक्त आयुक्त नियुक्त किए गए लेकिन उनका भी कार्यकाल बहुत कम यानी 1 जनवरी 1990 तक रहा. इसके बाद, 30 सितंबर,1993 तक चुनाव आयोग में केवल एक ही सदस्य यानी मुख्य चुनाव आयुक्त ही रहे.

फिर 1 अक्तूबर, 1993 को दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए. तब से, बहु-सदस्यीय आयोग की अवधारणा चली आ रही है, जहां बहुमत से फ़ैसले लिए जाते हैं.

चुनाव प्रणाली में हुए अहम सुधार

टीएन शेषन
इमेज कैप्शन, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन, जो चुनाव सुधारों के लिए जाने जाते हैं

जब चंद्रशेखर कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने, तो दिसंबर 1990 में टीएन शेषन को 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त की ज़िम्मेदारी सौंपी गई.

भारतीय चुनाव प्रणाली के लिए यह सबसे अहम पल था, क्योंकि शेषन की नियुक्ति के बाद देश ने कई महत्वपूर्ण चुनाव सुधारों को देखा. वह 12 दिसंबर, 1990 से 11 दिसंबर 1996 तक इस पद पर रहे.

उन्होंने फ़र्ज़ी मतदान पर रोक लगाने के लिए फोटो पहचान पत्र या वोटर आईडी कार्ड की शुरुआत की. नेताओं ने उनके इस फ़ैसले का यह कहकर विरोध किया था कि ये भारत जैसे देश के लिए बहुत ख़र्चीली चीज़ है.

उनके कार्यकाल के दौरान ही अक्तूबर 1993 में चुनाव आयोग को एक से ज़्यादा सदस्यों वाला निकाय बनाया गया. उनकी नियुक्ति के बाद, राजनीतिक दल और उम्मीदवार आचार संहिता को गंभीरता से लेने लगे.

2022 में चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में सुधार की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अब तक कई चुनाव आयुक्त रहे हैं, मगर टीएन शेषन जैसा कोई कभी-कभार ही होता है.

राजनेताओं के ख़िलाफ़ कमर कसकर निष्पक्ष और बेदाग़ चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग में जिस कड़े तेवर की शुरुआत टीएन शेषन ने की, उसे जेम्स माइकल लिंगदोह ने और मज़बूत किया.

वह भारत के 12वें मुख्य चुनाव आयुक्त थे, जिन्होंने जून 2001 से लेकर फरवरी 2004 तक इस ज़िम्मेदारी को निभाया.

2002 में गुजरात दंगों के बाद राज्य सरकार की चुनाव कराने की घोषणा और चुनाव आयोग से हुए टकराव के कारण लिंगदोह ज़्यादा चर्चित हुए.

तत्कालीन राज्य सरकार, राज्य में जल्दी चुनाव कराना चाहती थी लेकिन लिंगदोह ने दंगों के बाद हुए हालात का हवाला देते हुए चुनाव न कराने की बात कही.

आख़िरकार, दिसंबर 2002 में ही गुजरात में चुनाव हो पाए. इस प्रकरण ने यह दिखा दिया कि चुनावी प्रक्रिया में सत्ता का खेल आड़े नहीं आ सकता है.

इसके अलावा 2002 में जम्म-कश्मीर में हुए चुनाव भी लिंगदोह की एक बड़ी उपलब्धि है. इस चुनाव में न सिर्फ़ अपेक्षाकृत शांत चुनाव हुए थे बल्कि लोगों की हिस्सेदारी भी बढ़ी थी.

चुनाव आयोग को कहां से मिलती है फंडिंग?

चुनाव आयोग
इमेज कैप्शन, चुनाव आयोग के सचिवालय का एक स्वतंत्र बजट होता है.

चुनाव आयोग नियमित बैठकें आयोजित करता है. आयोग के लिए फ़ैसलों में सभी चुनाव आयुक्तों की भूमिका एक जैसी होती है.

आयोग समय-समय पर अपने सचिवालय में अपने अधिकारियों को उनकी ज़िम्मेदारियां सौंपता है. आयोग का नई दिल्ली में एक सचिवालय है, जहां 550 अधिकारी अलग-अलग पदों पर काम करते हैं.

चुनाव आयोग के सचिवालय का एक स्वतंत्र बजट होता है. इस बजट को चुनाव आयोग और केंद्रीय वित्त मंत्रालय के बीच सीधे परामर्श से अंतिम रूप दिया जाता है.

आमतौर पर, वित्त मंत्रालय बजट के लिए चुनाव आयोग की सिफारिशों को मान लेता है.

हालांकि चुनाव के वास्तविक संचालन पर होने वाला खर्च केंद्रीय कानून मंत्रालय और संबंधित राज्यों/ संघ शासित प्रदेशों के बजट से लिया जाता है.

अगर लोकसभा चुनाव हो रहे हैं, तो पूरा खर्च केंद्र सरकार उठाती है. जबकि राज्य विधानसभा चुनाव के लिए सारा खर्च संबंधित राज्य उठाता है.

वहीं अगर लोकसभा और राज्य विधानसभा का चुनाव एक समय पर होता है, तो पूरे खर्च को केंद्र और राज्य सरकार के बीच समान रूप से बांटा जाता है.

कॉपी: साजिद हुसैन

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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